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विधु विनोद चोपड़ा को पिता ने मारा थप्पड़: 'फिल्म बनाकर भूखे मरोगे' — फिर ऑस्कर नॉमिनेशन पर पूछा 'पैसे कितने मिलेंगे?'

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विधु विनोद चोपड़ा को पिता ने मारा थप्पड़: 'फिल्म बनाकर भूखे मरोगे' — फिर ऑस्कर नॉमिनेशन पर पूछा 'पैसे कितने मिलेंगे?'

सारांश

फिल्म बनाने की ज़िद पर पिता का थप्पड़, नेशनल स्कॉलरशिप से FTII तक का सफर, और ऑस्कर नॉमिनेशन पर पिता का सवाल — 'पैसे कितने मिलेंगे?' विधु विनोद चोपड़ा की यह दास्तान बताती है कि '3 इडियट्स' और '12वीं फेल' जैसी फिल्में बनाने वाले इस फिल्मकार की असली कहानी खुद किसी फिल्म से कम नहीं।

मुख्य बातें

विधु विनोद चोपड़ा का जन्म 5 सितंबर 1952 को श्रीनगर में हुआ था।
फिल्म बनाने की इच्छा जताने पर पिता ने थप्पड़ मारा और कहा — 'फिल्म बनाकर भूखे मरोगे।' कश्मीर यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स ऑनर्स में टॉप कर नेशनल स्कॉलरशिप से FTII, पुणे में दाखिला लिया।
शॉर्ट फिल्म 'मर्डर एट मंकी हिल' को नेशनल अवॉर्ड मिला; डॉक्यूमेंट्री 'एन एनकाउंटर विद फेसेस' 1979 में ऑस्कर नॉमिनेट हुई।
ऑस्कर नॉमिनेशन की खबर पर पिता ने गले लगाया, फिर पूछा — 'इससे पैसे कितने मिलेंगे?' 'परिंदा' (1989) से लेकर '12वीं फेल' (2023) तक का करियर हिंदी सिनेमा के सबसे विविध और प्रभावशाली करियर में गिना जाता है।

फिल्मकार विधु विनोद चोपड़ा का जन्म 5 सितंबर 1952 को श्रीनगर में हुआ था, लेकिन उनका सिनेमाई सफर किसी फिल्मी परिवार की देन नहीं, बल्कि एक पिता के थप्पड़ और एक बेटे की ज़िद की दास्तान है। 'परिंदा', '1942: ए लव स्टोरी', 'मुन्नाभाई एमबीबीएस', '3 इडियट्स' और '12वीं फेल' जैसी कालजयी फिल्मों के इस निर्माता-निर्देशक ने एक इंटरव्यू में खुलासा किया था कि फिल्म बनाने की इच्छा जताते ही पिता ने उन्हें थप्पड़ मारा था और कहा था कि इस रास्ते पर चलकर भूखे मरोगे।

पिता का थप्पड़ और सपने की शुरुआत

चोपड़ा ने एक इंटरव्यू में बताया था, 'जब मैंने पिता को बताया कि मैं फिल्में बनाना चाहता हूं तो उन्होंने मुझे थप्पड़ जड़ दिया और कहा कि फिल्म बनाकर भूखे मरोगे। मुंबई में कैसे रहोगे?' उनके पिता की चिंता स्वाभाविक थी — परिवार के पास पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) में पढ़ाई के लिए पैसे नहीं थे।

इस रुकावट को पार करने के लिए चोपड़ा ने कश्मीर यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स ऑनर्स में टॉप किया और भारत सरकार की नेशनल स्कॉलरशिप हासिल की। उसी स्कॉलरशिप के पैसों से उन्होंने FTII, पुणे में दाखिला लिया। यह संघर्ष बाद में उनकी फिल्मों के किरदारों में भी झलका।

नेशनल अवॉर्ड से ऑस्कर नॉमिनेशन तक

FTII के दौरान बनाई गई शॉर्ट फिल्म 'मर्डर एट मंकी हिल' (1976) को नेशनल अवॉर्ड मिला। इसके बाद उन्होंने भारत के गरीब और बेसहारा बच्चों की ज़िंदगी पर 'एन एनकाउंटर विद फेसेस' नाम की डॉक्यूमेंट्री बनाई, जिसे 1979 में ऑस्कर के लिए नॉमिनेट किया गया।

यह उपलब्धि जब उन्होंने पिता को बताई, तो पिता ने उन्हें गले लगाया — और फिर सीधे पूछा: 'इससे पैसे कितने मिलेंगे?' चोपड़ा ने बताया कि ऑस्कर नॉमिनेशन के लिए कोई राशि नहीं मिलती। यह किस्सा उनके पिता की उस पीढ़ी की सोच को दर्शाता है, जहाँ कला से अधिक रोज़ी-रोटी की चिंता थी।

फिल्मी करियर का सफर

1989 में आई 'परिंदा' ने चोपड़ा को एक अलग निर्देशक के रूप में स्थापित किया। इस फिल्म में अनिल कपूर, जैकी श्रॉफ, माधुरी दीक्षित और नाना पाटेकर ने अभिनय किया। 1994 में आई '1942: ए लव स्टोरी' आज भी हिंदी सिनेमा की यादगार फिल्मों में शुमार होती है।

