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वर्षा ऋतु में हल्का भोजन क्यों जरूरी: आयुष मंत्रालय की सलाह, तला-भुना और मसालेदार खाने से बचें

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वर्षा ऋतु में हल्का भोजन क्यों जरूरी: आयुष मंत्रालय की सलाह, तला-भुना और मसालेदार खाने से बचें

सारांश

वर्षा ऋतु में शरीर की पाचन अग्नि कमजोर पड़ती है — आयुष मंत्रालय और आयुर्वेद दोनों इस बात पर एकमत हैं। मूंग खिचड़ी, दलिया और उबली सब्जियां अपनाएं; तला-भुना और मसालेदार खाना पेट की परेशानियां बढ़ा सकता है।

मुख्य बातें

आयुष मंत्रालय के अनुसार वर्षा ऋतु में पाचन अग्नि स्वाभाविक रूप से कमजोर हो जाती है।
तला-भुना, तैलीय और अधिक मसालेदार भोजन इस मौसम में अपच, गैस, एसिडिटी और ब्लोटिंग का कारण बन सकता है।
मूंग दाल, खिचड़ी, जौ का दलिया, पुराने चावल और उबली सब्जियां जैसे लौकी, तुरई, परवल सबसे उपयुक्त विकल्प माने जाते हैं।
गुनगुना पानी, अदरक की चाय, जीरा पानी और हल्दी वाला दूध पाचन को बेहतर बनाने में सहायक हैं।
भोजन हमेशा ताजा, गर्म और सीमित मात्रा में करने की सलाह दी जाती है; अधिक खाने से परेशानियां बढ़ सकती हैं।

आयुष मंत्रालय के अनुसार, वर्षा ऋतु में शरीर की पाचन अग्नि स्वाभाविक रूप से कमजोर पड़ जाती है, जिससे भोजन पचाने की क्षमता घट जाती है और पाचन संबंधी समस्याएं बढ़ने का खतरा रहता है। ऐसे में विशेषज्ञ ताजा, हल्का और गर्म भोजन अपनाने की सलाह देते हैं तथा तले-भुने, तैलीय और अधिक मसालेदार खाने से परहेज करने को कहते हैं। आयुर्वेद में छह ऋतुओं के अनुसार आहार में बदलाव को स्वस्थ जीवन की आधारशिला माना गया है।

आयुर्वेद में वर्षा ऋतु का महत्व

आयुर्वेद में ऋतुचर्या — अर्थात मौसम के अनुसार दिनचर्या और आहार — को विशेष महत्व दिया गया है। छह ऋतुओं के दौरान शरीर में वात, पित्त और कफ दोष, पाचन अग्नि तथा शारीरिक बल में परिवर्तन होते रहते हैं। वर्षा ऋतु में अधिक आर्द्रता, ठंडी हवाएं और बादल छाए रहने के कारण पाचन शक्ति पर सीधा असर पड़ता है।

गौरतलब है कि गर्मी के मौसम में शरीर में संचित पित्त वर्षा ऋतु में असंतुलित हो सकता है। यह असंतुलन अपच, गैस, पेट फूलना (ब्लोटिंग), एसिडिटी, पेट दर्द और जलन जैसी समस्याओं को जन्म दे सकता है।

तला-भुना और मसालेदार भोजन क्यों नुकसानदेह

वर्षा ऋतु में कमजोर पाचन अग्नि की स्थिति में तला-भुना, तैलीय और अधिक मसालेदार भोजन पचाने में शरीर को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है। इससे पेट पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है और पाचन तंत्र में जलन व असुविधा हो सकती है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी कमजोर पाचन की स्थिति में भारी भोजन मेटाबॉलिज्म को धीमा कर देता है।

लाभकारी हल्के भोजन के विकल्प

विशेषज्ञों के अनुसार इस मौसम में निम्नलिखित खाद्य पदार्थ विशेष रूप से उपयुक्त माने जाते हैं:

मूंग की दाल, मूंग-चावल की खिचड़ी, गेहूं या जौ का दलिया और पुराने चावल का सेवन पाचन के लिए सहज रहता है। उपवास या वर्षा ऋतु में जौ (यव), सत्तू और साबूदाने का सेवन भी किया जा सकता है। रोटी और विशेष रूप से पराठों का सेवन सीमित मात्रा में रखने की सलाह दी जाती है।

उबली या हल्की पकी सब्जियां जैसे लौकी, तुरई, परवल, टिंडा, पालक, मेथी और भिंडी लाभदायक होती हैं। मूंग दाल, छिलके वाली मसूर दाल तथा छाछ या सीमित मात्रा में दही का सेवन भी किया जा सकता है।

