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विशाल भारद्वाज ने 'मकबूल' के लिए छोड़ी ₹30 लाख की फीस, आज तक नहीं मिला एक रुपया

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विशाल भारद्वाज ने 'मकबूल' के लिए छोड़ी ₹30 लाख की फीस, आज तक नहीं मिला एक रुपया

सारांश

₹30 लाख की फीस छोड़ी, बदले में मिली अमर पहचान — विशाल भारद्वाज की 'मकबूल' की कहानी सिर्फ एक फिल्म की नहीं, उस जुनून की है जो पैसे से नहीं तौला जाता। क्रिकेट के मैदान से भोपाल की हवेली तक का यह सफर बताता है कि असली कलाकार कभी-कभी सबसे बड़ा दांव तब लगाता है जब जेब खाली हो।

मुख्य बातें

विशाल भारद्वाज ने 'मकबूल' की शूटिंग पूरी करने के लिए अपनी ₹30 लाख की निर्देशक फीस छोड़ दी थी।
उनके अपने बयान के अनुसार, 'मकबूल' से उन्हें आज तक कोई आर्थिक लाभ नहीं मिला।
विशाल का जन्म 4 अगस्त 1965 को बिजनौर, उत्तर प्रदेश में हुआ; वह उत्तर प्रदेश अंडर-19 क्रिकेट टीम के लिए भी खेल चुके थे।
'मकबूल' (2003) विलियम शेक्सपियर के नाटक 'मैकबेथ' पर आधारित थी और भोपाल की एक हवेली में शूट की गई।
विशाल को अब तक नौ राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुके हैं; उनकी फिल्में कान्स और टोरंटो फिल्म समारोहों में प्रदर्शित हो चुकी हैं।
गीतकार गुलजार के साथ उनकी जोड़ी हिंदी सिनेमा की सबसे सफल रचनात्मक साझेदारियों में मानी जाती है।

फिल्मकार विशाल भारद्वाज ने अपनी चर्चित फिल्म 'मकबूल' को पूरा करने के लिए निर्देशक के रूप में अपनी पूरी ₹30 लाख की फीस छोड़ दी थी — और उनके अपने बयान के अनुसार, इस फिल्म से उन्हें आज तक कोई आर्थिक लाभ नहीं मिला। बावजूद इसके, 2003 में रिलीज़ हुई यह फिल्म भारतीय सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ कृतियों में गिनी जाती है और विशाल के करियर की सबसे यादगार उपलब्धि बनी।

बचपन से क्रिकेट तक का सफर

विशाल भारद्वाज का जन्म 4 अगस्त 1965 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के चांदपुर में हुआ था। उनका बचपन नजीबाबाद और मेरठ में बीता। उनके पिता राम भारद्वाज गन्ना निरीक्षक थे और हिंदी फिल्मों के लिए गीत व कविताएँ भी लिखते थे। घर के इस साहित्यिक-संगीतमय माहौल ने विशाल को बचपन से ही संगीत की ओर खींचा।

दिलचस्प बात यह है कि उनका पहला सपना फिल्में नहीं, बल्कि क्रिकेट था। वह उत्तर प्रदेश की अंडर-19 टीम के लिए खेल चुके थे, लेकिन अभ्यास के दौरान अंगूठे में गंभीर चोट ने उनका क्रिकेट करियर समाप्त कर दिया। विशाल ने कई बार कहा है कि यदि वह चोट न लगती, तो शायद वे कभी फिल्म निर्देशक नहीं बनते।

संगीत से फिल्मी दुनिया तक का रास्ता

महज 17 साल की उम्र में विशाल ने अपना पहला गीत तैयार किया, जिसे उनके पिता ने संगीतकार उषा खन्ना को सुनाया और वह गीत फिल्म 'यार कसम' में शामिल हुआ। इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से पढ़ाई की, जहाँ उनकी मुलाकात रेखा भारद्वाज से हुई — जो आगे चलकर उनकी जीवनसंगिनी बनीं।

1995 में फिल्म 'अभय' से बतौर संगीतकार उन्होंने अपना सफर शुरू किया। इसके बाद 'माचिस' के संगीत ने उन्हें फिल्मफेयर का आर.डी. बर्मन पुरस्कार दिलाया। 'सत्या', 'गॉडमदर' और अन्य फिल्मों में उनके संगीत ने उद्योग में उनकी पहचान और मजबूत की। 'गॉडमदर' के लिए उन्हें पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला।

₹30 लाख की कुर्बानी और 'मकबूल' की कहानी

संगीत में सफलता के बाद विशाल ने 2002 में बच्चों की फिल्म 'मकड़ी' से निर्देशन में कदम रखा। इसके बाद 2003 में आई 'मकबूल'विलियम शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक 'मैकबेथ' पर आधारित — ने उन्हें एक बिल्कुल अलग पहचान दी।

