शिवाजी सावंत जयंती: जेब में ₹50 लेकर कुरुक्षेत्र गए, 7 साल की तपस्या से रचा 'मृत्युंजय'
सारांश
मुख्य बातें
मराठी साहित्य के अमर हस्ताक्षर शिवाजी गोविंदराव सावंत का जन्म 31 अगस्त 1940 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के छोटे से गाँव आजरा में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। बचपन से माता के मुख से सुनी कथाएँ और पौराणिक आख्यान उनके भीतर एक साहित्यकार को आकार दे रहे थे — जो आगे चलकर 'मृत्युंजयकार' के नाम से साहित्य जगत में अमर हो गया।
संघर्ष से संवरा व्यक्तित्व
आर्थिक विपन्नता के बीच पले-बढ़े सावंत युवावस्था में एक उत्कृष्ट कबड्डी खिलाड़ी भी रहे। अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत उन्होंने अदालत में एक साधारण क्लर्क के रूप में की। साहित्य के प्रति अपनी गहरी लगन को पोषित करने के लिए उन्होंने कोल्हापुर की राजाराम प्रशाला में 1962 से 1974 तक शिक्षक के रूप में सेवाएँ दीं। बाद में पुणे स्थानांतरित होकर उन्होंने महाराष्ट्र सरकार के शिक्षा विभाग की पत्रिका 'लोकशिक्षण' में पहले सह-संपादक और फिर संपादक का दायित्व निभाया।
₹50 और सात साल की तपस्या — 'मृत्युंजय' की जन्मगाथा
सावंत की साहित्यिक यात्रा का सबसे दीप्तिमान अध्याय उनकी कादंबरी 'मृत्युंजय' है, जो 1967 में प्रकाशित हुई। महाभारत के उपेक्षित महायोद्धा कर्ण के जीवन को केंद्र में रखकर लिखे गए इस उपन्यास के लिए उन्होंने पूरे सात वर्षों तक अनवरत परिश्रम किया। एफवाईबीए की तैयारी के दौरान प्रसिद्ध कवि केदारनाथ मिश्र 'प्रभात' रचित हिंदी खंडकाव्य 'कर्ण' पढ़कर उनकी प्रेरणा और भी प्रगाढ़ हो गई।
उपन्यास को ऐतिहासिक प्रामाणिकता देने के लिए सावंत ने कुरुक्षेत्र की यात्रा का निश्चय किया — उस वक्त उनकी जेब में केवल ₹50 थे, जिन्हें वे 'गिन्न्या' कहते थे। इसी सीमित पूँजी के साथ उन्होंने कुरुक्षेत्र की भौगोलिक स्थिति का गहन अध्ययन किया। कोल्हापुर की एक पुलिस चॉल में अपने बड़े भाई विश्वासराव के साथ रहते हुए उन्होंने यह लेखन पूरी तरह गुप्त रखा।
'मृत्युंजय' में उन्होंने एक अनूठी आत्मकथात्मक शैली अपनाई — उपन्यास छह पात्रों (कर्ण, कुंती, दुर्योधन, वृषाली, शोण और श्रीकृष्ण) के स्वगत कथनों का संकलन है। यह शैली कर्ण के चरित्र को भाग्य और स्वतंत्र इच्छा के द्वंद्व में एक असाधारण मानवीय ऊँचाई प्रदान करती है। इसी कृति ने उन्हें 'मृत्युंजयकार' की उपाधि दिलाई।
इतिहास और पुराण को जीवंत करती अन्य रचनाएँ
1980 में प्रकाशित उपन्यास 'छावा' छत्रपती संभाजी महाराज के जीवन पर आधारित एक शक्तिशाली रचना है, जिसने पाठकों को मराठा साम्राज्य के इस वीर योद्धा के वास्तविक और मानवीय स्वरूप से परिचित कराया। इस कृति का प्रभाव इतना व्यापक रहा कि 2025 में इसी पर आधारित एक हिंदी फिल्म ने अपार व्यावसायिक सफलता प्राप्त की। वर्ष 2000 में प्रकाशित 'युगंधर' में उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को केवल ईश्वर नहीं, बल्कि एक सिद्ध रणनीतिकार और मानवीय संवेदनाओं से भरे महानायक के रूप में प्रस्तुत किया।
पुरस्कार और पारिवारिक संबल
मराठी साहित्य में उनके अप्रतिम योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया। 1994 में उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रतिष्ठित 'मूर्तिदेवी पुरस्कार' से सम्मानित किया गया — यह सम्मान पाने वाले वे पहले मराठी लेखक बने। उनकी रचनाओं का अनेक भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ। परिवार में पत्नी मृणालिनी, पुत्र अमिताभ और पुत्री कादंबिनी — जिन्होंने 'युगंधर' का अंग्रेजी अनुवाद किया — ने उनकी साहित्यिक यात्रा में निरंतर संबल दिया।
असमय विदाई
18 सितंबर 2002 को गोवा में 76वें अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद के लिए प्रचार के दौरान हृदय गति रुकने से शिवाजी सावंत का आकस्मिक निधन हो गया। उनकी रचनाएँ आज भी लाखों पाठकों को कर्ण, संभाजी और कृष्ण के जीवन से नई दृष्टि और प्रेरणा देती हैं।