क्या 'गंधर्व कुमार' ने नए प्रयोगों के साथ राग को कालजयी बनाया?
सारांश
Key Takeaways
- कुमार गंधर्व का असली नाम शिवपुत्र सिद्धारमैया कोमकली था।
- उन्होंने रागों में अनोखे प्रयोग किए।
- उनके गायकी में जयपुर, आगरा और ग्वालियर घरानों का मेल था।
- भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण और पद्म विभूषण से नवाजा।
- कुमार गंधर्व ने संगीत को भावनाओं का माध्यम बनाया।
मुंबई, 11 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारतीय शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में पंडित गंधर्व कुमार का नाम एक अमर पहचान बन चुका है। उन्होंने प्रत्येक राग के साथ अनूठे प्रयोग किए, जिससे हर बार श्रोताओं को एक नया और अनोखा अनुभव मिला। चाहे शास्त्रीय संगीत की गहरी समझ हो या न हो, उनकी आवाज़ सुनते ही लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे।
महानायक पंडित कुमार गंधर्व की पुण्यतिथि 12 जनवरी को मनाई जाती है। उनकी गायकी आज भी हर श्रोता को मंत्रमुग्ध कर देती है। पंडित कुमार गंधर्व का जन्म 8 अप्रैल 1924 को कर्नाटक के बेलगाम जिले के सुलेभावी गांव में हुआ था। उनका असली नाम शिवपुत्र सिद्धारमैया कोमकली था। वह चार भाई-बहनों में तीसरे स्थान पर थे।
गंधर्व कुमार के परिवार में संगीत का माहौल था। उनके पिता सिद्धारमैया को गाने का शौक था, जिसका प्रभाव उन पर भी पड़ा और उन्होंने सात साल की उम्र में ही इतना शानदार गाना शुरू कर दिया कि सब हैरान रह गए। उनकी असाधारण प्रतिभा देखकर पिता उन्हें अपने गुरु स्वामी वल्लभदास के पास ले गए। स्वामीजी ने पहली बार उनकी आवाज़ सुनी और कहा, “यह तो सचमुच गंधर्व है!” इसी दिन से उन्हें 'कुमार गंधर्व' की उपाधि मिली और यही नाम पूरे देश में प्रसिद्ध हुआ।
कुमार गंधर्व ने भारतीय शास्त्रीय संगीत में एक क्रांति ला दी। उन्होंने कई नए रागों की रचना की, जिन्हें 'धुनुगम राग' कहा जाता है। उनका मानना था कि राग केवल स्वरों का समूह नहीं होता, बल्कि उसकी एक अपनी गति, भाव और जीवन होता है।
उन्होंने यह सिद्ध किया कि असली राग लोक संगीत की धुनों से ही उत्पन्न होते हैं। उन्होंने उन लोक धुनों का गहरा अध्ययन किया, जिनसे पहले राग नहीं बने थे। ऐसे सुरों से उन्होंने नए राग बनाए और शास्त्रीय संगीत को नई समृद्धि दी।
उनकी गायकी में जयपुर घराने की सटीकता, आगरा घराने की वाकपटुता और ग्वालियर घराने की गहराई का अनोखा मेल था। लेकिन, वह कभी किसी एक फॉर्मूले में नहीं बंधे। हर बार कुछ नया प्रयोग करते थे। चाहे ऋतुसंगीत हो या बालगंधर्व जैसे विशेष कार्यक्रम, उनकी प्रस्तुति हमेशा अलग और अनोखी रहती थी।
उनके जीवन में गिरता स्वास्थ्य एक बड़ा संकट बनकर आया। जब दिक्कत हुई, तो डॉक्टर के पास गए और पता चला कि टीबी की वजह से एक फेफड़े को गंभीर क्षति पहुंची है और वह सही हालत में नहीं है। यहां तक कि डॉक्टरों ने कह दिया कि अब सामान्य तरीके से गाना मुश्किल होगा। लेकिन कुमार गंधर्व ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी गायकी में बदलाव किया, सांस लेने की तकनीक बदली और रागों के साथ नए-नए प्रयोग शुरू किए। उन्होंने पहले से मौजूद रागों को भी मिलाकर नई धुनें निकालीं। इस बदलाव ने उनकी कला को और भी गहरा और अनूठा बना दिया और इसी बदलाव के साथ उन्होंने मंच पर वापसी की।
कुमार गंधर्व का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने संगीत को केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि भावनाओं और विचारों की अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा माध्यम बनाया। उनके योगदान को सम्मान देते हुए भारत सरकार ने साल 1977 में पद्म भूषण और साल 1990 में पद्म विभूषण से नवाजा। कुमार गंधर्व पर लिखी किताब 'कालजयी' में लेखिका रेखा इनामदार साने कई किस्सों और गायकी को खूबसूरती से पेश करती हैं।