प्रेम अदीब: अरुण गोविल से पहले 8 फिल्मों में बने 'राम', शोभना समर्थ संग जोड़ी की तस्वीरें मंदिरों में सजती थीं
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा में भगवान राम की भूमिका को अमर बनाने वाले प्रेम अदीब वह अभिनेता थे जिन्होंने अरुण गोविल से कई दशक पहले पर्दे पर राम का किरदार इस कदर जीया कि दर्शक उन्हें अभिनेता नहीं, साक्षात राम मानने लगे। शोभना समर्थ के साथ उनकी जोड़ी की तस्वीरें धार्मिक कैलेंडरों और मंदिरों तक पहुँच गई थीं — यह हिंदी सिनेमा के इतिहास में किसी अभिनेता को मिली विरली श्रद्धांजलि थी।
संघर्ष से स्टारडम तक
प्रेम अदीब का जन्म 10 अगस्त 1917 को सुल्तानपुर में एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था। उनके पिता पंडित राम प्रसाद अदीब पेशे से वकील थे और परिवार में पढ़ाई को प्राथमिकता दी जाती थी। परिवार का अभिनय के प्रति विरोध के बावजूद प्रेम अदीब ने हार नहीं मानी।
उन्होंने 1936 में फिल्मी दुनिया में कदम रखा और 1938 की फिल्म 'निराला हिंदुस्तान' से बतौर मुख्य अभिनेता अपनी पहचान बनाई। 1940 के दशक तक वे हिंदी सिनेमा के चर्चित चेहरों में शुमार हो चुके थे।
भरत मिलाप और राम राज्य: करियर की ऐतिहासिक पारी
1942 में आई फिल्म 'भरत मिलाप' ने प्रेम अदीब के करियर को नई ऊँचाई दी। इसमें उन्होंने भगवान राम और शोभना समर्थ ने सीता की भूमिका निभाई। अगले ही वर्ष 1943 में दोनों 'राम राज्य' में फिर राम-सीता के रूप में पर्दे पर उतरे।
इन दोनों फिल्मों की सफलता के बाद यह जोड़ी केवल फिल्मी नहीं रही — दर्शकों ने इन्हें श्रद्धाभाव से राम और सीता के रूप में स्वीकार कर लिया। दोनों की तस्वीरें धार्मिक प्रकाशनों, कैलेंडरों और मंदिरों में स्थान पाने लगीं। यह उस दौर की हिंदी फिल्मों का एक अनूठा सांस्कृतिक प्रभाव था।
आठ फिल्मों में राम का किरदार
प्रेम अदीब ने अपने करियर में करीब आठ फिल्मों में भगवान राम की भूमिका निभाई — यह संख्या हिंदी सिनेमा के किसी एक अभिनेता के लिए असाधारण है। 'भरत मिलाप', 'राम राज्य' और 'राम बाण' के अतिरिक्त 'राम विवाह', 'राम नवमी', 'राम-हनुमान युद्ध', 'राम लक्ष्मण' और 'राम भक्त विभीषण' उनके इस विशिष्ट सफर का हिस्सा रहीं।
1954 की 'रामायण' में भी शोभना समर्थ के साथ उन्होंने राम-सीता की भूमिका निभाई, जिससे इस जोड़ी की धार्मिक छवि और गहरी होती गई। गौरतलब है कि यह वह दौर था जब टेलीविज़न का प्रचलन नहीं था और सिनेमाघर ही धार्मिक आस्था के दृश्य-माध्यम थे।
असमय विदाई और विरासत
प्रेम अदीब का जीवन दुखद रूप से अल्पकालिक रहा। 25 दिसंबर 1959 को मुंबई में मात्र 42 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद 1960 में 'अंगुलीमाल' रिलीज हुई, जिसे उनकी अंतिम फिल्म माना जाता है।
यह ऐसे समय में आया जब हिंदी सिनेमा में धार्मिक फिल्मों की एक पूरी परंपरा उनके नाम से जुड़ी हुई थी। उनके जाने के बाद भी उनकी छवि दर्शकों के मन में राम के रूप में बनी रही — और यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।