23 सितंबर 2026
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चुनाव आयोग का स्पष्ट जवाब: एसआईआर विवाद पर 'कोई संकट नहीं', बिंदुवार खंडन जारी

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चुनाव आयोग का स्पष्ट जवाब: एसआईआर विवाद पर 'कोई संकट नहीं', बिंदुवार खंडन जारी

सारांश

चुनाव आयोग ने 'तीन आयुक्तों में टूट' की मीडिया रिपोर्टों को सिरे से खारिज करते हुए कहा — आंतरिक बहस लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, संकट नहीं। SIR, फॉर्म-6 विवाद और बंगाल-गोवा के आँकड़ों पर बिंदुवार सफाई दी गई।

मुख्य बातें

भारतीय चुनाव आयोग ने 23 सितंबर 2026 को प्रेस नोट जारी कर SIR पर 'अभूतपूर्व टूट' के दावों को गलत बताया।
आयोग ने कहा कि वह 1993 से बहु-सदस्यीय निकाय है और निर्णय बहुमत से होते हैं; असहमति सामान्य है।
पश्चिम बंगाल में 38 लाख अपीलों में से 22.21 लाख स्वयं मतदाताओं ने बहाली के लिए दायर कीं; 1.14 लाख बहाल हो चुके हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने 27 मई 2026 को ECI के SIR के अधिकार को वैध ठहराया था।
SIR आज़ादी के बाद 10 बार हुआ है, जिनमें 8 बार कांग्रेस सरकारों के दौरान।
गोवा में 97 मतदाताओं की बहाली न हो पाना सॉफ्टवेयर की तकनीकी खामी था; मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने 8 बार सुधार के लिए लिखा।

भारतीय चुनाव आयोग (ECI) ने 23 सितंबर 2026 को एक विस्तृत प्रेस नोट जारी कर उन मीडिया रिपोर्टों का खंडन किया, जिनमें विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर तीन चुनाव आयुक्तों के बीच 'अभूतपूर्व टूट' का दावा किया गया था। आयोग ने कहा कि तीन-सदस्यीय निकाय में असहमति सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, न कि किसी संस्थागत संकट का संकेत।

आयोग का स्पष्टीकरण: बहुमत से निर्णय की परंपरा

आयोग ने याद दिलाया कि वह 1993 से बहु-सदस्यीय निकाय के रूप में कार्यरत है और सभी निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाते हैं। आयोग ने ऐतिहासिक उदाहरण भी सामने रखे — 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने साथी आयुक्त नवीन चावला को हटाने की माँग की थी, जिसे सरकार ने खारिज कर दिया था। इसी तरह 1993-95 के बीच तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने बहु-सदस्यीय आयोग के गठन को ही न्यायालय में चुनौती दी थी। आयोग के अनुसार, ये नज़ीरें बताती हैं कि आंतरिक मतभेद संस्था के इतिहास में नए नहीं हैं।

फॉर्म-6 विवाद पर सफाई

रिपोर्टों में आरोप लगाया गया था कि नए मतदाताओं के लिए फॉर्म-6 को बिना कानूनी मंजूरी के बदला गया। आयोग ने इसे गलत बताते हुए कहा कि मई 2026 के SIR आदेश में ही फॉर्म-6 के साथ एक अलग डिक्लेरेशन फॉर्म बनाया गया था। मतदाता के पिछले SIR में होने से संबंधित सवाल उसी डिक्लेरेशन फॉर्म में दर्ज किया गया है, फॉर्म-6 में नहीं। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि जो आँकड़े सामने आए हैं, वे ड्राफ्ट रोल में आगे न ले जाए गए नामों के हैं — फाइनल डिलीशन के नहीं। SIR की प्रक्रिया में ड्राफ्ट प्रकाशन, दावा-आपत्ति, सुनवाई और उसके बाद फाइनल रोल तैयार करने के चरण होते हैं।

पश्चिम बंगाल और गोवा के मामले

आयोग के अनुसार, पश्चिम बंगाल में कुल 38 लाख अपीलों में से 22.21 लाख अपीलें उन मतदाताओं ने खुद बहाली के लिए दर्ज कराई हैं जिनके नाम हटाए गए थे, जबकि 16.10 लाख अपीलें किसी अन्य पक्ष द्वारा दायर की गई हैं। आयोग ने कहा कि इससे यह साबित नहीं होता कि ECI ने स्वयं ये अपीलें दायर कीं। अब तक 1.26 लाख अपीलें निपटाई जा चुकी हैं और 1.14 लाख मतदाताओं को बहाल किया गया है। गोवा के संदर्भ में आयोग ने बताया कि 97 मतदाताओं को निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) ने योग्य पाया, परंतु सॉफ्टवेयर में डिलीशन को वापस लेने का फ़ंक्शन उपलब्ध नहीं था। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने फाइनल रोल से पहले 8 बार इसे ठीक करने के लिए लिखा। आयोग ने इसे तकनीकी खामी बताया, न कि किसी साजिश का हिस्सा।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश और ऐतिहासिक संदर्भ

