'ब्लैक फ्राइडे' की रिलीज रोकना सही था — विक्रम भट्ट ने सेंसर बोर्ड के फैसले का किया बचाव
सारांश
मुख्य बातें
फिल्ममेकर विक्रम भट्ट ने 23 जून 2026 को दिए एक इंटरव्यू में निर्देशक अनुराग कश्यप की चर्चित फिल्म 'ब्लैक फ्राइडे' की रिलीज पर लगी रोक को उचित ठहराया। उन्होंने कहा कि जब 1993 मुंबई बम धमाकों से जुड़े मामले अदालत में विचाराधीन थे, तब उस विषय पर आधारित फिल्म को रिलीज करना न्यायिक प्रक्रिया के साथ अनुचित हस्तक्षेप हो सकता था।
विक्रम भट्ट ने क्या कहा
भट्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'मुझे 'ब्लैक फ्राइडे' काफी अच्छी फिल्म लगी। यह सिनेमा का शानदार उदाहरण है, लेकिन जिस समय फिल्म रिलीज होने वाली थी, उस वक्त हालात अलग थे।' उन्होंने जोड़ा कि 1993 मुंबई बम धमाकों से जुड़े कई मामले उस दौरान अदालत में चल रहे थे और अंतिम फैसला आना बाकी था।
भट्ट के अनुसार, 'अगर कोई मामला अदालत में विचाराधीन हो और उस पर आधारित फिल्म रिलीज कर दी जाए, तो उसका असर लोगों की सोच पर पड़ सकता है।' उन्होंने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के रुख को सही ठहराते हुए कहा कि एक सरकारी संस्था होने के नाते बोर्ड की जिम्मेदारी थी कि वह सुनिश्चित करे कि किसी लंबित कानूनी मामले पर ऐसा कंटेंट न आए जो जनमत को प्रभावित करे।
'दिल्ली क्राइम' से की तुलना
भट्ट ने निर्भया कांड पर बनी वेब सीरीज 'दिल्ली क्राइम' का उदाहरण देते हुए अपनी बात को और स्पष्ट किया। उन्होंने कहा, 'जैसे बाद में निर्भया केस पर 'दिल्ली क्राइम' सीरीज बनी और दर्शकों ने उसे पसंद भी किया। ऐसा इसलिए संभव हो पाया, क्योंकि उस मामले में कानूनी प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी।' उनका तर्क था कि न्यायिक फैसला आने के बाद किसी संवेदनशील विषय पर फिल्म बनाना और रिलीज करना दोनों ही आसान और उचित हो जाता है।
'ब्लैक फ्राइडे' का विवादित सफर
गौरतलब है कि 'ब्लैक फ्राइडे' लेखक एस. हुसैन जैदी की किताब पर आधारित थी और इसमें 1993 मुंबई बम धमाकों की जाँच और उससे जुड़े घटनाक्रम को दर्शाया गया था। फिल्म का प्रीमियर 2004 में हुआ था, किंतु कानूनी कारणों से इसे सिनेमाघरों में रिलीज की अनुमति नहीं मिली। आखिरकार अदालत का फैसला आने के बाद 2007 में फिल्म को रिलीज की मंजूरी मिली, और तब इसे दर्शकों व समीक्षकों दोनों की भरपूर सराहना मिली।
सेंसरशिप बनाम कलात्मक स्वतंत्रता की बहस
यह ऐसे समय में आया है जब फिल्मों पर सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो रही है। भट्ट का यह बयान उन फिल्मकारों की राय से अलग है जो मानते हैं कि न्यायिक प्रक्रिया के नाम पर कलात्मक अभिव्यक्ति को नहीं रोका जाना चाहिए। 'ब्लैक फ्राइडे' का मामला भारतीय सिनेमा में इस बहस का एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु बना हुआ है।