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ISI का हनी-ट्रैप 2.0: भारतीय अधिकारियों को फंसाने के लिए मनोवैज्ञानिकों की तैनाती

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ISI का हनी-ट्रैप 2.0: भारतीय अधिकारियों को फंसाने के लिए मनोवैज्ञानिकों की तैनाती

सारांश

ISI ने हनी-ट्रैप को नया रूप दे दिया है — पैसे और धमकी की जगह अब मनोवैज्ञानिक कमज़ोरियों का दोहन। प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक महीनों तक अधिकारियों का भरोसा जीतते हैं, फिर चीन निर्मित स्पाइवेयर के ज़रिए संवेदनशील जानकारी चुरा लेते हैं। इंटेलिजेंस ब्यूरो ने इसे गंभीर खतरा बताया है।

मुख्य बातें

ISI ने हनी-ट्रैप नेटवर्क में प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिकों को शामिल किया है जो संवेदनशील जानकारी रखने वाले भारतीय अधिकारियों को निशाना बनाते हैं।
मनोवैज्ञानिक सोशल मीडिया पर फर्जी महिला अकाउंट बनाकर अधिकारियों से संपर्क करते हैं और दो से तीन महीने में भरोसा जीतते हैं।
भरोसा बनने के बाद अधिकारियों को चीन निर्मित स्पाइवेयर और मैलवेयर युक्त एप्लिकेशन इंस्टॉल करवाई जाती हैं।
नई रणनीति में पैसे या धमकी की जगह मनोवैज्ञानिक कमज़ोरियों और निजी समस्याओं का दोहन किया जाता है।
इंटेलिजेंस ब्यूरो ने इसे गंभीर चिंता का विषय बताया; नियमित एडवाइजरी के बावजूद अधिकारी इस जाल में फंस रहे हैं।
इस पद्धति की बढ़ती सफलता के कारण पाकिस्तान में मनोवैज्ञानिकों की माँग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) ने भारतीय अधिकारियों को हनी-ट्रैप में फंसाने की अपनी रणनीति को और अधिक परिष्कृत कर लिया है। खुफिया सूत्रों के अनुसार, ISI अब प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिकों को नियुक्त कर रही है, जो संवेदनशील जानकारी रखने वाले अधिकारियों की मानसिक कमज़ोरियों की पहचान करते हैं और फिर उन्हें जाल में फंसाते हैं। इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यह बदलाव भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया है।

मुख्य घटनाक्रम

इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक अधिकारी के अनुसार, ISI ने अपने हनी-ट्रैप नेटवर्क में मनोवैज्ञानिकों को शामिल करना शुरू किया है। ये मनोवैज्ञानिक सबसे पहले सोशल मीडिया पर लक्षित अधिकारियों की पहचान करते हैं और उनकी पोस्ट व संदेशों का गहन विश्लेषण करते हैं। इसके बाद महिलाओं के नाम से फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट बनाकर उन अधिकारियों से संपर्क स्थापित किया जाता है।

अधिकारी ने बताया कि ये मनोवैज्ञानिक लक्षित अधिकारी का भरोसा जीतने में दो से तीन महीने लगाते हैं। इस दौरान वे सहानुभूति और करीबीपन का नाटक करते हुए उनकी व्यक्तिगत समस्याओं और कमज़ोरियों को उजागर करते हैं।

तकनीकी जाल: स्पाइवेयर और मैलवेयर

भरोसा बन जाने के बाद, कथित तौर पर लक्षित अधिकारियों को उनके सिस्टम पर विशेष एप्लिकेशन इंस्टॉल करने के लिए कहा जाता है। सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार, इनमें से अधिकांश एप्लिकेशन में चीन निर्मित स्पाइवेयर और मैलवेयर छिपे होते हैं, जो डिजिटल संचार चैनलों के माध्यम से संवेदनशील जानकारी चुराते हैं। फंसा हुआ अधिकारी अक्सर यह भी नहीं जान पाता कि उसके सिस्टम से डेटा लीक हो रहा है।

यह ऐसे समय में आया है जब भारत-पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक तनाव के बीच साइबर जासूसी की घटनाओं में भी वृद्धि दर्ज की गई है। गौरतलब है कि पारंपरिक हनी-ट्रैप तरीकों में पैसे और धमकी का इस्तेमाल होता था, लेकिन अब ISI ने मनोवैज्ञानिक कमज़ोरियों के दोहन को प्राथमिकता दे दी है।

निशाने पर कौन

अधिकारियों के अनुसार, ISI विशेष रूप से उन अधिकारियों को निशाना बनाती है जो निजी समस्याओं से जूझ रहे होते हैं और अपनी निराशा व्यक्त करने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेते हैं। ऐसे अधिकारी मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अधिक संवेदनशील होते हैं और सहानुभूति की ओर जल्दी आकर्षित होते हैं।

