सबा आजाद: 'महत्वाकांक्षी महिलाओं को समाज आज भी पूरी तरह नहीं अपनाता'

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सबा आजाद: 'महत्वाकांक्षी महिलाओं को समाज आज भी पूरी तरह नहीं अपनाता'

सारांश

अभिनेत्री सबा आजाद ने पितृसत्तात्मक समाज पर बेबाक राय रखी — महत्वाकांक्षी महिलाओं को काम करने पर भी आलोचना, न करने पर भी। उनका कहना है कि असली बदलाव सीखने की इच्छाशक्ति से आता है, न सिर्फ़ नारों से।

मुख्य बातें

अभिनेत्री सबा आजाद ने 17 मई 2026 को कहा कि समाज अब भी महत्वाकांक्षी महिलाओं को पूरी तरह स्वीकार नहीं करता।
उनके अनुसार महिलाओं को अपनी पहचान बनाने के लिए पुरुषों से दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है।
देश के कई हिस्सों में महिलाओं को स्वतंत्र रूप से काम करने या अपने फैसले लेने की इजाज़त नहीं।
सबा ने कहा — महिलाएँ काम करें तो आलोचना, न करें तो भी आलोचना; दोहरी कसौटी उनके संघर्ष को कठिन बनाती है।
उनका मानना है कि मज़बूत महिलाओं से सीखने का नज़रिया अपनाने से ही समाज में सकारात्मक बदलाव संभव है।

अभिनेत्री सबा आजाद ने 17 मई 2026 को कहा कि भारतीय समाज में महत्वाकांक्षी महिलाओं की पूर्ण स्वीकृति आज भी एक अधूरी वास्तविकता है। उनके अनुसार, समानता और प्रगति की बातें भले ही आम हो गई हों, लेकिन असल ज़िंदगी में महिलाओं को अपनी काबिलियत साबित करने के लिए पुरुषों से कहीं अधिक परिश्रम करना पड़ता है।

पितृसत्तात्मक ढाँचे की चुनौती

सबा ने कहा कि हमारा सामाजिक ढाँचा लंबे समय से पुरुषों की सफलता को केंद्र में रखकर निर्मित हुआ है। इस कारण महिलाओं को अपनी पहचान स्थापित करने के लिए दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है। उन्होंने स्पष्ट किया, "हम आज भी एक पितृसत्तात्मक समाज में रहते हैं, जहाँ महिलाओं की बात आते ही लोग बहुत जल्दी राय बना लेते हैं।"

उन्होंने यह भी जोड़ा कि देश के कई हिस्सों में महिलाओं को स्वतंत्र रूप से काम करने या अपने निर्णय स्वयं लेने की अनुमति अभी भी नहीं है। उनके शब्दों में, "शहरों में शायद हमें यह सच्चाई हमेशा न दिखे, लेकिन यह मौजूद है।"

दोहरी कसौटी का बोझ

सबा ने महिलाओं पर थोपी जाने वाली दोहरी अपेक्षाओं पर भी बात की। उन्होंने कहा, "अगर वे काम करती हैं, तो उन पर उँगलियाँ उठती हैं। अगर वे काम नहीं करतीं, तो भी उन पर उँगलियाँ उठती हैं।" उनके अनुसार महिलाओं से उम्मीदें कभी समाप्त नहीं होतीं, और यही उनके संघर्ष को और कठिन बना देता है।

यह ऐसे समय में आया है जब मनोरंजन उद्योग में महिला नेतृत्व और समान वेतन को लेकर बहस तेज़ हो रही है। गौरतलब है कि बॉलीवुड में भी महिला कलाकार लंबे समय से समान अवसर और पारदर्शी पारिश्रमिक की माँग उठाती रही हैं।

पुरुष अहंकार और बदलाव की राह

पुरुषों के अहंकार के प्रश्न पर सबा ने कहा कि कई पुरुषों को बचपन से यह सिखाया जाता है कि वे महिलाओं से बेहतर हैं। ऐसे में जब वे किसी सशक्त और आत्मनिर्भर महिला को देखते हैं, तो उनकी सोच को चुनौती मिलती है और उनका अहंकार आहत हो सकता है।

हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि बदलाव सीखने की इच्छाशक्ति से आता है। सच को स्वीकार करने से ही समाज आगे बढ़ सकता है।

मज़बूत महिलाओं से सीखने का नज़रिया

सबा ने अपना व्यक्तिगत दृष्टिकोण साझा करते हुए कहा, "जब भी मैं किसी मज़बूत महिला से मिलती हूँ, तो मेरी पहली सोच यही होती है कि मैं उससे कुछ सीखूँ।" उन्होंने महिलाओं की बहु-आयामी क्षमता को रेखांकित करते हुए कहा कि महिलाएँ एक साथ कई काम बड़ी सहजता से कर लेती हैं और उनमें एक ऐसी भावनात्मक दृढ़ता होती है, जिसे समाज अक्सर नज़रअंदाज़ कर देता है।

सबा आजाद का यह बयान उस व्यापक सामाजिक विमर्श को आवाज़ देता है जो महिला सशक्तिकरण की नीतिगत घोषणाओं और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई को उजागर करता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह उस बड़े विरोधाभास को भी उजागर करता है जो सरकारी 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसे अभियानों और ज़मीनी सच्चाई के बीच मौजूद है। मनोरंजन उद्योग, जो खुद को प्रगतिशील मानता है, वहाँ भी महिला कलाकारों को समान पारिश्रमिक और अवसर के लिए संघर्ष करना पड़ता है — यह अनकही सच्चाई मुख्यधारा की कवरेज अक्सर चूक जाती है। महिला सशक्तिकरण का विमर्श तब तक अधूरा रहेगा जब तक घरेलू ज़िम्मेदारियों के असमान बँटवारे और कार्यस्थल पर अदृश्य पूर्वाग्रहों को भी उतनी ही गंभीरता से नहीं लिया जाता।
RashtraPress
17 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सबा आजाद ने महत्वाकांक्षी महिलाओं के बारे में क्या कहा?
सबा आजाद ने कहा कि भारतीय समाज आज भी महत्वाकांक्षी महिलाओं को पूरी तरह स्वीकार नहीं करता और उन्हें पुरुषों से दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है। उनके अनुसार, महिलाओं पर काम करने और न करने — दोनों स्थितियों में उँगलियाँ उठती हैं।
सबा आजाद के अनुसार पितृसत्तात्मक समाज महिलाओं को कैसे प्रभावित करता है?
उनके अनुसार, समाज का ढाँचा पुरुषों की सफलता को केंद्र में रखकर बना है, इसलिए महिलाओं को हर कदम पर खुद को साबित करना पड़ता है। देश के कई हिस्सों में महिलाओं को स्वतंत्र रूप से काम करने या अपने फैसले लेने की इजाज़त अभी भी नहीं है।
सबा आजाद का पुरुष अहंकार पर क्या नज़रिया है?
सबा का कहना है कि कई पुरुषों को बचपन से यह सिखाया जाता है कि वे महिलाओं से बेहतर हैं। जब वे किसी सशक्त और आत्मनिर्भर महिला को देखते हैं, तो उनकी सोच को चुनौती मिलती है और उनका अहंकार आहत हो सकता है।
सबा आजाद के अनुसार समाज में बदलाव कैसे आएगा?
उनका मानना है कि बदलाव सीखने की इच्छाशक्ति से आता है। सच को स्वीकार करने और मज़बूत महिलाओं से प्रेरणा लेने से ही समाज आगे बढ़ सकता है।
सबा आजाद कौन हैं और वे किस संदर्भ में चर्चा में हैं?
सबा आजाद एक भारतीय अभिनेत्री हैं जो हिंदी फिल्म और वेब सीरीज़ में सक्रिय हैं। हाल ही में उन्होंने महिला सशक्तिकरण और पितृसत्तात्मक समाज पर अपने बेबाक विचार साझा किए, जो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बने।
राष्ट्र प्रेस
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