विनोद खन्ना: एक्टिंग के सुपरस्टार जो स्पोर्ट्स में भी थे माहिर, सुनील दत्त ने दी थी पहली बड़ी भूमिका

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विनोद खन्ना: एक्टिंग के सुपरस्टार जो स्पोर्ट्स में भी थे माहिर, सुनील दत्त ने दी थी पहली बड़ी भूमिका

सारांश

बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता विनोद खन्ना की पुण्यतिथि पर जानें उनके जीवन के अनछुए पहलू — कैसे पेशावर में जन्मे इस खिलाड़ी को सुनील दत्त ने खलनायक बनाया, कैसे उन्होंने अमिताभ के दौर में भी अपनी पहचान बनाए रखी और आध्यात्म की राह से लौटकर फिर चमके।

Key Takeaways

  • विनोद खन्ना का जन्म 6 अक्टूबर 1946 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में हुआ था और विभाजन के बाद उनका परिवार मुंबई आ गया।
  • सुनील दत्त ने फिल्म 'मन का मीत' में खलनायक की भूमिका देकर विनोद खन्ना को बॉलीवुड में पहला बड़ा मौका दिया था।
  • विनोद खन्ना टेनिस, फुटबॉल, क्रिकेट और कुश्ती में माहिर थे और उनकी फिटनेस उनकी खेल साधना का परिणाम थी।
  • 1978 में करियर के शिखर पर रहते हुए उन्होंने अध्यात्म की राह चुनी और 1985 में जोरदार वापसी की।
  • 1974 में फिल्म 'हाथ की सफाई' के लिए सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार और 1999 में लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड मिला।
  • 27 अप्रैल 2017 को विनोद खन्ना का निधन हुआ; उनके बेटे अक्षय खन्ना और राहुल खन्ना आज भी बॉलीवुड में सक्रिय हैं।

मुंबईविनोद खन्ना बॉलीवुड के उन चुनिंदा अभिनेताओं में से एक थे जिन्होंने खलनायक से सुपरहीरो तक का सफर महज अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर तय किया। 27 अप्रैल 2017 को दुनिया से विदा हुए इस दिग्गज अभिनेता की पुण्यतिथि पर राष्ट्र प्रेस उनके जीवन के उन पहलुओं को सामने ला रहा है जो अक्सर चर्चा से बाहर रह जाते हैं — उनका खेलों के प्रति जुनून, उनकी आध्यात्मिक यात्रा और बॉलीवुड में उनकी अविस्मरणीय वापसी।

पेशावर से मुंबई तक का सफर

विनोद खन्ना का जन्म 6 अक्टूबर 1946 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में हुआ था। 1947 के विभाजन के बाद उनका परिवार मुंबई आ बसा। उन्होंने दिल्ली और मुंबई दोनों शहरों में शिक्षा ग्रहण की और मुंबई के सिडनहम कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

विभाजन की पीड़ा झेलने वाले परिवार से आए विनोद खन्ना ने संघर्ष को बचपन से ही करीब से देखा था। यही संघर्ष बाद में उनके अभिनय में एक गहराई और सच्चाई के रूप में झलकता था, जो दर्शकों को सहज ही अपनी ओर खींचती थी।

खेलों के प्रति जुनून — टेनिस, फुटबॉल और कुश्ती

बहुत कम लोग जानते हैं कि विनोद खन्ना न केवल एक बेहतरीन अभिनेता थे, बल्कि खेलों में भी उनकी गहरी रुचि थी। बचपन से ही वे टेनिस, फुटबॉल और क्रिकेट के दीवाने थे। युवावस्था में उन्होंने कुश्ती भी सीखी, जिसने उनकी शारीरिक काया को और मजबूत बनाया।

उनकी आकर्षक देहयष्टि और प्रभावशाली व्यक्तित्व स्पोर्ट्स की इसी साधना का परिणाम था। स्कूल के दिनों में उन्होंने कई नाटकों में भी हिस्सा लिया, जिसने उनके अभिनय की नींव रखी। यह दोहरी प्रतिभा — खेल और कला — ही उन्हें अपने समकालीन अभिनेताओं से अलग करती थी।

सुनील दत्त ने बनाया 'खलनायक' — इंडस्ट्री में पहला कदम

विनोद खन्ना को बॉलीवुड में पहला बड़ा मौका देने का श्रेय जाता है दिग्गज अभिनेता और निर्माता सुनील दत्त को। सुनील दत्त ने अपनी फिल्म 'मन का मीत' में विनोद खन्ना को खलनायक की भूमिका सौंपी। इस फिल्म में लीना चंदावरकर नायिका थीं और विनोद खन्ना ने सोम दत्त के विरुद्ध नकारात्मक किरदार निभाया।

यह एक साहसिक निर्णय था — एक नए चेहरे को सीधे खलनायक की भूमिका में उतारना। लेकिन विनोद खन्ना ने इस मौके को दोनों हाथों से थामा और अपने दमदार अभिनय से दर्शकों और निर्देशकों का ध्यान खींचा। यही वह मोड़ था जहां से एक नए सितारे का उदय हुआ।

विविधता से भरा फिल्मी सफर — गुलजार से लेकर एक्शन तक

1971 में गुलजार की फिल्म 'मेरे अपने' में नायक की भूमिका मिलते ही विनोद खन्ना के करियर ने नई दिशा पकड़ी। गुलजार ने उन्हें 'मीरा' और 'इम्तिहान' जैसी संजीदा फिल्मों में भी अहम किरदार दिए।

