₹2,000 से अधिक के कमर्शियल UPI भुगतान पर MDR शुल्क के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय में 16 सितंबर 2026 को एक महत्वपूर्ण याचिका दायर की गई है, जिसमें केंद्र सरकार के उस निर्णय को चुनौती दी गई है जिसके तहत ₹2,000 से अधिक के कमर्शियल UPI लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) शुल्क लागू किया गया है। याचिका में सरकार की संबंधित अधिसूचना और नए MDR फ्रेमवर्क को असंवैधानिक घोषित कर निरस्त करने की माँग की गई है।
याचिका की मुख्य दलीलें
वकील अंजन दत्ता द्वारा दायर इस याचिका में कहा गया है कि केंद्र सरकार ने पर्याप्त कानूनी आधार और व्यापक जनहित पर विचार किए बिना यह निर्णय लिया है। याचिकाकर्ता ने 14 दिसंबर को जारी अधिसूचना और 15 सितंबर को लागू किए गए MDR फ्रेमवर्क को असंवैधानिक बताते हुए उन्हें रद्द करने की अपील की है।
याचिका में तर्क दिया गया है कि UPI को मूलतः देश में डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने और नागरिकों को कम लागत वाली भुगतान सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विकसित किया गया था। ऐसे में इस पर अतिरिक्त शुल्क लगाना डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहित करने की मूल नीतिगत भावना के सीधे विरुद्ध है।
सरकार का पक्ष
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद अनुराग ठाकुर ने इस फैसले का बचाव करते हुए कहा कि भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था वैश्विक स्तर पर एक मिसाल बन चुकी है। उन्होंने कहा कि छोटे दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं और आम नागरिकों तक डिजिटल भुगतान की पहुँच भारत की बड़ी उपलब्धि है।
ठाकुर ने कहा, 'भारत के डिजिटल ट्रांजेक्शन मॉडल की दुनिया भर में चर्चा होती है। बड़े देशों के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भारत आकर देखते हैं कि कैसे चाय बेचने वाला, सड़क किनारे का विक्रेता और छोटे व्यापारी आसानी से डिजिटल भुगतान स्वीकार कर रहे हैं।' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ₹2,000 तक के लेनदेन पर कोई शुल्क नहीं है और ₹2,000 से अधिक के अधिकांश लेनदेन भी शुल्क के दायरे से बाहर रहेंगे।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) समेत विपक्षी दलों ने सरकार के इस कदम का कड़ा विरोध किया है और माँग की है कि MDR फ्रेमवर्क को तत्काल वापस लिया जाए। विरोधियों का तर्क है कि इस शुल्क का बोझ अंततः आम उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा, क्योंकि व्यापारी इस लागत को उत्पाद की कीमतों में जोड़ सकते हैं।
ठाकुर ने कांग्रेस पर इस मुद्दे को लेकर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाया और कहा कि पूरी रिपोर्ट का गंभीरता से अध्ययन किया जाना चाहिए। यह ऐसे समय में आया है जब भारत विश्व में सर्वाधिक रियल-टाइम डिजिटल लेनदेन करने वाले देशों में शुमार है।
आम जनता और व्यापारियों पर असर
गौरतलब है कि UPI लेनदेन पर शुल्क का मुद्दा पहले भी उठ चुका है — 2020 में भी MDR को लेकर बहस हुई थी, जिसके बाद सरकार ने शुल्क को शून्य रखने का निर्णय लिया था। आलोचकों का कहना है कि नया फ्रेमवर्क उसी नीतिगत दिशा से पीछे हटना है।
छोटे व्यापारी और मध्यम वर्ग के उपभोक्ता सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं, विशेषकर वे जो नियमित रूप से बड़े मूल्य के UPI लेनदेन करते हैं। व्यापारी संगठनों ने भी इस शुल्क पर चिंता जताई है।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका पर सुनवाई की तारीख अभी तय नहीं हुई है। न्यायालय का रुख और सरकार का जवाब ही यह तय करेगा कि MDR फ्रेमवर्क अपने मौजूदा स्वरूप में लागू रहेगा या इसमें संशोधन होगा। डिजिटल भुगतान क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ इस मामले पर कड़ी नज़र बनाए हुए हैं।