आयुष मंत्रालय ने समझाया आयुर्वेद आहार का महत्व: आहार, परंपरा और मानक हैं तीन स्तंभ
सारांश
मुख्य बातें
आयुष मंत्रालय ने 11 सितंबर 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के ज़रिए आयुर्वेद आहार की अवधारणा को विस्तार से समझाया और बताया कि यह केवल स्वाद का विषय नहीं, बल्कि संपूर्ण स्वास्थ्य का आधार है। मंत्रालय के अनुसार, आयुर्वेद आहार को समझने के लिए तीन मूलभूत तत्वों — आहार, परंपरा और मानक — पर ध्यान देना आवश्यक है।
आयुर्वेद आहार क्या है
आयुर्वेद आहार वह आहार-व्यवस्था है जो सदियों पुराने आयुर्वेदिक सिद्धांतों और पारंपरिक ज्ञान पर आधारित है। आयुष मंत्रालय के अनुसार, इसे समझने के लिए केवल भोजन की सामग्री पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है — इसके साथ-साथ भारतीय परंपरा और भोजन से जुड़े निर्धारित मानकों को भी जानना ज़रूरी है। यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब भारत में लोग अपने खान-पान को लेकर पहले से कहीं अधिक सजग हो रहे हैं।
तीन मूलभूत स्तंभ
मंत्रालय ने आयुर्वेद आहार को तीन बिंदुओं में स्पष्ट किया। पहला है आहार — अर्थात् हम प्रतिदिन जो कुछ खाते और पीते हैं। आयुर्वेद में भोजन को केवल भूख शांत करने का साधन नहीं माना जाता; इसे जीवनशैली और समग्र स्वास्थ्य से जोड़कर देखा जाता है।
दूसरा स्तंभ है परंपरा। भारत में भोजन का ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता रहा है। अलग-अलग क्षेत्रों में जलवायु, स्थानीय उपलब्धता और पारंपरिक समझ के आधार पर भोजन तैयार करने के विशिष्ट तरीके प्रचलित हैं — यही पारंपरिक ज्ञान आयुर्वेद आहार की नींव है।
तीसरा स्तंभ है मानक। किसी भी खाद्य पदार्थ के उत्पादन और उससे जुड़ी सूचनाओं को व्यवस्थित रखने के लिए स्पष्ट नियम आवश्यक हैं। ये मानक उत्पादन और लेबलिंग को एक ज़िम्मेदार ढाँचे में बनाए रखते हैं।
नियामक व्यवस्था: FSSAI का ढाँचा
खाद्य सुरक्षा और मानक (आयुर्वेद आहार) विनियम, 2022 के अंतर्गत आयुर्वेद आहार उत्पादों के लिए एक विशेष नियामक ढाँचा तैयार किया गया है, जिसमें श्रेणी-ए की व्यवस्था भी सम्मिलित है। इसका उद्देश्य आयुर्वेद आहार उत्पादों के निर्माण और उनसे संबंधित जानकारी को पारदर्शी एवं ज़िम्मेदार तरीके से आम उपभोक्ताओं तक पहुँचाना है।
आम जनता पर असर
गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में 'वेलनेस' और 'प्राकृतिक भोजन' की माँग भारत में तेज़ी से बढ़ी है। ऐसे में आयुर्वेद आहार को एक नियामक पहचान देना उपभोक्ताओं को बाज़ार में उपलब्ध उत्पादों की विश्वसनीयता परखने में मदद कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि मानकीकरण से न केवल उत्पाद की गुणवत्ता सुनिश्चित होगी, बल्कि पारंपरिक ज्ञान को संरक्षण भी मिलेगा।
आगे की राह
आयुष मंत्रालय की यह पहल भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है जो पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को आधुनिक नीतिगत ढाँचे में एकीकृत करने की दिशा में काम कर रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली में शामिल करने को प्रोत्साहित कर रहा है, जिससे भारत के इस कदम का महत्व और बढ़ जाता है। आने वाले समय में आयुर्वेद आहार उत्पादों के लिए अनुपालन तंत्र की परिपक्वता यह तय करेगी कि यह नियामक व्यवस्था वास्तविक धरातल पर कितनी प्रभावी साबित होती है।