अंजलि मुद्रा से हृदय और फेफड़े होते हैं मजबूत, जानें शरीर पर इसका गहरा प्रभाव
सारांश
Key Takeaways
- अंजलि मुद्रा को नमस्ते मुद्रा या प्रार्थना मुद्रा भी कहा जाता है और यह हृदय व फेफड़ों के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है।
- इस मुद्रा के दौरान गहरी सांस लेने से फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ती है और शरीर में ऑक्सीजन का स्तर बेहतर होता है।
- मानसिक तनाव कम होने से रक्तचाप और हृदय गति नियंत्रित रहती है, जिससे हृदय रोग का खतरा घटता है।
- यह मुद्रा मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों में संतुलन बनाकर एकाग्रता और स्मरण शक्ति को बेहतर बनाती है।
- प्रतिदिन ५ से १० मिनट के अभ्यास से हाथों, कलाई और बांहों की मांसपेशियों में लचीलापन आता है।
- WHO के अनुसार हृदय रोग विश्व में मृत्यु का प्रमुख कारण है, ऐसे में अंजलि मुद्रा जैसे योगाभ्यास राष्ट्रीय स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं।
नई दिल्ली, 24 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। अंजलि मुद्रा — जिसे नमस्ते मुद्रा या प्रार्थना मुद्रा भी कहते हैं — न केवल एक आध्यात्मिक संकेत है, बल्कि यह हृदय और फेफड़ों को सक्रिय और स्वस्थ रखने का एक वैज्ञानिक रूप से समर्थित योगाभ्यास भी है। आज की तनावग्रस्त जीवनशैली में जब हृदय रोग और श्वसन संबंधी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं, तब यह सरल मुद्रा एक प्रभावशाली उपाय के रूप में उभर रही है।
क्या है अंजलि मुद्रा और कैसे की जाती है
अंजलि मुद्रा में दोनों हथेलियों को एक-दूसरे से मिलाकर हृदय चक्र के सामने रखा जाता है। यह मुद्रा योग और ध्यान के अभ्यास में प्राचीन काल से उपयोग की जाती रही है। इसे बैठकर, खड़े होकर या ध्यान की अवस्था में किया जा सकता है।
योग विशेषज्ञों के अनुसार, जब दोनों हथेलियां आपस में मिलती हैं, तो शरीर और मस्तिष्क के बीच एक ऊर्जा संतुलन स्थापित होता है। इस प्रक्रिया में तंत्रिका तंत्र (Nervous System) शांत होने लगता है और सांसों की लय स्वाभाविक रूप से धीमी व गहरी हो जाती है।
फेफड़ों पर अंजलि मुद्रा का प्रभाव
जब इस मुद्रा के अभ्यास के दौरान व्यक्ति गहरी और धीमी सांस लेता है, तो फेफड़ों तक ऑक्सीजन का प्रवाह बेहतर होता है। इससे फेफड़ों की कार्यक्षमता (Lung Capacity) धीरे-धीरे बढ़ती है और श्वसन प्रक्रिया अधिक संतुलित हो जाती है।
जो लोग तनाव के कारण तेज और उथली सांस लेने की समस्या से पीड़ित हैं या जल्दी थकान महसूस करते हैं, उनके लिए यह मुद्रा विशेष रूप से लाभकारी मानी जाती है। नियमित अभ्यास से शरीर में ऑक्सीजन का स्तर बेहतर होता है, जिससे ऊर्जा बनी रहती है और थकान कम होती है।
प्रदूषण और अनियमित दिनचर्या के कारण आज बड़ी संख्या में लोग फेफड़ों की कमजोरी से जूझ रहे हैं। ऐसे में अंजलि मुद्रा का नियमित अभ्यास एक सहज और सुलभ उपाय साबित हो सकता है।
हृदय स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर
अंजलि मुद्रा का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव हृदय पर देखा जाता है। यह मुद्रा सीने के मध्य भाग यानी अनाहत चक्र (हार्ट चक्र) पर ध्यान केंद्रित करती है। शांत मन से इस मुद्रा का अभ्यास करने पर मानसिक तनाव में उल्लेखनीय कमी आती है।
चिकित्सा विज्ञान भी यह मानता है कि अत्यधिक मानसिक दबाव सीधे रक्तचाप (Blood Pressure) और हृदय गति (Heart Rate) को प्रभावित करता है। जब तनाव कम होता है, तो हृदय की कार्यप्रणाली पर पड़ने वाला अनावश्यक बोझ भी घटता है। इस प्रकार यह मुद्रा हृदय रोग के जोखिम को कम करने में सहायक हो सकती है।
मस्तिष्क और शरीर पर समग्र लाभ
अंजलि मुद्रा मस्तिष्क के बाएं और दाएं गोलार्ध के बीच संतुलन स्थापित करने में भी सहायक मानी जाती है। इससे एकाग्रता बढ़ती है, सोचने-समझने की क्षमता तेज होती है और निर्णय लेने की प्रक्रिया बेहतर होती है।
शारीरिक दृष्टि से भी यह मुद्रा लाभदायक है। इसके अभ्यास से हाथों, कलाई और बांहों की मांसपेशियों में लचीलापन आता है। घंटों कंप्यूटर या मोबाइल पर काम करने वाले लोगों के लिए यह एक सरल और राहतदायक व्यायाम है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के अनुसार, हृदय रोग वैश्विक स्तर पर मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है। भारत में भी युवाओं में हृदयाघात के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में योग और मुद्रा अभ्यास को दैनिक जीवन में शामिल करना न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए, बल्कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी हो गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंजलि मुद्रा को प्रतिदिन ५ से १० मिनट तक नियमित रूप से किया जाए, तो कुछ ही हफ्तों में इसका सकारात्मक प्रभाव स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है। आने वाले समय में जैसे-जैसे योग को लेकर वैज्ञानिक शोध बढ़ रहे हैं, अंजलि मुद्रा जैसी सरल तकनीकें स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में और भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की ओर अग्रसर हैं।