नाग अश्विन बोले — टेक्नोलॉजी और भारतीय कहानियों का संगम खोलेगा सिनेमा की नई राहें
सारांश
मुख्य बातें
फिल्मकार नाग अश्विन ने 28 सितंबर 2026 को मुंबई में एक विशेष बातचीत के दौरान कहा कि तकनीक को भारत की अपनी संस्कृति और दर्शन से जुड़ी कहानियों के साथ जोड़ना भारतीय सिनेमा के लिए अनेक नई संभावनाएँ खोल सकता है। साइंस फिक्शन और पौराणिक कथाओं के अनूठे मेल के लिए पहचाने जाने वाले अश्विन का मानना है कि जैसे-जैसे यह तकनीक सुलभ होती जाएगी, वैसे-वैसे अधिक मौलिक आवाज़ें सामने आ सकेंगी।
मुख्य बात क्या कही नाग अश्विन ने
जब उनसे पूछा गया कि क्या भारतीय सिनेमा का असली अवसर तकनीक को अपनी सांस्कृतिक पहचान से जोड़ने में है, तो नाग अश्विन ने पूरी सहमति जताई। उन्होंने कहा, 'हाँ, बिल्कुल। मुझे लगता है कि तकनीक को हमारी अपनी कहानियों और दर्शन के साथ जोड़ना भारतीय सिनेमा के लिए कई संभावनाएँ खोल सकता है।'
उन्होंने आगे जोड़ा, 'जैसे-जैसे यह टेक्नोलॉजी ज़्यादा आसानी से उपलब्ध होगी, वैसे-वैसे ज़्यादा अलग और मौलिक आवाज़ों को भी ताकत मिलेगी। इससे ज़्यादा लोग प्रयोग कर सकेंगे और अपनी कहानियाँ अपने तरीके से बता सकेंगे। साथ ही उनके पास उन दुनियाओं को स्क्रीन पर उतारने के लिए ज़रूरी तकनीक भी होगी।'
कल्कि 2898 एडी — जहाँ से यह सोच परवान चढ़ी
नाग अश्विन की फिल्म 'कल्कि 2898 एडी' 2024 में रिलीज़ हुई थी। इस फिल्म में भारतीय पौराणिक कथाओं को साइंस फिक्शन की दुनिया के साथ जोड़ा गया — कहानी 2898 एडी के भविष्य में काशी शहर के इर्द-गिर्द बुनी गई, जिसमें एक बच्चे को भगवान विष्णु के अंतिम अवतार कल्कि से जोड़ा जाता है। यह फिल्म 'कल्कि सिनेमैटिक यूनिवर्स' की पहली कड़ी है।
फिल्म में अमिताभ बच्चन, कमल हासन, प्रभास, दीपिका पादुकोण, शोभना और दिशा पाटनी जैसे दिग्गज कलाकारों ने अहम भूमिकाएँ निभाईं। गौरतलब है कि इस फिल्म ने 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में 'बेस्ट पॉपुलर फिल्म प्रोवाइडिंग होलसम एंटरटेनमेंट' और 'बेस्ट स्पेशल इफेक्ट्स' — दो महत्वपूर्ण पुरस्कार जीते।
भारतीय सिनेमा पर व्यापक असर
यह ऐसे समय में आया है जब भारतीय फिल्म उद्योग वैश्विक ओटीटी प्लेटफॉर्मों पर अपनी पकड़ मज़बूत कर रहा है और दर्शक क्षेत्रीय भाषाओं की बड़े बजट की फिल्मों को भी उतनी ही उत्सुकता से स्वीकार कर रहे हैं। अश्विन का दृष्टिकोण यह संकेत देता है कि भारतीय पौराणिक और सांस्कृतिक आख्यानों में वह कच्चा माल मौजूद है जिसे उन्नत तकनीक के ज़रिए वैश्विक मंच पर पेश किया जा सकता है।
आलोचकों का कहना है कि तकनीक की सुलभता के साथ-साथ स्वतंत्र फिल्मकारों को वित्तीय समर्थन और वितरण ढाँचे की भी उतनी ही ज़रूरत है — केवल उपकरणों की उपलब्धता पर्याप्त नहीं।
आगे क्या
'कल्कि सिनेमैटिक यूनिवर्स' की अगली कड़ी को लेकर उत्सुकता बनी हुई है, हालाँकि नाग अश्विन ने इस बातचीत में उसके बारे में कोई नई जानकारी साझा नहीं की। उनके विचार यह ज़रूर बताते हैं कि वे भारतीय कहानियों और आधुनिक तकनीक के इस संगम को केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं मानते — यह एक दीर्घकालिक दिशा है।