हेडगेवार की प्रेरणादायक यात्रा: एक मेडिकल छात्र से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक तक
सारांश
Key Takeaways
- केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म 1 अप्रैल 1889 को हुआ।
- उन्होंने 1925 में 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' की स्थापना की।
- उनके माता-पिता ने प्लेग महामारी के दौरान सेवा की।
- हेडगेवार ने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- उनका निधन 21 जून 1940 को हुआ।
नई दिल्ली, 31 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। केशव बलिराम हेडगेवार, जिनका जन्म 1 अप्रैल 1889 को नागपुर के एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में हुआ, ने बचपन में ही मृत्यु के भयावह चेहरे का सामना किया। 1902 में जब नागपुर में प्लेग की महामारी फैली, तब उनके माता-पिता ने मरीजों की सेवा के लिए अपनी जान की परवाह नहीं की और इस प्रयास में दोनों संक्रमित हो गए। केशव ने मात्र 13 वर्ष की आयु में एक ही दिन अपने माता-पिता की चिताओं को जलते देखा।
बचपन से ही अंग्रेजों के प्रति उनकी नफरत उनके रक्त में दौड़ रही थी। 1897 में, जब वे केवल आठ वर्ष के थे, तब उन्होंने महारानी विक्टोरिया की हीरक जयंती पर बांटी गई मिठाइयों को यह कहते हुए कूड़ेदान में फेंक दिया कि किसी विदेशी सत्ता का जश्न मनाना मातृभूमि का अपमान है। 'वंदे मातरम' का नारा लगाने पर उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया।
हेडगेवार ने 1910 में मेडिकल शिक्षा के लिए कोलकाता की यात्रा की। डॉक्टर बनने के बाद, हेडगेवार ने नागपुर लौटकर एक दिन भी प्रैक्टिस नहीं की। उन्होंने कांग्रेस से जुड़कर 1921 के असहयोग आंदोलन में उग्र भाषण देने के आरोप में एक वर्ष की कठोर सजा काटी।
जेल से रिहाई के बाद का समय उनके लिए विचारों की उथल-पुथल का था। महात्मा गांधी द्वारा खिलाफत आंदोलन का समर्थन और देश भर में भड़के सांप्रदायिक दंगों ने उन्हें झकझोर दिया। उन्होंने भारतीय गुलामी का समाजशास्त्रीय विश्लेषण किया और समझा कि अंग्रेज भारत पर अपनी सैन्य ताकत से नहीं, बल्कि भारतीयों की आपसी फूट के कारण राज कर रहे हैं।
उन्होंने महसूस किया कि बम और पिस्तौल से अंग्रेज भाग सकते हैं, लेकिन यदि समाज भीतर से खोखला रहा, तो हम फिर से गुलाम बन जाएंगे। उन्हें तत्कालीन राजनीतिक उत्तेजना नहीं, बल्कि दीर्घकालिक 'चरित्र निर्माण' की आवश्यकता महसूस हुई।
इसी विचार मंथन से 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के दिन नागपुर में कुछ बच्चों के साथ 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' (आरएसएस) की स्थापना हुई।
हेडगेवार ने 'शाखा' को केवल शारीरिक व्यायाम का स्थान नहीं, बल्कि सामाजिक समानता की एक 'माइक्रो-लैब' बनाया। जब विभिन्न जातियों और आर्थिक वर्गों के युवा एक समान गणवेश पहनकर साथ खेलते और भोजन करते थे, तो सदियों पुरानी छुआछूत की दीवारें अपने आप गिरने लगीं।
उन्होंने संघ को रोज़ की दलगत राजनीति से दूर रखा, लेकिन स्वतंत्रता संग्राम से कभी मुंह नहीं मोड़ा। 1930 में जब गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की, तो हेडगेवार ने सरसंघचालक का पद छोड़कर हजारों स्वयंसेवकों के साथ 'जंगल सत्याग्रह' किया और नौ महीने तक अकोला जेल में कठोर सजा काटी। इतना ही नहीं, जब महान क्रांतिकारी राजगुरु भगत सिंह लाहौर षड्यंत्र के बाद गायब थे, तो हेडगेवार ने अपनी जान पर खेलकर उन्हें नागपुर में गुप्त पनाह दी।
21 जून 1940 को 51 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, लेकिन उन्होंने एक ऐसा बीज बोया था, जो भविष्य में एक विशाल वटवृक्ष बनने वाला था। उनकी विरासत की असली ताकत 1989 में उनके जन्म शताब्दी वर्ष में देखने को मिली। यह वर्ष भारत की राजनीति और समाज के लिए एक 'युगांतरकारी मोड़' साबित हुआ।
संघ ने एक राष्ट्रव्यापी जनसंपर्क अभियान चलाया, जिसने विश्व रिकॉर्ड तोड़ दिए। संघ के कार्यकर्ता भारत के 2 लाख 16 हजार से अधिक गांवों में पहुंचे और लगभग 1.5 करोड़ परिवारों से सीधे संपर्क किया। इस अभियान से 11 करोड़ रुपए की विशाल 'सेवा निधि' जुटाई गई, जिसका उपयोग आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल, अस्पताल और व्यावसायिक केंद्र खोलने के लिए किया गया।
1989 में कांग्रेस सरकार ने डॉ. हेडगेवार पर स्मारक डाक टिकट जारी करने से इनकार किया था। इसके जवाब में संघ ने 'अखंड भारत' के नक्शे वाले 1 करोड़ पोस्टकार्ड छापकर पूरे देश में वितरण किया। अंततः, 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उनके सम्मान में आधिकारिक डाक टिकट जारी किया।