विशाल ने एक इंटरव्यू में बताया था कि 'मकबूल' की शूटिंग भोपाल की एक हवेली में करना उनके लिए रचनात्मक रूप से अनिवार्य था, लेकिन निर्माता के पास उतना बजट नहीं था। तब सुझाव आया कि यदि विशाल अपनी ₹30 लाख की निर्देशक फीस छोड़ दें, तो वही राशि शूटिंग पर लगाई जा सकती है। विशाल ने बिना हिचकिचाहट के यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

गौरतलब है कि उस दौर में इस फिल्म पर भरोसा करने वाले बहुत कम लोग थे — बजट सीमित था, कई कलाकार इस तरह के प्रयोगात्मक प्रोजेक्ट से कतरा रहे थे। फिर भी विशाल ने अपनी दृष्टि पर भरोसा रखा।

सम्मान जो पैसे से बड़ा निकला

विशाल ने बाद में खुद स्वीकार किया कि 'मकबूल' से उन्हें आज तक कोई आर्थिक कमाई नहीं हुई। लेकिन उनके अनुसार, इस फिल्म ने उन्हें जो सम्मान, पहचान और विश्वसनीयता दी, वह किसी भी रकम से कहीं बड़ी थी। यही वजह है कि 'मकबूल' आज भी भारतीय सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में शुमार होती है।

आगे का सफर और पुरस्कार

'मकबूल' के बाद विशाल ने 'ओमकारा' और 'हैदर' से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। 'कमीने', '7 खून माफ', 'मटरू की बिजली का मंडोला', 'रंगून', 'खुफिया' और 'चार्ली चोपड़ा एंड द मिस्ट्री ऑफ सोलांग वैली' जैसी फिल्मों में उनकी अलग सोच की छाप स्पष्ट रही। निर्माता के रूप में 'इश्किया', 'डेढ़ इश्किया' और 'तलवार' ने भी खूब सराहना पाई।

गीतकार गुलजार के साथ उनकी जोड़ी हिंदी सिनेमा की सबसे सफल जोड़ियों में मानी जाती है। विशाल ने कई बार कहा है कि संगीत उनका पहला प्यार है और उन्होंने निर्देशन इसीलिए अपनाया ताकि अपनी फिल्मों में अपनी पसंद का संगीत खुद रच सकें। अब तक उन्हें नौ राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, कई फिल्मफेयर पुरस्कार और कान्सटोरंटो जैसे अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में प्रतिनिधित्व मिल चुका है। यह सफर साबित करता है कि कभी-कभी सबसे बड़ा निवेश वह होता है जो बैंक खाते में नहीं, बल्कि कला के इतिहास में दर्ज होता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

उसने अपने रचनाकार को आर्थिक रूप से कुछ नहीं दिया। यह सवाल उठाता है कि क्या भारतीय फिल्म उद्योग में कलात्मक जोखिम उठाने वाले फिल्मकारों के लिए कोई टिकाऊ वित्तीय ढाँचा है, या यह जुनून हमेशा एकतरफा सौदा ही रहेगा।
RashtraPress
3 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

विशाल भारद्वाज ने 'मकबूल' के लिए अपनी फीस क्यों छोड़ी?
विशाल भारद्वाज ने अपनी ₹30 लाख की निर्देशक फीस इसलिए छोड़ी क्योंकि निर्माता के पास भोपाल की हवेली में शूटिंग के लिए पर्याप्त बजट नहीं था। उनकी फीस की राशि सीधे फिल्म की शूटिंग पर लगाई गई, ताकि उनका रचनात्मक विज़न पूरा हो सके।
क्या विशाल भारद्वाज को 'मकबूल' से कोई पैसा मिला?
विशाल भारद्वाज ने खुद एक इंटरव्यू में बताया कि 'मकबूल' से उन्हें आज तक कोई आर्थिक कमाई नहीं हुई। हालाँकि उनके अनुसार इस फिल्म ने उन्हें जो सम्मान और पहचान दी, वह किसी भी रकम से बड़ी है।
'मकबूल' फिल्म किस पर आधारित है?
'मकबूल' (2003) विलियम शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक 'मैकबेथ' पर आधारित है। इसे भोपाल की एक हवेली में शूट किया गया था और यह विशाल भारद्वाज की शेक्सपियर त्रयी की पहली फिल्म मानी जाती है।
विशाल भारद्वाज का फिल्मी करियर कब और कैसे शुरू हुआ?
विशाल भारद्वाज ने 1995 में फिल्म 'अभय' से बतौर संगीतकार अपना करियर शुरू किया। 'माचिस' के संगीत ने उन्हें फिल्मफेयर का आर.डी. बर्मन पुरस्कार दिलाया और 'गॉडमदर' के लिए उन्हें पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
विशाल भारद्वाज को कितने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले हैं?
विशाल भारद्वाज को अब तक नौ राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुके हैं। इसके अलावा उनकी फिल्में कान्स और टोरंटो जैसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भी प्रदर्शित हो चुकी हैं।
राष्ट्र प्रेस
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