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राजमाता जीजाबाई: हिंदवी स्वराज्य की जननी, जिन्होंने शिवाजी को छत्रपति बनाया — राज्याभिषेक के 11 दिन बाद निधन

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राजमाता जीजाबाई: हिंदवी स्वराज्य की जननी, जिन्होंने शिवाजी को छत्रपति बनाया — राज्याभिषेक के 11 दिन बाद निधन

सारांश

शिवाजी महाराज को छत्रपति बनाने का सपना जिस माँ ने देखा, वह उसे साकार होते देख सकीं — लेकिन केवल 11 दिन। राजमाता जीजाबाई ने रायगढ़ पर राज्याभिषेक की खुशी के बाद 17 जून 1674 को पाचड़ में अंतिम साँस ली। उनकी विरासत हिंदवी स्वराज्य की असली नींव है।

मुख्य बातें

राजमाता जीजाबाई का जन्म 12 जनवरी 1598 को सिंदखेड़ राजा, बुलढाणा (महाराष्ट्र) में हुआ था।
6 जून 1674 को रायगढ़ किले पर छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक — जीजाबाई के जीवन का सर्वोच्च क्षण।
राज्याभिषेक के मात्र 11 दिन बाद, 17 जून 1674 को पाचड़ गाँव (रायगढ़ के निकट) में उनका निधन हुआ।
जीजाबाई ने शिवाजी को रामायण, महाभारत और भगवद्गीता की शिक्षा दी; घुड़सवारी और तलवारबाजी में स्वयं निपुण थीं।
पिता लखुजीराव जाधव देवगिरि के यादव वंश के मराठा सरदार; पति शाहजी भोंसले आदिलशाही सुल्तानों के सेनापति।
जीजाबाई की समाधि आज भी पाचड़ गाँव में विद्यमान है।

राजमाता जीजाबाई को इतिहास हिंदवी स्वराज्य की जननी के रूप में याद करता है — वह असाधारण महिला, जिन्होंने अपने पुत्र छत्रपति शिवाजी महाराज के हृदय में स्वाधीनता की अखंड ज्वाला प्रज्वलित की। 6 जून 1674 को रायगढ़ किले पर शिवाजी के राज्याभिषेक के साथ उनका आजीवन स्वप्न साकार हुआ, किंतु इस ऐतिहासिक क्षण के मात्र 11 दिन बाद, 17 जून 1674 को पाचड़ गाँव (रायगढ़ के निकट) में उनका देहांत हो गया।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

जीजाबाई का जन्म 12 जनवरी 1598 को सिंदखेड़ राजा (बुलढाणा, महाराष्ट्र) में हुआ था। उनके पिता लखुजीराव जाधव देवगिरि के यादव वंश से संबंधित एक प्रतिष्ठित मराठा सरदार थे और माता का नाम मालासाबाई था। बचपन से ही जीजाबाई में वीरता, स्वाभिमान और धर्मनिष्ठा के गहरे संस्कार थे। उस युग में बाल विवाह की परंपरा के अनुसार कम आयु में ही उनका विवाह शाहजी भोंसले से हुआ, जो विजापुर के आदिलशाही सुल्तानों के अधीन एक कुशल सेनापति थे।

शिवाजी की परवरिश और जीजाबाई की भूमिका

जीजाबाई ने आठ संतानों को जन्म दिया, जिनमें शिवाजी सहित दो पुत्र जीवित रहे। शाहजी अधिकांश समय युद्धों और राजकीय दायित्वों में व्यस्त रहते थे, इसलिए शिवाजी का पालन-पोषण मुख्यतः जीजाबाई ने किया। उन्होंने पुत्र को रामायण, महाभारत और भगवद्गीता की शिक्षा दी तथा हिंदू धर्म, संस्कृति और स्वतंत्रता का महत्व समझाया।

जीजाबाई स्वयं घुड़सवारी और तलवारबाजी में निपुण थीं। वे शिवाजी को पहाड़ी किलों की यात्रा करातीं और स्वराज्य की कल्पना से परिचित करातीं। उन्होंने पुत्र के मन में मुगलों और सल्तनतों के विरुद्ध स्वाधीनता की भावना जगाई — यह प्रेरणा ही आगे चलकर मराठा साम्राज्य की आधारशिला बनी।

राजनीतिक संरक्षक और सलाहकार

शाहजी के निधन (1664) के पश्चात जीजाबाई ने शिवाजी को और अधिक दृढ़ता से सहारा दिया। वे केवल माता नहीं, बल्कि एक कुशल राजनीतिक सलाहकार, प्रेरणास्रोत और संरक्षक के रूप में उनके साथ रहीं। शिवाजी की प्रत्येक विजय में जीजाबाई की दूरदृष्टि और मार्गदर्शन की अमिट छाप थी। गौरतलब है कि उनकी शिक्षाएं — प्रजा की भलाई, धर्मरक्षा और न्याय — शिवाजी के शासन में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती हैं।

