नुसरत फतेह अली खान की वो रात: 'बैंडिट क्वीन' रिकॉर्डिंग में शेखर कपूर की आँखों में तलाशा दर्द
सारांश
मुख्य बातें
फिल्मकार शेखर कपूर ने अपनी चर्चित फिल्म 'बैंडिट क्वीन' के बैकग्राउंड स्कोर की रिकॉर्डिंग से जुड़ा एक भावनात्मक किस्सा साझा किया है, जिसमें उन्होंने बताया कि किस तरह दिवंगत पाकिस्तानी गायक नुसरत फतेह अली खान ने उस दिन अपनी आवाज़ में एक अलग ही दर्द घोला था। यह दर्द महान संगीतकार आर. डी. बर्मन के निधन का था, जो नुसरत के प्रिय कलाकार थे। शेखर कपूर ने इंस्टाग्राम पर यह संस्मरण पोस्ट करते हुए उस पल को 'अपनी ज़िंदगी के सबसे असाधारण अनुभवों में से एक' बताया।
'आप फिल्म देखिए, मैं आपकी आँखों में देखकर गाऊंगा'
शेखर कपूर के अनुसार, रिकॉर्डिंग सत्र शुरू होने से पहले नुसरत फतेह अली खान ने उनसे एक अप्रत्याशित अनुरोध किया। उन्होंने कहा, 'शेखर जी, आप अपनी फिल्म देखिए और मैं आपकी आँखों में देखकर गाऊंगा।' कपूर ने लिखा कि यह उनके लिए अब तक की सबसे अजीब रिक्वेस्ट थी, लेकिन उन्होंने मना नहीं किया।
जिस दृश्य के लिए यह रिकॉर्डिंग हो रही थी, वह फिल्म के सबसे मार्मिक हिस्सों में से एक था — बेहमई नरसंहार के बाद का दृश्य, जिसमें कतार में बनी चिताएं और नदी किनारे विलाप करती महिलाएं दिखाई गई थीं।
आर. डी. बर्मन का शोक और भावनात्मक जुड़ाव
कपूर ने बताया कि उस दिन नुसरत फतेह अली खान विशेष रूप से व्यथित थे, क्योंकि उन्हें आर. डी. बर्मन के निधन की खबर मिली थी। नुसरत उनके संगीत के बड़े प्रशंसक थे। गौरतलब है कि आर. डी. बर्मन ने शेखर कपूर की पहली फिल्म 'मासूम' का संगीत तैयार किया था, इसलिए कपूर और नुसरत के बीच उस शोक की एक साझा भाव-भूमि थी।
कपूर ने लिखा, 'नुसरत जानते थे कि मैं भी आर. डी. बर्मन के काफी करीब था। उनकी आँखों और आवाज़ ने मुझे पूरी तरह बाँध लिया था। उस पल मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मैं किसी दूसरी ही दुनिया में पहुँच गया हूँ।'
जब जीवन और मृत्यु के बीच की दीवार टूट गई
शेखर कपूर ने उस पल की गहराई को बयान करते हुए लिखा कि नुसरत उन्हें एक ऐसे भावनात्मक स्तर पर ले जा रहे थे, 'जहाँ ज़िंदगी और मौत के बीच का अंतर खत्म होता महसूस होता है।' माइक्रोफोन के सामने खड़े नुसरत सिर्फ गा नहीं रहे थे — वे स्वयं उस शोक में डूबे थे जो फिल्म के उस दृश्य की माँग थी।
कपूर ने दर्शकों से अपील की है कि वे 'बैंडिट क्वीन' दोबारा देखें और बेहमई नरसंहार के बाद के दृश्य में बजने वाले संगीत पर विशेष ध्यान दें।
'बैंडिट क्वीन': एक ऐतिहासिक फिल्म
'बैंडिट क्वीन' 1994 में रिलीज हुई थी और यह चंबल की कुख्यात डाकू फूलन देवी के जीवन पर आधारित थी। फिल्म में सीमा बिस्वास ने फूलन देवी का किरदार निभाया था। शेखर कपूर निर्देशित इस फिल्म को देश-विदेश में व्यापक प्रशंसा मिली थी और इसे भारतीय सिनेमा की मील के पत्थर फिल्मों में शुमार किया जाता है।
यह किस्सा न केवल नुसरत फतेह अली खान की असाधारण कलात्मक संवेदनशीलता को उजागर करता है, बल्कि यह भी बताता है कि महान कलाकार अपनी व्यक्तिगत पीड़ा को किस तरह अपनी कला में रूपांतरित कर देते हैं।