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करण जौहर का 'के' वाला अंधविश्वास: राजकुमार हिरानी की फिल्म ने कैसे बदली सोच?

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करण जौहर का 'के' वाला अंधविश्वास: राजकुमार हिरानी की फिल्म ने कैसे बदली सोच?

सारांश

करण जौहर दशकों तक मानते रहे कि 'के' अक्षर उनकी फिल्मों को सफल बनाता है — 'कुछ कुछ होता है' से लेकर 'कभी अलविदा न कहना' तक। लेकिन राजकुमार हिरानी की 'लगे रहो मुन्ना भाई' ने उनके इस अंधविश्वास को तोड़ा और उन्हें मेहनत व कहानी की असली ताकत का एहसास कराया।

मुख्य बातें

करण जौहर लंबे समय तक न्यूमरोलॉजी में विश्वास रखते थे और ' के ' अक्षर को अपने लिए सौभाग्यशाली मानते थे।
1998 में ' कुछ कुछ होता है ' से निर्देशन की शुरुआत हुई, जिसे नेशनल अवॉर्ड मिला — और 'के' अक्षर पर भरोसा और पक्का हो गया।
राजकुमार हिरानी की ' लगे रहो मुन्ना भाई ' देखने के बाद करण ने न्यूमरोलॉजी छोड़ी और फिल्मों के नाम बिना किसी अक्षर की बाध्यता के रखने लगे।
इसके बाद ' माई नेम इज खान ', ' ए दिल है मुश्किल ' और ' रॉकी और रानी की प्रेम कहानी ' जैसी सफल फिल्में बनाईं।
साल 2020 में भारत सरकार ने करण जौहर को पद्मश्री से सम्मानित किया।

फिल्म निर्माता करण जौहर एक लंबे अरसे तक न्यूमरोलॉजी में गहरा विश्वास रखते थे और मानते थे कि 'के' अक्षर उनके लिए सौभाग्यशाली है — यही वजह थी कि उनकी अधिकांश फिल्मों के नाम इसी अक्षर से शुरू होते थे। लेकिन राजकुमार हिरानी की फिल्म 'लगे रहो मुन्ना भाई' देखने के बाद उनकी यह सोच पूरी तरह बदल गई।

बॉलीवुड के 'के' वाले फिल्ममेकर की शुरुआत

करण जौहर का जन्म 25 मई 1972 को मुंबई में हुआ। उनके पिता यश जौहर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के प्रतिष्ठित निर्माता थे और धर्मा प्रोडक्शन के संस्थापक थे। करण बचपन से ही फिल्मी माहौल में पले-बढ़े। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1995 में 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर की, जिसमें उन्होंने एक छोटी-सी अभिनय भूमिका भी निभाई।

न्यूमरोलॉजी और 'के' अक्षर का जादू

साल 1998 में करण जौहर ने बतौर निर्देशक अपनी पहली फिल्म 'कुछ कुछ होता है' बनाई। शाहरुख खान, काजोल और रानी मुखर्जी अभिनीत यह फिल्म ब्लॉकबस्टर रही और करण को पहली ही फिल्म पर नेशनल अवॉर्ड मिला। इस सफलता ने उनके मन में यह धारणा और पक्की कर दी कि 'के' अक्षर उनके लिए लकी है। इसके बाद 'कभी खुशी कभी गम' और 'कभी अलविदा न कहना' जैसी बड़ी फिल्में भी इसी अक्षर से शुरू होती रहीं। उस दौर में बॉलीवुड में न्यूमरोलॉजी का प्रभाव व्यापक था — कई सितारे और फिल्ममेकर नामों की स्पेलिंग तक बदल लेते थे।

राजकुमार हिरानी की फिल्म ने बदली सोच

करण जौहर ने एक इंटरव्यू में खुलासा किया था कि जब उन्होंने राजकुमार हिरानी की फिल्म 'लगे रहो मुन्ना भाई' देखी, तो उसमें न्यूमरोलॉजी पर व्यंग्य किया गया था। उस संदेश ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि इंसान की मेहनत और कहानी की ताकत किसी अक्षर के शुभ-अशुभ प्रभाव से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। यह उनके लिए एक वैचारिक मोड़ था।

