प्राणायाम के चार प्रकार: शारीरिक और मानसिक संतुलन के लिए आवश्यक

Click to start listening
प्राणायाम के चार प्रकार: शारीरिक और मानसिक संतुलन के लिए आवश्यक

सारांश

प्राणायाम न केवल शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार लाता है, बल्कि मानसिक संतुलन भी स्थापित करता है। जानिए इसके चार मुख्य प्रकारों के लाभ और अभ्यास विधि।

Key Takeaways

योग और प्राणायाम शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। प्राणायाम के चार प्रकार: रेचक, पूरक, कुंभक, और चतुर्थ। नियमित अभ्यास से तनाव और चिंता में कमी आती है। बाह्यवृत्ति से विषाक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं। आभ्यंतरवृत्ति से ऊर्जा का संचार होता है।

नई दिल्ली, 22 फरवरी (राष्ट्र प्रेस)। आज के तनावग्रस्त जीवन में योग और प्राणायाम शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक बन गए हैं। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने सभी को प्राणायाम अपनाने की सलाह दी है। मंत्रालय का कहना है कि नियमित प्राणायाम का अभ्यास करने से सांसों पर नियंत्रण प्राप्त होता है और जीवन में संतुलन स्थापित होता है। मंत्रालय ने प्राणायाम के चार प्रकारों की विस्तृत जानकारी साझा की है।

पातंजल योग सूत्र के अनुसार, प्राणायाम को चार मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है। इन प्रकारों को सांस की गति और प्रवाह के आधार पर समझा जा सकता है। इनका अभ्यास करने से शरीर स्वस्थ रहता है, मन शांत रहता है और एकाग्रता में वृद्धि होती है।

आयुष मंत्रालय के अनुसार, इन चारों प्रकार के प्राणायाम को धीरे-धीरे, सही तकनीक के साथ और योग विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में सीखना चाहिए। रोजाना 10-15 मिनट का अभ्यास भी काफी लाभकारी होता है। प्राणायाम न केवल शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार लाता है, बल्कि चिंता, तनाव और अनिद्रा जैसी समस्याओं से भी राहत दिलाता है।

बाह्यवृत्ति या रेचक: यह प्राणायाम का पहला प्रकार है जहाँ सांस को पूरी तरह बाहर निकाला जाता है। इसे रेचक कहा जाता है। इस प्रक्रिया में फेफड़ों से हवा को पूर्ण रूप से बाहर निकालने पर जोर दिया जाता है। रेचक करने से शरीर से विषाक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं, फेफड़े साफ होते हैं और तनाव में कमी आती है।

आभ्यंतरवृत्ति या पूरक: यह प्राणायाम का दूसरा प्रकार है, जिसमें सांस को अंदर खींचा जाता है। इसे पूरक कहा जाता है। इस अभ्यास में गहरी और नियंत्रित सांस ली जाती है। इससे ऑक्सीजन की मात्रा में वृद्धि होती है, शरीर में ऊर्जा का प्रवाह होता है और मन एकाग्र रहता है।

स्तम्भवृत्ति या कुंभक: यह प्राणायाम का तीसरा, और अत्यंत महत्वपूर्ण, प्रकार है। कुंभक में सांस को रोककर रखा जाता है और इसे दो भागों में विभाजित किया जाता है – अंतःकुंभक (सांस अंदर रोकना) और बाह्यकुंभक (सांस बाहर रोकना)। कुंभक के अभ्यास से प्राण शक्ति शरीर में संचित होती है, मन की शांति बढ़ती है और ध्यान की गहराई में सुधार होता है। शुरुआत में इसे धीरे-धीरे और विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में करना चाहिए।

बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपि या चतुर्थ: यह चौथा प्रकार है, जिसे चतुर्थ प्राणायाम भी कहा जाता है। यह बाहरी और भीतरी दोनों सांसों के विषयों से परे होता है। इस अवस्था में सांस का प्रवाह स्वाभाविक रूप से रुक जाता है और प्राणायाम की उच्च अवस्था प्राप्त होती है। यह प्रकार बहुत उन्नत है और लंबे अभ्यास के बाद ही संभव होता है। इसमें सांस पर पूर्ण नियंत्रण आ जाता है और योगी को गहन आध्यात्मिक अनुभव होता है।

Point of View

बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी एक महत्वपूर्ण साधन है। आयुष मंत्रालय की यह पहल लोगों को उनके जीवन में संतुलन स्थापित करने में मदद करेगी।
NationPress
30/04/2026

Frequently Asked Questions

प्राणायाम के कितने प्रकार होते हैं?
प्राणायाम के चार मुख्य प्रकार होते हैं: रेचक, पूरक, कुंभक, और चतुर्थ।
प्राणायाम करने का सही समय क्या होता है?
प्राणायाम सुबह के समय करना सबसे अच्छा होता है, जब मन शांत और ताजगी से भरा होता है।
क्या प्राणायाम से तनाव कम होता है?
हाँ, नियमित प्राणायाम अभ्यास से तनाव और चिंता में कमी आती है।
प्राणायाम के लिए कोई विशेष स्थान की आवश्यकता है?
प्राणायाम के लिए एक शांत और स्वच्छ जगह का चयन करना चाहिए, जहाँ आप बिना किसी व्यवधान के अभ्यास कर सकें।
क्या प्राणायाम हर कोई कर सकता है?
हाँ, प्राणायाम का अभ्यास लगभग सभी लोग कर सकते हैं, लेकिन कुछ विशेष स्वास्थ्य समस्याओं वाले व्यक्तियों को डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।
Nation Press