रणदीप हुड्डा को राम गोपाल वर्मा ने तीन साल दिए ₹35,000 महीना, फिर भी नहीं मिली फिल्म
सारांश
मुख्य बातें
अभिनेता रणदीप हुड्डा हिंदी सिनेमा में अपनी तीव्र अदाकारी और चुनौतीपूर्ण किरदारों के लिए जाने जाते हैं, लेकिन उनके करियर का एक ऐसा दौर भी रहा जब वह लगभग तीन साल तक घर पर बैठकर एक ऐसी फिल्म का इंतजार करते रहे जो कभी बनी ही नहीं। यह किस्सा खुद रणदीप ने एक इंटरव्यू में साझा किया था। निर्देशक राम गोपाल वर्मा ने उन्हें अपनी फिल्म में लॉन्च करने का वादा किया था और इस दौरान हर महीने ₹35,000 की राशि दी थी।
बचपन से अभिनय का सपना
रणदीप हुड्डा का जन्म 20 अगस्त 1976 को हरियाणा के रोहतक में हुआ था। उनके पिता चिकित्सक थे और माँ समाज सेवा से जुड़ी थीं। माता-पिता के विदेश में रहने के कारण रणदीप का अधिकांश बचपन अपनी दादी के साथ बीता। स्कूल में जब अंग्रेजी फिल्में दिखाई जाती थीं, तो वह खुद को पर्दे के नायक की जगह कल्पना करने लगते थे। परिवार की इच्छा थी कि वह पढ़ाई पर ध्यान दें और एक स्थिर करियर चुनें।
ऑस्ट्रेलिया में टैक्सी से विवियन रिचर्ड्स तक का सफर
उच्च शिक्षा के लिए रणदीप ऑस्ट्रेलिया गए, जहाँ पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने कई तरह के काम किए — यहाँ तक कि टैक्सी भी चलाई। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनकी कैब में एक बार महान क्रिकेटर विवियन रिचर्ड्स भी सवार हुए थे। इस पूरे दौर में अभिनय की चाहत उनके भीतर जीवित रही और अंततः वह भारत लौटकर फिल्मों में किस्मत आजमाने लगे।
मीरा नायर की फिल्म से शुरुआत, फिर थिएटर की ओर रुख
रणदीप को 2001 में निर्देशक मीरा नायर की फिल्म 'मानसून वेडिंग' में काम करने का अवसर मिला। यह एक बड़ा मौका था, लेकिन इस फिल्म के बाद भी उनका करियर तत्काल गति नहीं पकड़ सका। रणदीप ने खुद स्वीकार किया था कि उस दौर में उन्हें लगा कि अभिनय अभी ठीक से आता ही नहीं। इसके बाद उन्होंने थिएटर का रुख किया और दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह के साथ काम करके अपनी कला को गहराई से समझा।
राम गोपाल वर्मा का वादा और तीन साल का इंतजार
थिएटर के बाद रणदीप के जीवन में एक अनोखा मोड़ आया। निर्देशक राम गोपाल वर्मा ने उन्हें अपनी फिल्म में लॉन्च करने का वादा किया और पूछा कि उन्हें हर महीने कितने पैसों की जरूरत है। रणदीप ने जवाब दिया — ₹35,000। इसके बाद करीब तीन साल तक उन्हें यह राशि मिलती रही और वह घर पर बैठकर उस फिल्म का इंतजार करते रहे। लेकिन वह प्रोजेक्ट उस रूप में आगे नहीं बढ़ा जैसा उन्होंने सोचा था।
संघर्ष के बाद मिली पहचान
धीरे-धीरे रणदीप को सार्थक भूमिकाएँ मिलने लगीं। 'डी', 'रिस्क', 'वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई', 'साहेब बीवी और गैंगस्टर' और 'जन्नत 2' जैसी फिल्मों ने उनकी पहचान को मजबूत किया। 2014 में आई 'हाईवे' में उन्होंने महाबीर भाटी का किरदार निभाया, जिसे दर्शकों और समीक्षकों दोनों ने सराहा। 2016 में 'सरबजीत' में उन्होंने सरबजीत सिंह की भूमिका के लिए जबरदस्त शारीरिक और मानसिक रूपांतरण किया, जो उनके करियर का एक अहम पड़ाव रहा। इसके बाद हॉलीवुड फिल्म 'एक्सट्रैक्शन' में क्रिस हेम्सवर्थ के साथ काम करके उन्होंने अंतरराष्ट्रीय पहचान भी हासिल की। फिल्म 'स्वतंत्र वीर सावरकर' में उन्होंने अभिनय के साथ-साथ निर्देशन की जिम्मेदारी भी सँभाली और एक नई पहचान बनाई। रणदीप हुड्डा की यात्रा इस बात का प्रमाण है कि धैर्य और कठोर परिश्रम से संघर्ष भी सफलता में बदल सकता है।