बदलाव के बाद का सफर

इस बदलाव के बाद करण जौहर ने 'माई नेम इज खान', 'स्टूडेंट ऑफ द ईयर', 'ए दिल है मुश्किल' और 'रॉकी और रानी की प्रेम कहानी' जैसी सफल फिल्में बनाईं — जिनमें 'के' अक्षर की कोई बाध्यता नहीं थी। निर्माता के तौर पर उन्होंने आलिया भट्ट, वरुण धवन और सिद्धार्थ मल्होत्रा जैसे नए चेहरों को लॉन्च किया।

पुरस्कार, व्यक्तिगत जीवन और विरासत

करण जौहर को कई फिल्मफेयर अवॉर्ड मिल चुके हैं और साल 2020 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। साल 2004 में पिता यश जौहर के निधन के बाद करण ने अकेले धर्मा प्रोडक्शन की बागडोर संभाली और उसे बॉलीवुड के सबसे बड़े प्रोडक्शन हाउसों में से एक बना दिया। उनकी फिल्मों ने भारत के साथ-साथ विदेशों में भी भारतीय सिनेमा को नई पहचान दिलाई। आने वाले वर्षों में धर्मा प्रोडक्शन की परियोजनाएं इस बात की परीक्षा होंगी कि क्या करण जौहर का रचनात्मक विकास उनकी विरासत को और मजबूत करता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसका असली संदेश यह है कि बॉलीवुड में तर्कसंगत सोच अक्सर किसी फिल्म के संदेश से आती है, न कि किसी संस्थागत आत्मनिरीक्षण से। यह भी विचारणीय है कि 'के' अक्षर छोड़ने के बाद भी धर्मा प्रोडक्शन की कुछ बड़ी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर संघर्ष करती रही हैं — जो यह साबित करती है कि सफलता न अक्षर से आती है, न किसी फॉर्मूले से। करण जौहर की यात्रा व्यक्तिगत विकास की मिसाल है, पर यह भी याद रखना जरूरी है कि बॉलीवुड में अंधविश्वास आज भी कई रूपों में जीवित है।
RashtraPress
9 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

करण जौहर 'के' अक्षर को लकी क्यों मानते थे?
करण जौहर न्यूमरोलॉजी में विश्वास रखते थे और मानते थे कि 'के' अक्षर उनके लिए सौभाग्यशाली है। 1998 में 'कुछ कुछ होता है' की ब्लॉकबस्टर सफलता और नेशनल अवॉर्ड ने इस धारणा को और मजबूत कर दिया, जिसके बाद उन्होंने लगातार 'के' से शुरू होने वाले नाम रखे।
राजकुमार हिरानी की किस फिल्म ने करण जौहर की सोच बदली?
'लगे रहो मुन्ना भाई' देखने के बाद करण जौहर की न्यूमरोलॉजी पर से आस्था उठ गई। फिल्म में न्यूमरोलॉजी पर व्यंग्य किया गया था, जिसने उन्हें यह समझाया कि मेहनत और कहानी की ताकत किसी अक्षर से बड़ी होती है।
करण जौहर की 'के' अक्षर से शुरू होने वाली प्रमुख फिल्में कौन-सी हैं?
करण जौहर की 'के' से शुरू होने वाली प्रमुख फिल्मों में 'कुछ कुछ होता है' (1998), 'कभी खुशी कभी गम' और 'कभी अलविदा न कहना' शामिल हैं। इसके बाद उन्होंने यह परंपरा छोड़ दी।
करण जौहर को पद्मश्री कब मिला?
भारत सरकार ने साल 2020 में करण जौहर को पद्मश्री से सम्मानित किया। यह सम्मान हिंदी सिनेमा में उनके तीन दशकों से अधिक के योगदान के लिए दिया गया।
धर्मा प्रोडक्शन की स्थापना किसने की और करण जौहर ने इसे कैसे संभाला?
धर्मा प्रोडक्शन की स्थापना करण जौहर के पिता यश जौहर ने की थी। साल 2004 में यश जौहर के निधन के बाद करण ने अकेले इस प्रोडक्शन हाउस की जिम्मेदारी उठाई और इसे बॉलीवुड के सबसे बड़े प्रोडक्शन हाउसों में से एक बना दिया।
राष्ट्र प्रेस
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