27 मई 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि ECI को अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व कानून 1950 की धारा 21(3) के तहत SIR कराने का पूर्ण अधिकार है। आयोग ने यह भी रेखांकित किया कि आज़ादी के बाद से अब तक SIR 10 बार हो चुका है, जिनमें से 8 बार विभिन्न कांग्रेस सरकारों के कार्यकाल में यह प्रक्रिया अपनाई गई थी।

आयोग का समापन वक्तव्य

आयोग ने कहा कि डेटाबेस एक्सेस के ऑडिट की माँग करना सतर्कता की निशानी है, छेड़छाड़ का प्रमाण नहीं। आंतरिक नोट्स लोकतांत्रिक विचार-विमर्श का हिस्सा हैं, किसी गैरकानूनी कार्रवाई के साक्ष्य नहीं। वोटर लिस्ट का स्वामित्व ECI के पास है, लेकिन नाम जोड़ने या हटाने का अंतिम अधिकार निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) के पास ही बना हुआ है। पिछले एक वर्ष में आयोग ने सर्वसम्मति से करीब 40 नई पहल शुरू की हैं और बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम तथा पश्चिम बंगाल में सफलतापूर्वक चुनाव संपन्न कराए हैं। आयोग के शब्दों में, 'खुले तौर पर दर्ज बहस इस बात का संकेत है कि सिस्टम काम कर रहा है — यह कोई संकट नहीं है।'

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसमें एक मूल सवाल का जवाब नहीं मिलता — क्या आयुक्तों के बीच असहमति की प्रकृति और गहराई वाकई 'सामान्य लोकतांत्रिक बहस' की सीमा में थी, या यह संस्थागत तनाव की ओर संकेत करती है? आयोग ने 1993 और 2009 के उदाहरण दिए, लेकिन उन मामलों की परिस्थितियाँ भिन्न थीं — उन्हें आज के संदर्भ में 'नॉर्मल' साबित करने के लिए इस्तेमाल करना तर्क की कमज़ोरी उजागर करता है। बंगाल और गोवा के आँकड़ों पर सफाई ज़रूरी थी, लेकिन सॉफ्टवेयर खामी जैसे तकनीकी मुद्दों का फाइनल रोल से पहले समाधान न होना और ERO को बार-बार लिखते रहना — यह प्रक्रियागत चुस्ती पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
RashtraPress
23 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) क्या है और इसका विवाद क्यों?
SIR मतदाता सूचियों की गहन समीक्षा की प्रक्रिया है, जिसके तहत पात्र मतदाताओं को जोड़ा और अपात्र नामों को हटाया जाता है। विवाद तब शुरू हुआ जब मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि तीनों चुनाव आयुक्तों के बीच इस प्रक्रिया को लेकर 'अभूतपूर्व टूट' है। चुनाव आयोग ने इसे गलत बताते हुए बिंदुवार खंडन जारी किया।
क्या सर्वोच्च न्यायालय ने SIR को वैध माना है?
हाँ, 27 मई 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ECI को अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व कानून 1950 की धारा 21(3) के तहत SIR कराने का पूरा अधिकार है। यह आदेश SIR की संवैधानिक वैधता पर लगाए जा रहे सवालों के जवाब में आया था।
पश्चिम बंगाल में मतदाताओं के नाम हटाने का मामला क्या है?
आयोग के अनुसार, बंगाल में कुल 38 लाख अपीलें दर्ज हैं, जिनमें से 22.21 लाख स्वयं प्रभावित मतदाताओं ने बहाली के लिए दाखिल कीं और 16.10 लाख किसी अन्य पक्ष ने। अब तक 1.26 लाख अपीलें निपटाई गई हैं और 1.14 लाख मतदाताओं के नाम बहाल किए जा चुके हैं।
गोवा में 97 मतदाताओं की बहाली क्यों नहीं हो सकी?
गोवा में ERO ने 97 मतदाताओं को योग्य पाया, लेकिन सॉफ्टवेयर में डिलीशन को रद्द करने का फ़ंक्शन ही उपलब्ध नहीं था। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने फाइनल रोल से पहले इस खामी को ठीक करने के लिए 8 बार लिखा। आयोग ने इसे तकनीकी त्रुटि बताया, जानबूझकर की गई गड़बड़ी नहीं।
SIR पहले कितनी बार हुआ है और क्या यह नई प्रक्रिया है?
SIR आज़ादी के बाद से कुल 10 बार हो चुका है। इनमें से 8 बार यह प्रक्रिया कांग्रेस सरकारों के कार्यकाल में अपनाई गई थी। चुनाव आयोग ने इसे रेखांकित करते हुए कहा कि SIR कोई नई या असाधारण प्रक्रिया नहीं है।
राष्ट्र प्रेस
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