आयुष मंत्रालय ने त्वचा रोगों के लिए STG जारी किए, आयुर्वेद-सिद्ध-यूनानी-होम्योपैथी और योग शामिल
सारांश
मुख्य बातें
आयुष मंत्रालय ने 13 अक्टूबर 2026 को 11वें आयुर्वेद दिवस के अवसर पर त्वचा संबंधी विकारों के उपचार हेतु मानक उपचार दिशानिर्देश (STG) सार्वजनिक किए, जिनमें आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी, होम्योपैथी और योग — पाँचों पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को एकीकृत रूप से समाहित किया गया है। इन दिशानिर्देशों का उद्देश्य आयुष प्रणालियों में नैदानिक देखभाल को अधिक एकरूप, गुणवत्तापूर्ण और साक्ष्य-आधारित बनाना है।
मुख्य घटनाक्रम
ये दिशानिर्देश स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) के आयुष विभाग द्वारा तैयार किए गए हैं। इनमें सोरायसिस, डर्मेटाइटिस, विटिलिगो, पित्ती और डर्मेटोफाइटोसिस जैसी सामान्य त्वचा स्थितियों की रोकथाम, निदान, उपचार और पुनर्वास के लिए प्रणाली-विशिष्ट सिफारिशें दी गई हैं।
इन्हें आयुष अनुसंधान परिषदों, वरिष्ठ अकादमिक विशेषज्ञों, योग विशेषज्ञों और आधुनिक चिकित्सा विशेषज्ञों के सहयोग से तैयार किया गया है। साथ ही दिल्ली सरकार के आयुष निदेशालय की साझेदारी में प्राथमिक और माध्यमिक स्वास्थ्य सेवाओं में कार्यरत चिकित्सा अधिकारियों के साथ क्षेत्र-स्तरीय सत्यापन भी किया गया।
सरकार की प्रतिक्रिया
आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रतापराव जाधव ने कहा, 'ये दिशानिर्देश सामान्य त्वचा रोगों के लिए सुरक्षित, प्रभावी और समग्र देखभाल को बढ़ावा देने हेतु प्रणाली-विशिष्ट नैदानिक दृष्टिकोणों को समकालीन वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ जोड़ते हैं। मानकीकृत और साक्ष्य-आधारित नैदानिक अभ्यास को बढ़ावा देकर ये रोगी देखभाल में सुधार लाने में मदद करेंगे।' उन्होंने यह भी कहा कि ये दिशानिर्देश आयुष प्रणालियों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा ढाँचे के साथ और गहराई से एकीकृत करने में सहायक होंगे।
आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने कहा, 'त्वचा संबंधी विकारों के लिए STG, आयुष प्रणालियों में मानकीकरण और साक्ष्य-आधारित अभ्यास को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। ये प्रत्येक प्रणाली के मूल सिद्धांतों को संरक्षित करते हुए रोकथाम, निदान, उपचार और फॉलो-अप के लिए व्यावहारिक सुझाव देते हैं।'
स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक डॉ. लवनीश जी. कृष्णा ने बहुविषयक सहयोग के महत्व पर ज़ोर देते हुए कहा कि ये दिशानिर्देश आयुष चिकित्सकों को सुरक्षित, प्रभावी और रोगी-केंद्रित देखभाल प्रदान करने में मददगार साबित होंगे।
आम जनता पर असर
भारत में त्वचा संबंधी विकार — विशेषकर सोरायसिस और विटिलिगो — बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित करते हैं, और इनके दीर्घकालिक उपचार की लागत अक्सर रोगियों पर भारी पड़ती है। पारंपरिक आयुष प्रणालियों के लिए मानकीकृत दिशानिर्देश उपलब्ध होने से चिकित्सकों को स्पष्ट नैदानिक रूपरेखा मिलेगी, जिससे उपचार की गुणवत्ता और एकरूपता दोनों में सुधार संभव है।
यह ऐसे समय में आया है जब सरकार आयुष को मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवाओं के समानांतर स्थापित करने की दिशा में लगातार प्रयास कर रही है। गौरतलब है कि STG जारी करने की यह पहल आयुष में साक्ष्य-आधारित चिकित्सा की माँग को संस्थागत मान्यता देती है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
इन दिशानिर्देशों को तैयार करने में आयुष अनुसंधान परिषदों के विशेषज्ञों ने अहम भूमिका निभाई है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रत्येक प्रणाली के अपने मूल सिद्धांतों को बनाए रखते हुए आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाणों से जोड़ना इन दिशानिर्देशों की सबसे बड़ी विशेषता है। क्षेत्र-स्तरीय सत्यापन की प्रक्रिया से यह भी सुनिश्चित किया गया है कि ये दिशानिर्देश व्यावहारिक परिस्थितियों में भी उपयोगी हों।
क्या होगा आगे
इन STG के लागू होने के बाद देशभर के आयुष चिकित्सकों को प्रशिक्षण और क्षमता-निर्माण कार्यक्रमों के ज़रिए इनसे परिचित कराया जाएगा। मंत्रालय के अनुसार, ये दिशानिर्देश प्राथमिक और माध्यमिक स्वास्थ्य सेवा स्तर पर आयुष चिकित्सकों के लिए एक संदर्भ दस्तावेज़ के रूप में काम करेंगे, जिससे पूरे देश में त्वचा रोगों के आयुष प्रबंधन में एकरूपता आएगी।