पेय पदार्थ और अन्य सुझाव

विशेषज्ञों के अनुसार भोजन हमेशा ताजा, गर्म और कम मात्रा में करना चाहिए, क्योंकि अधिक खाने से पाचन संबंधी परेशानियां और बढ़ सकती हैं। गुनगुना पानी, अदरक की चाय, जीरा पानी और नारियल पानी इस मौसम में लाभकारी माने जाते हैं। रात में हल्दी वाला गुनगुना दूध पीना भी फायदेमंद बताया गया है। इसके अलावा, सौंठ या जीरे के साथ छाछ का सेवन पाचन तंत्र को सक्रिय रखने में सहायक हो सकता है।

आम जनता पर असर और आगे की राह

हल्का भोजन शरीर को आवश्यक पोषण देने के साथ-साथ सुस्ती और भारीपन से भी बचाता है। मौसम बदलाव के दौरान या रात के समय हल्का भोजन करने से नींद बेहतर आती है और वजन नियंत्रण में भी मदद मिलती है। आयुर्वेद और आधुनिक पोषण विज्ञान, दोनों ही इस बात पर एकमत हैं कि मौसमी आहार अपनाना दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। वर्षा ऋतु में इन सरल बदलावों को अपनाकर पाचन तंत्र को मजबूत और शरीर को ऊर्जावान बनाए रखा जा सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसे व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति में तब्दील करने की जरूरत है — केवल प्रेस विज्ञप्ति से काम नहीं चलेगा। आयुर्वेद और आधुनिक पोषण विज्ञान के बीच की खाई को पाटने के लिए ठोस नैदानिक प्रमाण और सामुदायिक जागरूकता अभियान जरूरी हैं। शहरी भारत में फास्ट फूड संस्कृति के बढ़ते प्रचलन को देखते हुए मौसमी आहार की यह परंपरागत समझ और भी प्रासंगिक हो जाती है। सवाल यह है कि क्या सरकार इसे केवल सलाह तक सीमित रखेगी या स्कूली पाठ्यक्रम और सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में इसे शामिल करेगी।
RashtraPress
25 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वर्षा ऋतु में हल्का भोजन क्यों खाना चाहिए?
आयुष मंत्रालय के अनुसार वर्षा ऋतु में पाचन अग्नि स्वाभाविक रूप से कमजोर हो जाती है, जिससे भारी भोजन पचाने में कठिनाई होती है। हल्का भोजन पेट पर अतिरिक्त बोझ नहीं डालता और अपच, गैस व एसिडिटी जैसी समस्याओं से बचाता है।
बरसात के मौसम में कौन-से खाद्य पदार्थ सबसे उपयुक्त हैं?
मूंग की दाल, मूंग-चावल की खिचड़ी, गेहूं या जौ का दलिया, पुराने चावल तथा उबली सब्जियां जैसे लौकी, तुरई, परवल, टिंडा, पालक और भिंडी इस मौसम में सबसे लाभकारी मानी जाती हैं। छाछ और सीमित मात्रा में दही का सेवन भी किया जा सकता है।
वर्षा ऋतु में कौन-से पेय पदार्थ पीने चाहिए?
गुनगुना पानी, अदरक की चाय, जीरा पानी और नारियल पानी इस मौसम में पाचन के लिए फायदेमंद माने जाते हैं। रात में हल्दी वाला गुनगुना दूध और सौंठ या जीरे के साथ छाछ भी पाचन तंत्र को सक्रिय रखने में सहायक है।
बरसात में तला-भुना खाने से क्या नुकसान हो सकते हैं?
इस मौसम में पाचन शक्ति कमजोर होने के कारण तला-भुना, तैलीय और अधिक मसालेदार भोजन अपच, गैस, पेट फूलना, एसिडिटी, पेट दर्द और जलन जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी भारी भोजन इस स्थिति में मेटाबॉलिज्म को धीमा कर देता है।
आयुर्वेद में वर्षा ऋतु के आहार को लेकर क्या मान्यता है?
आयुर्वेद में ऋतुचर्या के अंतर्गत वर्षा ऋतु को वात दोष के बढ़ने और पाचन अग्नि के कमजोर होने का समय माना गया है। इस दौरान वात, पित्त और कफ का संतुलन बिगड़ सकता है, इसलिए मौसम के अनुकूल हल्का, गर्म और ताजा भोजन करने की परंपरागत सलाह दी जाती है।
राष्ट्र प्रेस
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