30 जून 2026
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भारतीय सिनेमा को वैश्विक मंच पर ले जाने की तैयारी: सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने लिए दो बड़े फैसले

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भारतीय सिनेमा को वैश्विक मंच पर ले जाने की तैयारी: सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने लिए दो बड़े फैसले

सारांश

सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव की अध्यक्षता में 29 जून को दो अहम फैसले हुए — प्रसून जोशी की अगुवाई में एक उच्च स्तरीय अध्ययन समूह, जो तीन महीने में रिपोर्ट देगा, और राज्यों के लिए एकरूप मॉडल सिनेमा नियमन। लक्ष्य है: भारतीय सिनेमा को वैश्विक मंच पर मज़बूत करना।

मुख्य बातें

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव की अध्यक्षता में 29 जून 2026 को नई दिल्ली में उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित हुई।
प्रख्यात गीतकार प्रसून जोशी की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय अध्ययन समूह गठित; समूह तीन महीने में रिपोर्ट सौंपेगा।
समूह AI और वर्चुअल प्रोडक्शन जैसी तकनीकों के उपयोग तथा वित्तीय सुगमता पर सुझाव देगा।
राज्यों को मॉडल सिनेमा नियमन भेजा गया; छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में स्क्रीन विस्तार का लक्ष्य।
मंत्रालय राज्यों को नियमन लागू करने में सहयोग देगा।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 29 जून 2026 को नई दिल्ली में भारतीय फिल्म उद्योग को आधुनिक और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में दो महत्वपूर्ण निर्णय लिए — एक उच्च स्तरीय अध्ययन समूह का गठन और राज्यों के लिए एक मॉडल सिनेमा नियमन का निर्माण। ये फैसले केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव की अध्यक्षता में हुई उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक में लिए गए, जिसमें मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी और फिल्म क्षेत्र के प्रतिनिधि मौजूद रहे।

अध्ययन समूह का गठन

मंत्रालय द्वारा गठित इस उच्च स्तरीय अध्ययन समूह की अध्यक्षता प्रख्यात गीतकार और लेखक प्रसून जोशी करेंगे। समूह में फिल्म उद्योग के विशेषज्ञ, तकनीकी साझेदार और अन्य संबंधित क्षेत्रों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। यह समूह तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट मंत्रालय को सौंपेगा।

समूह का प्राथमिक उद्देश्य भारतीय सिनेमा के सामने मौजूद अवसरों और चुनौतियों का गहन अध्ययन कर इंडस्ट्री को आगे ले जाने के लिए ठोस सुझाव देना होगा। इसके साथ ही यह भारतीय फिल्मों को वैश्विक बाज़ार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के उपाय भी तलाशेगा।

तकनीकी एकीकरण पर विशेष ध्यान

अध्ययन समूह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और वर्चुअल प्रोडक्शन जैसी उभरती तकनीकों के भारतीय सिनेमा पर पड़ने वाले प्रभाव का भी विश्लेषण करेगा। यह सुझाव दिया जाएगा कि भारतीय फिल्म निर्माता इन तकनीकों का किस प्रकार बेहतर उपयोग कर सकते हैं। गौरतलब है कि वैश्विक स्तर पर AI-आधारित प्रोडक्शन टूल्स ने फिल्म निर्माण की लागत और समय दोनों में उल्लेखनीय कमी लाई है।

वित्तीय सुगमता और नीतिगत ढाँचा

समूह फिल्म निर्माताओं के लिए वित्तीय व्यवस्था को सरल बनाने पर भी विचार करेगा। इसमें संस्थागत वित्त की उपलब्धता, नए फंडिंग विकल्पों का विकास और फिल्म निर्माण व वितरण के दौरान आने वाली आर्थिक बाधाओं का समाधान शामिल है। समूह राज्य सरकारों और अन्य हितधारकों के साथ समन्वय कर भारतीय सिनेमा के दीर्घकालिक विकास के लिए एक व्यापक नीतिगत ढाँचा तैयार करने की दिशा में काम करेगा।

मॉडल सिनेमा नियमन: राज्यों के लिए एकरूपता की पहल

मंत्रालय का दूसरा बड़ा कदम सिनेमा और थिएटर के नियमन से जुड़ा है। चूँकि सिनेमा और थिएटर संवैधानिक रूप से राज्य सूची के अंतर्गत आते हैं, इसलिए विभिन्न राज्यों में लाइसेंस और अनुमतियों के लिए अलग-अलग नियम लागू हैं। मंत्रालय के अनुसार, यह असमान व्यवस्था विशेष रूप से छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में सिनेमा बुनियादी ढाँचे के विस्तार में बाधा बनती रही है।