वहीं एक्शन की दुनिया में भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। 'कच्चे धागे', 'अमर अकबर एंथनी', 'खून पसीना', 'हेरा फेरी', 'मेरा गांव मेरा देश' और 'आखिरी डाकू' जैसी फिल्मों में उनका दबदबा रहा। अमिताभ बच्चन के स्वर्णिम दौर में भी विनोद खन्ना की अपनी अलग छाप थी — जब भी दोनों साथ आए, टक्कर बराबर की रही।

1974 में फिल्म 'हाथ की सफाई' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। यह पुरस्कार इस बात का प्रमाण था कि वे केवल दर्शनीय चेहरा नहीं, बल्कि एक सशक्त कलाकार थे।

आध्यात्मिक मोड़ और जोरदार वापसी

1978 में जब विनोद खन्ना अपने करियर के शिखर पर थे, तभी उन्होंने एक अप्रत्याशित निर्णय लिया। बाहरी सफलता के बावजूद भीतर से खालीपन महसूस करने लगे और ओशो रजनीश के आश्रम से जुड़कर अध्यात्म की राह पर चल पड़े। कई वर्षों तक वे फिल्म इंडस्ट्री से दूर रहे।

यह वह दौर था जब उनके प्रशंसक उन्हें याद करते रहे। लेकिन 1985 में उन्होंने धमाकेदार वापसी की। फिरोज खान की फिल्म 'दयावान' में डॉन की भूमिका और 'सत्यमेव जयते' जैसी फिल्मों ने उन्हें एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया। यह वापसी इस बात का प्रमाण थी कि असली प्रतिभा कभी धुंधली नहीं पड़ती।

करियर के अंतिम चरण में उन्होंने 'वांटेड' और 'दबंग' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों में सलमान खान के पिता की भूमिका निभाई, जो दर्शकों के दिल में आज भी बसी है। 1999 में उन्हें फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से नवाजा गया। उनके दोनों बेटे अक्षय खन्ना और राहुल खन्ना भी अभिनय की दुनिया में सक्रिय हैं। अक्षय खन्ना को विनोद खन्ना ने खुद अपनी फिल्म 'हिमालय पुत्र' से लॉन्च किया था।

विनोद खन्ना का जीवन सिनेमा की उस विरासत का प्रतीक है जहां व्यक्तित्व, प्रतिभा और साहसिक निर्णय मिलकर एक अमर कहानी गढ़ते हैं। उनकी पुण्यतिथि पर उनकी फिल्मों और जीवन-दर्शन को याद करना हर सिनेप्रेमी के लिए एक सच्ची श्रद्धांजलि है।

Point of View

बल्कि यह उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है जिसने विभाजन की पीड़ा से उठकर शिखर छुआ। यह विडंबना ही है कि जिस दौर में अमिताभ बच्चन का एकछत्र राज था, उसी दौर में विनोद खन्ना ने अपनी अलग पहचान बनाए रखी — यह उनकी असाधारण प्रतिभा का प्रमाण है। उनका आध्यात्मिक मोड़ और फिर जोरदार वापसी यह दर्शाती है कि व्यावसायिक सफलता और आत्मिक खोज के बीच संतुलन बनाना कितना दुर्लभ साहस मांगता है। आज जब बॉलीवुड में स्टारडम महज सोशल मीडिया फॉलोअर्स से मापा जाता है, विनोद खन्ना जैसे कलाकार याद दिलाते हैं कि असली स्टार वह होता है जो पर्दे पर नहीं, दर्शकों के दिल पर राज करे।
NationPress
27/04/2026

Frequently Asked Questions

विनोद खन्ना को बॉलीवुड में पहला मौका किसने दिया था?
विनोद खन्ना को बॉलीवुड में पहला बड़ा मौका दिग्गज अभिनेता-निर्माता सुनील दत्त ने दिया था। उन्होंने अपनी फिल्म 'मन का मीत' में विनोद खन्ना को खलनायक की भूमिका सौंपी, जहां वे सोम दत्त के विरुद्ध नकारात्मक किरदार में नजर आए।
विनोद खन्ना का जन्म कब और कहां हुआ था?
विनोद खन्ना का जन्म 6 अक्टूबर 1946 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में हुआ था। 1947 के विभाजन के बाद उनका परिवार मुंबई आ गया और उन्होंने मुंबई के सिडनहम कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की।
विनोद खन्ना ने अचानक फिल्में क्यों छोड़ दी थीं?
1978 में करियर के शिखर पर रहते हुए विनोद खन्ना को भीतर से गहरा खालीपन महसूस होने लगा था। इसके बाद वे ओशो रजनीश के आश्रम से जुड़कर अध्यात्म की राह पर चल पड़े और कई वर्षों तक फिल्म इंडस्ट्री से दूर रहे।
विनोद खन्ना को कौन-कौन से प्रमुख पुरस्कार मिले?
विनोद खन्ना को 1974 में फिल्म 'हाथ की सफाई' के लिए सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। इसके अलावा 1999 में उन्हें फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।
विनोद खन्ना का निधन कब हुआ और उनके बच्चे कौन हैं?
विनोद खन्ना का निधन 27 अप्रैल 2017 को गंभीर बीमारी के कारण हुआ। उनके दो बेटे अक्षय खन्ना और राहुल खन्ना हैं, जो दोनों अभिनेता हैं। अक्षय खन्ना को विनोद खन्ना ने खुद अपनी फिल्म 'हिमालय पुत्र' से लॉन्च किया था।
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