15 सितंबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

भ्रामरी प्राणायाम: तनाव, अनिद्रा और बेचैनी से राहत का प्राचीन उपाय, जानें सही विधि

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
भ्रामरी प्राणायाम: तनाव, अनिद्रा और बेचैनी से राहत का प्राचीन उपाय, जानें सही विधि

सारांश

भागदौड़ भरी ज़िंदगी में मन की बेचैनी और अनिद्रा आम शिकायत बन चुकी है। आयुष मंत्रालय के अनुसार भ्रामरी प्राणायाम — यह प्राचीन भौंरे जैसी गुंजन तकनीक — तनाव, क्रोध और अनिद्रा में प्रभावी राहत देती है। सही विधि और ज़रूरी सावधानियाँ जानना ज़रूरी है।

मुख्य बातें

भ्रामरी प्राणायाम का नाम 'भ्रमर' (भौंरे) से लिया गया है — अभ्यास के दौरान भौंरे जैसी गुंजन ध्वनि निकाली जाती है।
आयुष मंत्रालय के अनुसार इसके नियमित अभ्यास से तनाव, क्रोध और मानसिक बेचैनी में कमी आती है तथा एकाग्रता बढ़ती है।
महर्षि पतंजलि के योग दर्शन में इसे अष्टांग योग का चौथा चरण बताया गया है।
यह बच्चों और छात्रों के लिए विशेष रूप से लाभकारी — स्मरण शक्ति और फोकस में सुधार करता है।
कान या साइनस रोगी, गर्भवती महिलाएँ और हृदय रोगी इसे विशेषज्ञ की सलाह के बिना न करें।
अभ्यास खाली पेट करें; असुविधा महसूस होने पर तुरंत रोकें।

भ्रामरी प्राणायाम आज की तनावपूर्ण दिनचर्या में मानसिक शांति पाने का एक प्रमाणित प्राचीन योग अभ्यास है, जिसे आयुष मंत्रालय भी मन को शांत करने, तनाव घटाने और एकाग्रता बढ़ाने में प्रभावी मानता है। जो लोग नींद न आने, अकारण चिड़चिड़ेपन या मानसिक बेचैनी से जूझ रहे हैं, उनके लिए मात्र कुछ मिनटों का यह अभ्यास अत्यंत लाभकारी बताया जाता है।

भ्रामरी प्राणायाम क्या है और इसका नाम कैसे पड़ा

भ्रामरी शब्द संस्कृत के 'भ्रमर' अर्थात भौंरे से लिया गया है। इस प्राणायाम के अभ्यास के दौरान साधक के मुख से एक विशेष गुंजन ध्वनि निकलती है, जो भौंरे की आवाज़ से मिलती-जुलती होती है — इसी कारण इसे 'भ्रामरी' कहा जाता है।

योग शास्त्र में प्राणायाम शब्द दो भागों से बना है — 'प्राण' (जीवन शक्ति या ऊर्जा) और 'आयाम' (विस्तार या नियंत्रण)। महर्षि पतंजलि के योग दर्शन में इसे अष्टांग योग का चौथा चरण माना गया है, जो श्वास-प्रश्वास को नियंत्रित कर शरीर में प्राण-शक्ति का प्रसार करता है।

आयुष मंत्रालय के अनुसार लाभ

आयुष मंत्रालय के अनुसार, भ्रामरी प्राणायाम के नियमित अभ्यास से दिमाग और नाड़ी तंत्र को गहरा आराम मिलता है। इसके मुख्य फायदों में तनाव में कमी, क्रोध पर नियंत्रण, मन की बेचैनी का धीरे-धीरे शमन और सोचने-समझने की क्षमता में वृद्धि शामिल हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्राणायाम विशेष रूप से बच्चों और छात्रों के लिए उपयोगी है, क्योंकि इससे स्मरण शक्ति और एकाग्रता दोनों में सुधार होता है। यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक है जब शहरी जीवन में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ तेज़ी से बढ़ रही हैं।

सही विधि और सावधानियाँ

विशेषज्ञ इस प्राणायाम को खाली पेट या भोजन के कई घंटों बाद करने की सलाह देते हैं। अभ्यास के दौरान गुनगुनाहट की ध्वनि को सहज रखना चाहिए — उसे जबरदस्ती बढ़ाने की कोशिश न करें।

निम्नलिखित लोगों को सावधानी बरतने की आवश्यकता है:

