वंदे आयुकोन-26: सूरत सम्मेलन में उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी बोले — आयुर्वेद को जन-जन तक पहुँचाना सरकार की प्राथमिकता
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात के सूरत में 4 अक्टूबर 2026 को राज्य स्तरीय एक दिवसीय आयुर्वेदिक सम्मेलन 'वंदे आयुकोन-26' का आयोजन किया गया, जिसमें प्रदेश भर से 1,200 से अधिक आयुर्वेदिक चिकित्सकों और विशेषज्ञों ने भाग लिया। मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा देने और आयुर्वेद को जन-जन तक पहुँचाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
सम्मेलन का आयोजन और भागीदारी
सम्मेलन सरथाणा स्थित सूरज कन्वेंशन डोम में आयोजित हुआ। गुजरात आयुर्वेदिक काउंसिल के अध्यक्ष जिग्नेश पटेल ने बताया कि गुजरात के विभिन्न जिलों से 1,200 से अधिक प्रतिष्ठित वैद्य और आयुर्वेद विशेषज्ञ इस एक दिवसीय आयोजन में सम्मिलित हुए। यह आयोजन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति को लेकर राज्य में बढ़ती जागरूकता और संस्थागत प्रतिबद्धता का प्रतीक माना जा रहा है।
संघवी का संबोधन: औपचारिकता से हटकर समाधान पर जोर
उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने अपने संबोधन में पारंपरिक स्वागत-समारोह की संस्कृति पर सवाल उठाते हुए कहा कि अक्सर कार्यक्रमों में केवल फूल-मालाओं और नामों के उल्लेख में 10-15 मिनट का बहुमूल्य समय नष्ट हो जाता है। उनका सुझाव था कि इस समय का उपयोग जनस्वास्थ्य और आयुर्वेद के विकास से जुड़े गंभीर विषयों पर सार्थक चर्चा के लिए किया जाना चाहिए।
संघवी ने चिकित्सकों से आग्रह किया कि वे समस्याओं की लंबी सूची बनाने की बजाय 2-5 प्रमुख सुझावों के ठोस और व्यावहारिक समाधान पर ध्यान केंद्रित करें। उन्होंने कहा कि इस तरह के लक्षित दृष्टिकोण से ही क्षेत्र में वास्तविक और स्थायी सुधार संभव है।
सरकार की प्रतिबद्धता और आगे की कार्ययोजना
संघवी ने उपस्थित वैद्यों और डॉक्टरों को आश्वासन दिया कि सम्मेलन के विभिन्न सत्रों से निकले मुख्य निष्कर्षों और सुझावों पर अमल के लिए डॉक्टरों के प्रतिनिधिमंडल को राज्य सरकार के संबंधित विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठाया जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इन सुझावों पर त्वरित अमल सुनिश्चित किया जाएगा।
उन्होंने चिकित्सकों को अल्पकालिक और दीर्घकालिक लक्ष्य निर्धारित करने की सलाह देते हुए भरोसा दिलाया कि सरकार और स्वास्थ्य विभाग एक टीम की भाँति आयुर्वेदिक चिकित्सकों के साथ मिलकर काम करेंगे।
आम जनता और पारंपरिक चिकित्सा पर असर
यह आयोजन ऐसे समय में हुआ है जब राष्ट्रीय स्तर पर आयुष मंत्रालय भी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवाओं के साथ एकीकृत करने पर जोर दे रहा है। गुजरात सरकार की यह पहल राज्य में पारंपरिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को संस्थागत समर्थन देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। आगे इस सम्मेलन के निष्कर्षों के आधार पर सरकारी नीति में किस हद तक बदलाव आता है, यह देखने वाली बात होगी।