अर्चना पूरन सिंह बोलीं — जेन जी पर जजमेंटल समाज गलत, माहौल बदलो तो बच्चे बदलेंगे
सारांश
मुख्य बातें
अभिनेत्री अर्चना पूरन सिंह ने 5 अगस्त 2026 को मुंबई में एक बातचीत के दौरान कहा कि भारतीय समाज युवा पीढ़ी — विशेषकर जेन जी — को लेकर जरूरत से ज्यादा आलोचनात्मक हो गया है, और यह रवैया न्यायसंगत नहीं है। उनका तर्क है कि किसी भी पीढ़ी का व्यवहार उस माहौल का प्रतिबिंब होता है जो उसे मिला है — न कि उसकी अपनी कमी।
माहौल बदलो, बच्चे खुद बदलेंगे
अर्चना पूरन सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'मुझे लगता है कि हम एक समाज के तौर पर ज्यादा जजमेंटल हो गए हैं। अगर बच्चे ऐसे हो गए हैं, तो इसके पीछे की कोई तो वजह होगी। बच्चे तो वैसे ही होंगे, जैसा उनको माहौल मिलेगा। अगर आप माहौल बदल देंगे, तो बच्चे भी बदल जाएंगे। तो इसमें उनकी कोई गलती नहीं है।' यह बयान उस व्यापक सामाजिक बहस के बीच आया है जिसमें युवाओं के रवैये और मूल्यों पर लगातार सवाल उठाए जाते हैं।
पीढ़ियों की तुलना — एक गलत पैमाना
अभिनेत्री ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी तुलना को सिरे से नकारा। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, 'अगर कल मेरे नाती-पोते होंगे और वे किसी खास तरह का व्यवहार करेंगे और फिर, मैं उनसे तुलना करूं कि मेरे बच्चे ऐसे नहीं करते थे, तो ये गलत होगा ना। बच्चे कुछ भी सीखकर पैदा नहीं होते, आप उन्हें सिखाते हैं, समाज सिखाता है।' उनका यह कथन इस धारणा को चुनौती देता है कि नई पीढ़ी 'बिगड़ी हुई' है।
टेक्नोलॉजी के युग में जेन जी की अलग दुनिया
जेन जी और टेक्नोलॉजी के संबंध पर बात करते हुए अर्चना पूरन सिंह ने कहा कि यह पीढ़ी उन परिस्थितियों में पली-बढ़ी है जो पहले कभी नहीं थीं। उनके शब्दों में, 'हम एक खास समय में पैदा हुए थे, इसलिए हमने उस समय के हिसाब से बर्ताव किया। जेन जी टेक्नोलॉजी के युग में पैदा हुए हैं। उनके हाथों में गैजेट्स जल्दी आ गए।' उन्होंने जोड़ा कि बच्चों के पास आज कंप्यूटर और गैजेट्स की वह दुनिया है, जिसकी पिछली पीढ़ियों ने कल्पना भी नहीं की थी।
जिम्मेदारी बच्चों की नहीं, व्यवस्था की
अभिनेत्री का मानना है कि जब बच्चे ऐसी दुनिया में जन्म लेते हैं, तो उन्हें उसी के अनुसार ढलना पड़ता है — यही उनकी वास्तविकता है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि बच्चे पहले भी गलत व्यवहार करते थे, लेकिन आज की परिस्थितियाँ और उपकरण बिल्कुल अलग हैं। गौरतलब है कि यह बातचीत ऐसे समय में हुई है जब 'स्क्रीन टाइम' और डिजिटल लत को लेकर माता-पिता और शिक्षाविद् दोनों चिंतित हैं।
आगे की राह
अर्चना पूरन सिंह की यह टिप्पणी एक व्यापक सामाजिक विमर्श को जन्म देती है — कि क्या हम युवाओं की आलोचना करने की बजाय उनके लिए बेहतर माहौल बनाने की जिम्मेदारी लेंगे। विशेषज्ञ मानते हैं कि डिजिटल साक्षरता और भावनात्मक समर्थन मिलकर जेन जी को एक संतुलित भविष्य दे सकते हैं।