सूत्रों का कहना है कि इस पद्धति की बढ़ती सफलता के कारण पाकिस्तान में मनोवैज्ञानिकों की माँग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो इस नेटवर्क की व्यापकता का संकेत देती है।

भारतीय एजेंसियों की चिंता

इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी के अनुसार, नियमित रूप से एडवाइजरी जारी किए जाने के बावजूद कई अधिकारी इस जाल में फंस रहे हैं और अनजाने में अपने सिस्टम में डेटा-लीक करने वाला सॉफ्टवेयर तक इंस्टॉल कर लेते हैं। हाल के मामलों में यह स्पष्ट हुआ है कि पारंपरिक सुरक्षा प्रशिक्षण इस नई मनोवैज्ञानिक रणनीति के खिलाफ पर्याप्त नहीं है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षा एजेंसियों को अब अपने प्रशिक्षण कार्यक्रमों में साइबर मनोविज्ञान और सोशल इंजीनियरिंग के खिलाफ जागरूकता को भी शामिल करना होगा।

क्या होगा आगे

सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, इस खतरे से निपटने के लिए अधिकारियों की सोशल मीडिया गतिविधियों की निगरानी और मनोवैज्ञानिक परामर्श कार्यक्रमों को मजबूत करने की आवश्यकता है। यह देखना होगा कि भारतीय सुरक्षा तंत्र इस परिष्कृत खतरे के जवाब में अपनी रणनीति को कितनी तेज़ी से अद्यतन करता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि भारत के सुरक्षा प्रशिक्षण तंत्र की खामियों का आईना भी है — दशकों से एडवाइजरी जारी होती रही हैं, फिर भी अधिकारी फंसते रहे हैं। असली सवाल यह है कि मनोवैज्ञानिक युद्ध के इस नए दौर में क्या भारत के सुरक्षा संस्थान केवल तकनीकी सुरक्षा पर निर्भर रह सकते हैं, या उन्हें अपने कर्मियों की मानसिक भेद्यता को भी उतनी ही गंभीरता से संबोधित करना होगा। चीन निर्मित स्पाइवेयर का उल्लेख एक और परत जोड़ता है — यह द्विपक्षीय खतरा नहीं, बल्कि त्रिकोणीय साजिश की ओर इशारा करता है, जिसे मुख्यधारा की कवरेज अक्सर नज़रअंदाज़ करती है।
RashtraPress
24 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ISI हनी-ट्रैप में मनोवैज्ञानिकों का इस्तेमाल कैसे करती है?
ISI द्वारा नियुक्त मनोवैज्ञानिक सोशल मीडिया पर निजी समस्याओं वाले भारतीय अधिकारियों की पहचान करते हैं, फर्जी महिला अकाउंट से संपर्क करते हैं और दो से तीन महीने में भरोसा जीतकर उन्हें स्पाइवेयर युक्त एप्लिकेशन इंस्टॉल करवाते हैं। इंटेलिजेंस ब्यूरो के अनुसार यह तरीका पारंपरिक जासूसी से कहीं अधिक प्रभावी साबित हो रहा है।
ISI हनी-ट्रैप में किन अधिकारियों को निशाना बनाया जाता है?
कथित तौर पर उन अधिकारियों को प्राथमिक निशाना बनाया जाता है जिनके पास संवेदनशील जानकारी होती है और जो निजी समस्याओं के कारण सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं। मनोवैज्ञानिक इनकी पोस्ट और संदेशों का विश्लेषण कर इनकी कमज़ोरियाँ पहचानते हैं।
ISI के हनी-ट्रैप में कौन-सा स्पाइवेयर इस्तेमाल होता है?
सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार, अधिकारियों को इंस्टॉल करवाई जाने वाली अधिकांश एप्लिकेशन में चीन निर्मित स्पाइवेयर और मैलवेयर होते हैं। ये सॉफ्टवेयर डिजिटल संचार चैनलों के माध्यम से चुपचाप संवेदनशील जानकारी चुराते हैं।
क्या भारतीय सुरक्षा एजेंसियाँ इस खतरे के प्रति सचेत हैं?
हाँ, इंटेलिजेंस ब्यूरो ने इस खतरे को गंभीरता से लिया है और नियमित एडवाइजरी जारी की जाती रही हैं। हालाँकि अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि इन चेतावनियों के बावजूद कई अधिकारी इस जाल में फंस रहे हैं।
नए हनी-ट्रैप तरीके पुराने तरीकों से कैसे अलग हैं?
पुरानी रणनीति में पैसे और डराने-धमकाने का इस्तेमाल होता था, जबकि नई रणनीति में मनोवैज्ञानिक कमज़ोरियों, सहानुभूति और करीबीपन का दोहन किया जाता है। यह बदलाव इसलिए किया गया क्योंकि मनोवैज्ञानिक तरीका ISI के लिए अधिक कारगर साबित हो रहा है।
राष्ट्र प्रेस
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