पल्लवी जोशी का वेतन असमानता पर खुलासा: 'शेखर सुमन को मिलती थी मेरी दोगुनी फीस'
सारांश
मुख्य बातें
अभिनेत्री और प्रोड्यूसर पल्लवी जोशी ने 90 के दशक में भारतीय टेलीविजन की सबसे लोकप्रिय चेहरों में से एक होने के बावजूद वेतन असमानता झेलने की बात स्वीकार की है। उन्होंने बताया कि उस दौर में पुरुष सह-कलाकारों की तुलना में उन्हें लगभग आधी फीस मिलती थी — और यह तब भी, जब वे टीवी इंडस्ट्री की सर्वाधिक पारिश्रमिक पाने वाली अभिनेत्रियों में गिनी जाती थीं।
मैगज़ीन कवर और दोगुनी फीस की कहानी
पल्लवी जोशी ने बताया कि एक बार किसी मैगज़ीन के कवर पेज पर उनकी और अभिनेता शेखर सुमन की तस्वीर एक साथ छपी थी। उन्होंने कहा, 'उस दौर में हम दोनों टीवी के सबसे लोकप्रिय और सबसे ज़्यादा फीस पाने वाले कलाकारों में गिने जाते थे। शेखर सुमन को उस समय मेरी तुलना में लगभग दोगुनी फीस मिलती थी।' यह उदाहरण उन्होंने यह दर्शाने के लिए दिया कि किस तरह समान लोकप्रियता के बावजूद महिला और पुरुष कलाकारों के बीच पारिश्रमिक में भारी अंतर था।
करियर के चरम पर भी रही असमानता
पल्लवी जोशी ने कहा, '90 के दशक में, जब मैं अपने करियर के चरम पर थी, तब भी मुझे पुरुष कलाकारों की तुलना में कम वेतन मिलता था।' उन्होंने स्वीकार किया कि उस दौर में इस विषय पर खुलकर बात करने की परंपरा नहीं थी, इसलिए उन्होंने इसे चुपचाप स्वीकार कर लिया। उनके अनुसार, 'यह अंतर उस समय इंडस्ट्री में सामान्य बात थी।'
इंडस्ट्री में महिलाओं की स्थिति पर सवाल
पल्लवी जोशी ने इस अनुभव को उस पूरे दौर की मानसिकता का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि भले ही उन्हें सबसे सफल और ज़्यादा फीस पाने वाली अभिनेत्री माना जाता था, लेकिन 'वास्तविकता यह थी कि पुरुष सहकलाकारों की तुलना में कमाई हमेशा कम ही रही।' यह बयान ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब मनोरंजन उद्योग में लैंगिक वेतन समानता को लेकर बहस तेज़ हो रही है।
पल्लवी जोशी का करियर और पहचान
80 और 90 के दशक में पल्लवी जोशी ने 'मृगनयनी', 'तलाश' और 'आरोहण' जैसे लोकप्रिय धारावाहिकों से घर-घर में पहचान बनाई। वहीं, शेखर सुमन ने 'देख भाई देख', 'वाह जनाब' और 'मूवर्स एंड शेकर्स' जैसे हिट शोज़ से दर्शकों के बीच अपनी जगह बनाई थी और वर्तमान में वे यूट्यूब शो 'शेखर टुनाइट' को लेकर भी चर्चा में हैं।
आगे क्या
पल्लवी जोशी का यह खुलासा भारतीय मनोरंजन उद्योग में दशकों पुरानी वेतन असमानता की बहस को नए सिरे से उठाता है। उनकी यह बेबाक स्वीकारोक्ति उन तमाम महिला कलाकारों की आवाज़ बन सकती है जो आज भी इसी असमानता से जूझ रही हैं।