राज्याभिषेक और अंतिम विदाई

6 जून 1674 को रायगढ़ के सोने के सिंहासन पर विराजमान अपने पुत्र को देखकर जीजाबाई की आँखें गर्व से भर आईं। हिंदवी स्वराज्य का वह स्वप्न, जिसे उन्होंने दशकों तक संजोया था, अब साकार हो चुका था। किंतु इस ऐतिहासिक पल के मात्र 11 दिन बाद, 17 जून 1674 को पाचड़ गाँव में उनका स्वर्गवास हो गया। माता के इस असमय वियोग ने शिवाजी महाराज को गहरे शोक में डुबो दिया। जीजाबाई की समाधि आज भी पाचड़ गाँव में विद्यमान है और श्रद्धालुओं के लिए एक तीर्थस्थल बनी हुई है।

विरासत और ऐतिहासिक महत्व

राजमाता जीजाबाई केवल एक माता नहीं थीं — वे एक योद्धा, प्रशासक और राष्ट्र-निर्मात्री थीं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि महिलाएं भी इतिहास की धारा बदल सकती हैं। उनके आदर्श आज भी मराठा गौरव और भारतीय स्वाभिमान के प्रतीक हैं। उनकी वीरता, त्याग और दूरदृष्टि ने न केवल मराठा साम्राज्य की नींव रखी, बल्कि पूरे भारत को मुगल आधिपत्य के विरुद्ध संघर्ष का संदेश दिया। यह ऐसे समय में स्मरणीय है जब भारत अपनी सांस्कृतिक विरासत और स्वतंत्रता-संग्राम की जड़ों को नए सिरे से पहचान रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक राजनीतिक दृष्टि की है जो पुरुष-प्रधान युद्धकाल में भी अडिग रही। इतिहास अक्सर शिवाजी की तलवार को याद करता है, परंतु वह तलवार जिस हाथ ने गढ़ी, उसे उचित स्थान नहीं मिला। यह उल्लेखनीय है कि जीजाबाई ने शाहजी की अनुपस्थिति में न केवल पुत्र का पालन-पोषण किया, बल्कि एक वैचारिक आधार तैयार किया जो मराठा साम्राज्य की नैतिक रीढ़ बना। राज्याभिषेक के 11 दिन बाद उनका निधन इतिहास का वह मार्मिक संयोग है जो बताता है कि उनका जीवन-लक्ष्य पूर्ण हो चुका था।
RashtraPress
1 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राजमाता जीजाबाई कौन थीं और उनका शिवाजी से क्या संबंध था?
राजमाता जीजाबाई छत्रपति शिवाजी महाराज की माता थीं और हिंदवी स्वराज्य की जननी के रूप में जानी जाती हैं। उनका जन्म 12 जनवरी 1598 को सिंदखेड़ राजा, बुलढाणा (महाराष्ट्र) में हुआ था और उन्होंने शिवाजी को स्वाधीनता, धर्म और मराठा गौरव की शिक्षा देकर एक योद्धा और राजा के रूप में तैयार किया।
जीजाबाई का निधन कब और कहाँ हुआ?
जीजाबाई का निधन 17 जून 1674 को पाचड़ गाँव (रायगढ़ के निकट, महाराष्ट्र) में हुआ। यह शिवाजी महाराज के रायगढ़ पर राज्याभिषेक (6 जून 1674) के मात्र 11 दिन बाद का समय था।
जीजाबाई को 'हिंदवी स्वराज्य की जननी' क्यों कहा जाता है?
जीजाबाई ने शिवाजी को बचपन से ही स्वराज्य का स्वप्न दिखाया, मुगलों और सल्तनतों के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा दी और रामायण-महाभारत की शिक्षाओं से उनके चरित्र को गढ़ा। उनकी इसी दूरदृष्टि और त्याग के कारण इतिहासकार उन्हें हिंदवी स्वराज्य की वास्तविक नींव मानते हैं।
जीजाबाई के पिता और पति कौन थे?
जीजाबाई के पिता लखुजीराव जाधव देवगिरि के यादव वंश से संबंधित एक प्रतिष्ठित मराठा सरदार थे और माता का नाम मालासाबाई था। उनके पति शाहजी भोंसले विजापुर के आदिलशाही सुल्तानों के अधीन एक कुशल सेनापति थे।
जीजाबाई की समाधि आज कहाँ है?
जीजाबाई की समाधि महाराष्ट्र के पाचड़ गाँव में स्थित है, जो रायगढ़ किले के निकट है। यह स्थान आज भी मराठा इतिहास और जीजाबाई की स्मृति को समर्पित एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल के रूप में जाना जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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