चुनाव आयोग का स्पष्ट जवाब: एसआईआर विवाद पर 'कोई संकट नहीं', बिंदुवार खंडन जारी
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय चुनाव आयोग (ECI) ने 23 सितंबर 2026 को एक विस्तृत प्रेस नोट जारी कर उन मीडिया रिपोर्टों का खंडन किया, जिनमें विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर तीन चुनाव आयुक्तों के बीच 'अभूतपूर्व टूट' का दावा किया गया था। आयोग ने कहा कि तीन-सदस्यीय निकाय में असहमति सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, न कि किसी संस्थागत संकट का संकेत।
आयोग का स्पष्टीकरण: बहुमत से निर्णय की परंपरा
आयोग ने याद दिलाया कि वह 1993 से बहु-सदस्यीय निकाय के रूप में कार्यरत है और सभी निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाते हैं। आयोग ने ऐतिहासिक उदाहरण भी सामने रखे — 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने साथी आयुक्त नवीन चावला को हटाने की माँग की थी, जिसे सरकार ने खारिज कर दिया था। इसी तरह 1993-95 के बीच तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने बहु-सदस्यीय आयोग के गठन को ही न्यायालय में चुनौती दी थी। आयोग के अनुसार, ये नज़ीरें बताती हैं कि आंतरिक मतभेद संस्था के इतिहास में नए नहीं हैं।
फॉर्म-6 विवाद पर सफाई
रिपोर्टों में आरोप लगाया गया था कि नए मतदाताओं के लिए फॉर्म-6 को बिना कानूनी मंजूरी के बदला गया। आयोग ने इसे गलत बताते हुए कहा कि मई 2026 के SIR आदेश में ही फॉर्म-6 के साथ एक अलग डिक्लेरेशन फॉर्म बनाया गया था। मतदाता के पिछले SIR में होने से संबंधित सवाल उसी डिक्लेरेशन फॉर्म में दर्ज किया गया है, फॉर्म-6 में नहीं। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि जो आँकड़े सामने आए हैं, वे ड्राफ्ट रोल में आगे न ले जाए गए नामों के हैं — फाइनल डिलीशन के नहीं। SIR की प्रक्रिया में ड्राफ्ट प्रकाशन, दावा-आपत्ति, सुनवाई और उसके बाद फाइनल रोल तैयार करने के चरण होते हैं।
पश्चिम बंगाल और गोवा के मामले
आयोग के अनुसार, पश्चिम बंगाल में कुल 38 लाख अपीलों में से 22.21 लाख अपीलें उन मतदाताओं ने खुद बहाली के लिए दर्ज कराई हैं जिनके नाम हटाए गए थे, जबकि 16.10 लाख अपीलें किसी अन्य पक्ष द्वारा दायर की गई हैं। आयोग ने कहा कि इससे यह साबित नहीं होता कि ECI ने स्वयं ये अपीलें दायर कीं। अब तक 1.26 लाख अपीलें निपटाई जा चुकी हैं और 1.14 लाख मतदाताओं को बहाल किया गया है। गोवा के संदर्भ में आयोग ने बताया कि 97 मतदाताओं को निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) ने योग्य पाया, परंतु सॉफ्टवेयर में डिलीशन को वापस लेने का फ़ंक्शन उपलब्ध नहीं था। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने फाइनल रोल से पहले 8 बार इसे ठीक करने के लिए लिखा। आयोग ने इसे तकनीकी खामी बताया, न कि किसी साजिश का हिस्सा।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश और ऐतिहासिक संदर्भ
27 मई 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि ECI को अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व कानून 1950 की धारा 21(3) के तहत SIR कराने का पूर्ण अधिकार है। आयोग ने यह भी रेखांकित किया कि आज़ादी के बाद से अब तक SIR 10 बार हो चुका है, जिनमें से 8 बार विभिन्न कांग्रेस सरकारों के कार्यकाल में यह प्रक्रिया अपनाई गई थी।
आयोग का समापन वक्तव्य
आयोग ने कहा कि डेटाबेस एक्सेस के ऑडिट की माँग करना सतर्कता की निशानी है, छेड़छाड़ का प्रमाण नहीं। आंतरिक नोट्स लोकतांत्रिक विचार-विमर्श का हिस्सा हैं, किसी गैरकानूनी कार्रवाई के साक्ष्य नहीं। वोटर लिस्ट का स्वामित्व ECI के पास है, लेकिन नाम जोड़ने या हटाने का अंतिम अधिकार निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) के पास ही बना हुआ है। पिछले एक वर्ष में आयोग ने सर्वसम्मति से करीब 40 नई पहल शुरू की हैं और बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम तथा पश्चिम बंगाल में सफलतापूर्वक चुनाव संपन्न कराए हैं। आयोग के शब्दों में, 'खुले तौर पर दर्ज बहस इस बात का संकेत है कि सिस्टम काम कर रहा है — यह कोई संकट नहीं है।'