इस समस्या के समाधान के लिए मंत्रालय ने सभी हितधारकों से व्यापक परामर्श के बाद एक मॉडल राज्य सिनेमा नियमन तैयार किया है, जिसे अब सभी राज्य सरकारों को भेजा गया है। राज्यों से इसे अपनाने का अनुरोध किया गया है और मंत्रालय ने इसके क्रियान्वयन में सहयोग देने का भी आश्वासन दिया है।

उद्योग पर संभावित असर

मंत्रालय का मानना है कि इन दोनों पहलों से भारतीय फिल्म उद्योग में निवेश, तकनीकी विकास और नए अवसरों को बल मिलेगा। यह ऐसे समय में आया है जब भारतीय सिनेमा वैश्विक ओटीटी प्लेटफार्मों और बदलती दर्शक आदतों के बीच नई चुनौतियों का सामना कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि एकीकृत नियमन और तकनीकी सहयोग से विशेष रूप से टियर-2 और टियर-3 शहरों में सिनेमा स्क्रीन की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

पर असली परीक्षा क्रियान्वयन में है। भारत में सिनेमा स्क्रीन घनत्व अभी भी वैश्विक औसत से काफी नीचे है, और राज्य सूची में होने के कारण नियमन सुधार दशकों से लंबित है। प्रसून जोशी जैसे रचनात्मक व्यक्तित्व की अगुवाई उद्योग का भरोसा जीत सकती है, लेकिन समूह की सिफारिशें बाध्यकारी नहीं होंगी — राज्य सरकारें मॉडल नियमन को स्वेच्छा से अपनाएँगी या नहीं, यह एक खुला सवाल है। बिना प्रोत्साहन या समयसीमा के, यह पहल भी अच्छे इरादों वाली सलाहकार रिपोर्टों की उस लंबी कतार में शामिल हो सकती है जो अलमारियों में धूल खाती रहती हैं।
RashtraPress
30 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने भारतीय फिल्म उद्योग के लिए कौन से दो फैसले लिए हैं?
मंत्रालय ने प्रसून जोशी की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय अध्ययन समूह गठित किया है और राज्यों के लिए एक मॉडल सिनेमा नियमन तैयार कर उन्हें भेजा है। ये दोनों फैसले 29 जून 2026 को नई दिल्ली में अश्विनी वैष्णव की अध्यक्षता में हुई बैठक में लिए गए।
प्रसून जोशी की अगुवाई वाला अध्ययन समूह क्या करेगा?
यह समूह भारतीय सिनेमा के सामने मौजूद अवसरों और चुनौतियों का अध्ययन करेगा, AI और वर्चुअल प्रोडक्शन जैसी तकनीकों के उपयोग पर सुझाव देगा और फिल्म निर्माताओं के लिए वित्तीय व्यवस्था को सरल बनाने के उपाय तलाशेगा। समूह तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट मंत्रालय को सौंपेगा।
मॉडल सिनेमा नियमन की जरूरत क्यों पड़ी?
सिनेमा और थिएटर संवैधानिक रूप से राज्य सूची के अंतर्गत आते हैं, जिससे हर राज्य में लाइसेंस और अनुमतियों के नियम अलग-अलग हैं। यह असमान व्यवस्था विशेष रूप से छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में सिनेमा बुनियादी ढाँचे के विस्तार में बाधा बनती रही है।
क्या राज्यों के लिए मॉडल सिनेमा नियमन अपनाना अनिवार्य है?
नहीं, मंत्रालय ने राज्यों से इसे अपनाने का अनुरोध किया है, अनिवार्य नहीं किया है। मंत्रालय ने राज्यों को इन नियमों को लागू करने में सहयोग देने का आश्वासन दिया है।
इन फैसलों से भारतीय फिल्म उद्योग को क्या फायदा होगा?
मंत्रालय के अनुसार, इन पहलों से सिनेमा क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा, तकनीकी विकास को बल मिलेगा और विशेष रूप से टियर-2 व टियर-3 शहरों में सिनेमा स्क्रीन की संख्या में वृद्धि होगी। भारतीय फिल्मों को वैश्विक बाज़ार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना भी इन पहलों का प्रमुख लक्ष्य है।
राष्ट्र प्रेस
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