कान या साइनस के गंभीर रोगों से पीड़ित व्यक्तियों को यह अभ्यास नहीं करना चाहिए। गर्भवती महिलाओं और हृदय रोगियों को किसी योग्य विशेषज्ञ की सलाह लेने के बाद ही इसे करना चाहिए। यदि अभ्यास के दौरान चक्कर या किसी प्रकार की असुविधा महसूस हो, तो तुरंत रुक जाएँ।

आम जनता पर असर और व्यापक संदर्भ

गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन सहित कई अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थाएँ मानसिक स्वास्थ्य को वैश्विक प्राथमिकता घोषित कर चुकी हैं। भारत में भी अनिद्रा और चिंता-विकार की बढ़ती शिकायतों के बीच आयुष मंत्रालय द्वारा पारंपरिक योग तकनीकों को बढ़ावा देना नीतिगत दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम है।

भ्रामरी प्राणायाम जैसे अभ्यास न केवल दवा-मुक्त उपाय प्रस्तुत करते हैं, बल्कि इनकी लागत-प्रभावशीलता भी इन्हें ग्रामीण और शहरी — दोनों जनसमूहों के लिए सुलभ बनाती है। आने वाले समय में योग और प्राणायाम को स्कूली पाठ्यक्रम एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में समाहित किए जाने की संभावनाएँ और अधिक मज़बूत होती दिख रही हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

तब लागत-मुक्त और सुलभ योग तकनीकों को सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति में शामिल करना व्यावहारिक रूप से महत्वपूर्ण कदम है। हालाँकि, मुख्यधारा की कवरेज प्रायः इसके वैज्ञानिक साक्ष्य आधार की गहराई से पड़ताल नहीं करती — क्लिनिकल परीक्षणों की संख्या अभी भी सीमित है और दावों को 'शोध के अनुसार' कहने के लिए और अधिक स्वतंत्र अध्ययनों की आवश्यकता है। जब तक साक्ष्य-आधारित समर्थन और व्यापक मानसिक स्वास्थ्य ढाँचे साथ-साथ नहीं चलते, तब तक प्राणायाम एक पूरक उपाय रहेगा — न कि पेशेवर उपचार का विकल्प।
RashtraPress
15 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भ्रामरी प्राणायाम क्या है और इसे यह नाम क्यों मिला?
भ्रामरी प्राणायाम एक प्राचीन योग श्वास तकनीक है जिसमें साँस छोड़ते समय भौंरे जैसी गुंजन ध्वनि उत्पन्न की जाती है। 'भ्रामरी' शब्द संस्कृत के 'भ्रमर' (भौंरा) से आया है, और इस विशिष्ट ध्वनि के कारण ही इसे यह नाम दिया गया है।
भ्रामरी प्राणायाम करने का सही तरीका क्या है?
इसे खाली पेट या भोजन के कई घंटों बाद करना चाहिए। शांत स्थान पर बैठकर आँखें बंद करें, साँस अंदर लें और धीरे-धीरे साँस छोड़ते हुए भौंरे जैसी गुंजन ध्वनि निकालें। ध्वनि सहज और स्वाभाविक रखें — जबरदस्ती तेज़ न करें।
भ्रामरी प्राणायाम के क्या-क्या फायदे हैं?
आयुष मंत्रालय के अनुसार इसके नियमित अभ्यास से मन शांत होता है, तनाव और क्रोध में कमी आती है, नींद बेहतर होती है और एकाग्रता बढ़ती है। छात्रों और बच्चों में स्मरण शक्ति में भी सुधार देखा जाता है।
किन लोगों को भ्रामरी प्राणायाम नहीं करना चाहिए?
कान या साइनस की गंभीर बीमारी से पीड़ित लोगों को यह प्राणायाम नहीं करना चाहिए। गर्भवती महिलाओं और हृदय रोगियों को किसी योग्य विशेषज्ञ या चिकित्सक की सलाह लेने के बाद ही इसका अभ्यास करना उचित है।
भ्रामरी प्राणायाम का योग दर्शन में क्या स्थान है?
महर्षि पतंजलि के योग दर्शन में प्राणायाम को अष्टांग योग का चौथा चरण बताया गया है। भ्रामरी प्राणायाम इसी व्यापक प्राणायाम परंपरा का अंग है, जिसका उद्देश्य शरीर में प्राण-शक्ति का नियंत्रण और विस्तार करना है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 3 सप्ताह पहले
  2. 3 सप्ताह पहले
  3. 4 महीने पहले
  4. 6 महीने पहले
  5. 10 महीने पहले
  6. 1 साल पहले
  7. 1 साल पहले
  8. 1 साल पहले