इसके बाद 'करीब', 'मिशन कश्मीर' और फिर राजकुमार हिरानी के साथ मिलकर 'मुन्नाभाई एमबीबीएस', 'लगे रहो मुन्नाभाई' और '3 इडियट्स' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों ने उनकी प्रोडक्शन कंपनी को नई ऊँचाइयाँ दीं। बतौर निर्माता 'पीके' और 'संजू' से भी उन्हें बड़ी व्यावसायिक सफलता मिली।

कश्मीर से जुड़ाव और '12वीं फेल'

कश्मीर हमेशा चोपड़ा की रचनात्मकता का केंद्र रहा। 2020 में उन्होंने 'शिकारा' बनाई, जिसमें कश्मीरी पंडितों के विस्थापन की पीड़ा को पर्दे पर उतारा गया। 2023 में आई '12वीं फेल' को दर्शकों और आलोचकों दोनों ने सराहा — यह फिल्म संघर्ष और दृढ़ता की उसी कहानी की याद दिलाती है, जो चोपड़ा ने खुद जी थी।

गौरतलब है कि चोपड़ा केवल निर्देशक या निर्माता नहीं रहे — वे अपनी फिल्मों की कहानी, संपादन और रचनात्मक प्रक्रिया में गहराई से शामिल रहे। एक थप्पड़ से शुरू हुआ यह सफर आज हिंदी सिनेमा के सबसे प्रभावशाली करियर में से एक बन चुका है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिनके लिए कला एक विलासिता थी और रोज़गार एकमात्र मापदंड। दिलचस्प यह है कि जिस पिता ने थप्पड़ मारा, उन्होंने ऑस्कर नॉमिनेशन पर भी पहला सवाल पैसों का पूछा — यह दर्शाता है कि सफलता की परिभाषा और उसकी स्वीकृति हमेशा एक साथ नहीं आती। चोपड़ा की यात्रा इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि '12वीं फेल' जैसी फिल्म में वही संघर्ष-और-दृढ़ता का ताना-बाना है जो उन्होंने खुद जिया। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर उनकी फिल्मों की सफलता गिनाती है — लेकिन वह नींव, जो एक थप्पड़ और एक स्कॉलरशिप से बनी, उतनी ही महत्वपूर्ण है।
RashtraPress
4 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विधु विनोद चोपड़ा के पिता ने उन्हें थप्पड़ क्यों मारा था?
जब विधु विनोद चोपड़ा ने अपने पिता को बताया कि वे फिल्में बनाना चाहते हैं, तो पिता ने उन्हें थप्पड़ मारा और कहा कि 'फिल्म बनाकर भूखे मरोगे।' पिता की चिंता उनके भविष्य और आर्थिक सुरक्षा को लेकर थी, क्योंकि परिवार के पास FTII की फीस देने के पैसे भी नहीं थे।
विधु विनोद चोपड़ा ने FTII में दाखिला कैसे लिया?
चोपड़ा ने कश्मीर यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स ऑनर्स में टॉप करके भारत सरकार की नेशनल स्कॉलरशिप हासिल की। उसी स्कॉलरशिप की राशि से उन्होंने पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) में दाखिला लिया।
विधु विनोद चोपड़ा की कौन-सी फिल्म ऑस्कर के लिए नॉमिनेट हुई थी?
उनकी डॉक्यूमेंट्री 'एन एनकाउंटर विद फेसेस' को 1979 में ऑस्कर के लिए नॉमिनेट किया गया था। यह फिल्म भारत के गरीब और बेसहारा बच्चों की ज़िंदगी पर आधारित थी। इससे पहले FTII के दौरान बनाई गई शॉर्ट फिल्म 'मर्डर एट मंकी हिल' को नेशनल अवॉर्ड भी मिल चुका था।
ऑस्कर नॉमिनेशन पर विधु विनोद चोपड़ा के पिता ने क्या कहा?
ऑस्कर नॉमिनेशन की खबर सुनकर पिता ने पहले उन्हें गले लगाया और खुशी जताई, लेकिन इसके तुरंत बाद पूछा — 'इससे पैसे कितने मिलेंगे?' जब चोपड़ा ने बताया कि नॉमिनेशन के लिए कोई राशि नहीं मिलती, तो यह किस्सा उनके पिता की उस सोच को उजागर करता है जहाँ कमाई ही सफलता की असली कसौटी थी।
विधु विनोद चोपड़ा की प्रमुख फिल्में कौन-सी हैं?
विधु विनोद चोपड़ा ने बतौर निर्देशक 'परिंदा' (1989), '1942: ए लव स्टोरी' (1994), 'मिशन कश्मीर', 'शिकारा' (2020) और '12वीं फेल' (2023) जैसी फिल्में बनाईं। बतौर निर्माता उन्होंने राजकुमार हिरानी के साथ 'मुन्नाभाई एमबीबीएस', 'लगे रहो मुन्नाभाई', '3 इडियट्स', 'पीके' और 'संजू' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में दीं।
राष्ट्र प्रेस
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