शिवपूजन सहाय जयंती: हिंदी साहित्य के उस संपादक-साधक को याद करें जिसने पत्रकारिता को मिशन बनाया
सारांश
मुख्य बातें
शिवपूजन सहाय — हिंदी साहित्य के वे साधक, जिन्होंने लेखनी को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन का संकल्प बनाया — का जन्म 9 अगस्त 1893 को बिहार के भोजपुर जिले के उनवांस गाँव में हुआ था। जन्म के समय भोलानाथ नाम पाने वाले इस साहित्य-पुरुष ने अपने सात दशक के सक्रिय जीवन में लेखक, संपादक, पत्रकार और अध्यापक — हर भूमिका को पूरी निष्ठा से निभाया। उनकी यात्रा एक साधारण नकलनवीस की नौकरी से शुरू होकर पद्म भूषण तक पहुँची, और इस पूरे सफर में हिंदी भाषा उनके जीवन की धुरी बनी रही।
प्रारंभिक जीवन और असहयोग आंदोलन का मोड़
10वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद शिवपूजन सहाय ने बनारस की अदालत में नकलनवीस के रूप में कार्य आरंभ किया। इसके बाद वह अध्यापन से जुड़े। किंतु देश में उठी असहयोग आंदोलन की लहर ने उनके जीवन की दिशा सदा के लिए बदल दी। उन्होंने सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया — यह महज पेशे का बदलाव नहीं था, बल्कि साहित्य को जीवन-उद्देश्य घोषित करने का निर्णय था। गौरतलब है कि यह वह दौर था जब हिंदी पत्रकारिता राष्ट्रीय चेतना की वाहक बन रही थी, और शिवपूजन सहाय ने उसी धारा में अपना योगदान देना चुना।
संपादन-यात्रा: कलकत्ता से काशी तक
सन 1921 में शिवपूजन सहाय कलकत्ता पहुँचे और 'मारवाड़ी सुधार' के संपादन से जुड़े। 1923 में उन्होंने चर्चित पत्रिका 'मतवाला' का संपादन-भार संभाला। 1924 में लखनऊ आकर 'माधुरी' पत्रिका के संपादकीय विभाग में कार्य किया — और यहीं उनका साहचर्य प्रेमचंद से गहरा हुआ। प्रेमचंद की कालजयी रचना 'रंगभूमि' सहित अनेक कहानियों के संपादन में उनका योगदान रहा।
1925 में पुनः कलकत्ता लौटकर उन्होंने 'समन्वय', 'मौजी', 'गोलमाल' और 'उपन्यास तरंग' जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया। 1926 में काशी में स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्य आरंभ किया। 1932 में जयशंकर प्रसाद और उनके मित्रमंडल द्वारा काशी से प्रकाशित साहित्यिक पाक्षिक 'जागरण' से जुड़े — जहाँ एक बार फिर प्रेमचंद के कार्य-सहयोगी बनने का अवसर मिला। नागरी प्रचारिणी सभा और अन्य साहित्यिक मंडलों में उनकी सक्रिय भागीदारी ने काशी को उनके साहित्यिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव बना दिया।
दरभंगा, छपरा और बिहार राष्ट्र भाषा परिषद
सन 1935 में शिवपूजन सहाय सपरिवार लहेरिया सराय, दरभंगा चले गए, जहाँ 'बालक' पत्रिका का संपादन किया। 1939 में राजेंद्र कॉलेज, छपरा में हिंदी के प्राध्यापक नियुक्त हुए। 1950 में उनके जीवन का एक नया अध्याय खुला जब वह बिहार राष्ट्र भाषा परिषद के सचिव बने। इस पद पर रहते हुए उन्होंने हिंदी संदर्भ ग्रंथों के 50 से अधिक संस्करणों का संपादन और प्रकाशन किया। बाद में वह परिषद के निदेशक भी बने। इसी कार्यकाल में उन्होंने 'हिंदी साहित्य और बिहार' शीर्षक साहित्यिक इतिहास का संकलन एवं संपादन किया।
प्रमुख कृतियाँ और संपादित ग्रंथ
शिवपूजन सहाय की मौलिक कृतियों में 'देहाती दुनिया', 'महिला-महत्व', 'विभूति', 'वे दिन वे लोग', 'बिंब-प्रतिबिंब', 'मेरा जीवन', 'स्मृतिशेष', 'हिंदी भाषा और साहित्य', 'ग्राम सुधार' और 'माता का आंचल' प्रमुख हैं। संपादित ग्रंथों में 'द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ', 'जयंती स्मारक ग्रंथ', 'अनुग्रह अभिनंदन ग्रंथ', 'राजेंद्र अभिनंदन ग्रंथ', 'अयोध्या प्रसाद खत्री स्मारक ग्रंथ', 'बिहार की महिलाएं' और 'रंगभूमि' उल्लेखनीय हैं।
उनके पुत्र मंगल मूर्ति ने उनके संपूर्ण कार्य को 'शिवपूजन सहाय साहित्य समग्र' के नाम से 2011 में 10 खंडों में संपादित और प्रकाशित किया — जो उनकी विरासत का सबसे व्यापक संकलन है।
सम्मान और विरासत
शिवपूजन सहाय के हिंदी साहित्य में अतुलनीय योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली। 1960 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। उनकी स्मृति को डाक टिकट जारी कर भी सम्मानित किया गया। वह केवल एक रचनाकार नहीं थे — वह हिंदी के साहित्यिक परिदृश्य और संस्थाओं को आकार देने वाले संपादक-साधक थे, जिनकी विरासत आज भी हिंदी पत्रकारिता और साहित्य की नींव में जीवित है।