प्राणायाम के चार प्रकार: शारीरिक और मानसिक संतुलन के लिए महत्वपूर्ण
सारांश
Key Takeaways
- प्राणायाम में चार प्रकार होते हैं: रेचक, पूरक, कुंभक और चतुर्थ।
- नियमित प्राणायाम से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
- प्राणायाम के अभ्यास से तनाव और चिंता में कमी आती है।
- योग विशेषज्ञ की सलाह से प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए।
- 10-15 मिनट का दैनिक अभ्यास भी लाभकारी है।
नई दिल्ली, २२ फरवरी (राष्ट्र प्रेस)। आज के तनावपूर्ण जीवन में योग और प्राणायाम शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने सभी को प्राणायाम अपनाने की सलाह दी है। मंत्रालय का मानना है कि नियमित प्राणायाम का अभ्यास करने से सांसों पर नियंत्रण पाया जा सकता है और जीवन में संतुलन स्थापित होता है। मंत्रालय ने प्राणायाम के चार प्रकारों पर विस्तार से जानकारी साझा की है।
पातंजल योग सूत्र के अनुसार, प्राणायाम को चार मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है, जो सांस की गति और प्रवाह के आधार पर समझे जाते हैं। इनका अभ्यास करने से शरीर स्वस्थ रहता है, मन शांत होता है और एकाग्रता में वृद्धि होती है।
आयुष मंत्रालय के अनुसार, इन चारों प्रकार के प्राणायाम को धीरे-धीरे, सही विधि से और योग विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में सीखना चाहिए। प्रतिदिन १०-१५ मिनट का अभ्यास भी बहुत लाभकारी होता है। प्राणायाम न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को सुधारता है, बल्कि चिंता, तनाव और अनिद्रा जैसी समस्याओं से भी राहत दिलाता है।
बाह्यवृत्ति या रेचक: यह प्राणायाम का पहला प्रकार है, जिसमें सांस को बाहर निकालने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। इसे रेचक कहा जाता है। इस अभ्यास से फेफड़ों से हवा को पूरी तरह बाहर निकालने पर जोर दिया जाता है। रेचक से शरीर से विषैले पदार्थ बाहर निकलते हैं, फेफड़े साफ होते हैं और तनाव में कमी आती है।
आभ्यंतरवृत्ति या पूरक: यह दूसरा प्रकार है, जिसमें सांस को अंदर खींचा जाता है। इसे पूरक कहा जाता है। इस अभ्यास में गहरी और नियंत्रित सांस अंदर ली जाती है। इससे ऑक्सीजन की मात्रा में वृद्धि होती है, शरीर में ऊर्जा का संचार होता है और मन एकाग्र रहता है।
स्तम्भवृत्ति या कुंभक: यह प्राणायाम का तीसरा और महत्वपूर्ण प्रकार है। कुंभक में सांस को रोककर रखा जाता है। इसे दो भागों में बांटा गया है – अंतःकुंभक (सांस अंदर रोकना) और बाह्यकुंभक (सांस बाहर रोकना)। कुंभक के अभ्यास से प्राण शक्ति शरीर में संचित होती है, मन शांत होता है और ध्यान की गहराई बढ़ती है। शुरुआत में इसे विशेषज्ञ की देखरेख में करना चाहिए।
बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपि या चतुर्थ: यह चौथा प्रकार है, जिसे चतुर्थ प्राणायाम भी कहा जाता है। यह बाहरी और भीतरी दोनों सांसों के विषयों से परे होता है। इस अवस्था में सांस का प्रवाह स्वाभाविक रूप से रुक जाता है और प्राणायाम की उच्च अवस्था प्राप्त होती है। यह प्रकार उच्च स्तर का है और लंबे अभ्यास के बाद ही संभव होता है। इसमें सांस पर पूर्ण नियंत्रण आ जाता है और योगी को गहन आध्यात्मिक अनुभव होता है।