जरीना वहाब: सांवले रंग की वजह से ठुकराई गई अभिनेत्री जो बनी 'चितचोर' की अमर नायिका
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा की प्रतिभाशाली अभिनेत्री जरीना वहाब का सफर यह साबित करता है कि असली प्रतिभा को कोई भी पूर्वग्रह रोक नहीं सकता। एक ऐसे दौर में जब फिल्म इंडस्ट्री में गोरे रंग को तरजीह दी जाती थी, जरीना को उनके सांवले रंग और लुक की वजह से कई बार नकारा गया — लेकिन उन्होंने अपने अभिनय के बल पर वह मुकाम हासिल किया जो शायद उनके आलोचकों ने कभी नहीं सोचा था। 1976 में आई बासु चटर्जी निर्देशित फिल्म 'चितचोर' ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई और हिंदी सिनेमा की एक यादगार नायिका के रूप में स्थापित किया।
प्रारंभिक जीवन और प्रशिक्षण
जरीना वहाब का जन्म 17 जुलाई 1959 को आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में हुआ था। बचपन से ही अभिनय के प्रति गहरी रुचि रखने वाली जरीना ने अपना सपना पूरा करने के लिए पुणे स्थित प्रतिष्ठित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) से विधिवत अभिनय प्रशिक्षण लिया। तेलुगु, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी — चार भाषाओं पर उनकी पकड़ ने आगे चलकर उन्हें न केवल हिंदी, बल्कि दक्षिण भारतीय सिनेमा में भी काम दिलाया।
संघर्ष और शुरुआती रुकावटें
FTII से प्रशिक्षित होने के बावजूद जरीना के लिए फिल्म इंडस्ट्री के दरवाजे आसानी से नहीं खुले। कथित तौर पर उनके सांवले रंग को लेकर इंडस्ट्री में सवाल उठाए गए और बताया जाता है कि फिल्म जगत के दिग्गज राज कपूर से भी उन्हें नकारात्मक प्रतिक्रिया मिली थी। यह भी कहा जाता है कि फिल्म 'गुड्डी' के लिए उनका नाम विचार में था, लेकिन वह भूमिका अंततः जया बच्चन को मिली। इन झटकों के बावजूद जरीना ने हार नहीं मानी।
पहला मौका और पहचान
जरीना को पहला अवसर 1974 में देव आनंद निर्मित, निर्देशित और अभिनीत फिल्म 'इश्क इश्क इश्क' से मिला। इस फिल्म में जीनत अमान, शबाना आजमी और कबीर बेदी जैसे नामी कलाकार थे, और जरीना ने जीनत अमान की बहन का किरदार निभाया। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर अपेक्षित सफलता नहीं पा सकी, लेकिन जरीना के अभिनय ने ध्यान खींचा और धीरे-धीरे उन्हें नए प्रस्ताव मिलने लगे।
चितचोर: करियर का टर्निंग पॉइंट
1976 में बासु चटर्जी के निर्देशन में बनी फिल्म 'चितचोर' जरीना वहाब के करियर की सबसे निर्णायक पारी साबित हुई। इस फिल्म में उन्होंने गीता नामक एक सरल, मासूम लड़की का किरदार जीया। अमोल पालेकर के साथ उनकी जोड़ी दर्शकों के दिलों में उतर गई। फिल्म की अपार सफलता के बाद जरीना वहाब एक स्थापित नाम बन गईं। इसके बाद 'घरौंदा', 'अगर', 'सावन को आने दो', 'गोपाल कृष्णा', 'नैया', 'सितारा' और 'अनपढ़' जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को व्यापक सराहना मिली। 'घरौंदा' के लिए उन्हें 1977 में फिल्मफेयर अवॉर्ड की बेस्ट एक्ट्रेस श्रेणी में नामांकन भी मिला।
बहुआयामी करियर और व्यक्तिगत जीवन
हिंदी के अलावा जरीना ने तमिल, तेलुगु और मलयालम सिनेमा में भी अपनी छाप छोड़ी। समय के साथ उन्होंने माँ, सास और सशक्त महिला किरदारों को भी सफलतापूर्वक निभाया। 2010 में आई शाहरुख खान अभिनीत फिल्म 'माय नेम इज खान' में उन्होंने रिजवान खान की माँ का भावपूर्ण रोल निभाया, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा। इसके बाद भी वह फिल्मों, टीवी धारावाहिकों और वेब सीरीज में सक्रिय रहीं। निजी जीवन में जरीना ने 1986 में अभिनेता आदित्य पंचोली से विवाह किया। दोनों की मुलाकात फिल्म 'कलंक का टीका' के सेट पर हुई थी। उनके दो बच्चे हैं — बेटी सना और बेटा सूरज पंचोली। जरीना वहाब का सफर आज भी उन तमाम कलाकारों के लिए प्रेरणा है जो बाहरी दिखावे की बजाय अपनी कला को अपनी पहचान बनाना चाहते हैं।