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प्रसव के बाद दूध कम बनने की समस्या? आयुर्वेद के ये प्राकृतिक उपाय दिलाएंगे राहत

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प्रसव के बाद दूध कम बनने की समस्या? आयुर्वेद के ये प्राकृतिक उपाय दिलाएंगे राहत

सारांश

प्रसव के बाद दूध कम बनना लाखों माताओं की समस्या है। आयुर्वेद में शतावरी, मेथी, जीरे जैसी जड़ी-बूटियां, संतुलित आहार, मानसिक शांति और नियमित स्तनपान से इसे दूर किया जा सकता है। जानें कारण और उपाय।

मुख्य बातें

प्रसव के बाद दूध कम बनना एक सामान्य समस्या है जो शरीर, मन और आहार के असंतुलन से होती है।
मानसिक तनाव, नींद की कमी और अपर्याप्त पोषण दूध उत्पादन को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं।
शतावरी, मेथी, जीरा, लहसुन और यष्टिमधु आयुर्वेद में दूध बढ़ाने के लिए सबसे कारगर माने जाते हैं।
नियमित स्तनपान कराने से शरीर को संकेत मिलता है और दूध उत्पादन धीरे-धीरे बढ़ता है।
WHO जन्म के पहले छह महीनों तक केवल स्तनपान की सिफारिश करता है, जो शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए आवश्यक है।
यदि उपाय काम न करें और शिशु का वजन न बढ़े , तो डॉक्टर की सलाह पर फॉर्मूला मिल्क का विकल्प अपनाया जा सकता है।

नई दिल्ली, 22 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। प्रसव के बाद स्तनपान में कमी यानी पर्याप्त दूध न बनना एक ऐसी समस्या है जिससे देशभर में लाखों नई माताएं जूझती हैं। आयुर्वेद के विशेषज्ञों के अनुसार, दूध उत्पादन की यह प्रक्रिया केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और आहार संबंधी तीनों पहलुओं पर एक साथ निर्भर करती है। सही जानकारी और प्राकृतिक उपायों से इस समस्या को काफी हद तक दूर किया जा सकता है।

दूध कम बनने के मुख्य कारण

आयुर्वेद की मान्यता है कि प्रसव के तुरंत बाद महिला का शरीर अत्यंत क्षीण और कमजोर हो जाता है। इस नाजुक अवस्था में यदि उचित पोषण, पर्याप्त विश्राम और मानसिक सुकून न मिले, तो स्तनपान की प्रक्रिया बाधित हो सकती है।

मानसिक तनाव, अनिद्रा और अत्यधिक चिंता दूध उत्पादन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। इसके अलावा अत्यधिक उपवास रखना या पर्याप्त मात्रा में जल और तरल पदार्थ न लेना भी दूध की मात्रा घटाने में बड़ी भूमिका निभाता है।

लक्षण जो संकेत देते हैं कि दूध कम है

कई बार मां को स्वयं अनुभव होता है कि शिशु का पेट भर नहीं रहा। शिशु का वजन धीरे-धीरे बढ़ना या उसका कमजोर दिखना इसका स्पष्ट संकेत है।

कुछ मामलों में शिशु को कब्ज या पेट संबंधी परेशानियां भी हो सकती हैं। ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत आहार और जीवनशैली पर ध्यान देना जरूरी हो जाता है।

आयुर्वेदिक उपाय और औषधीय जड़ी-बूटियां

आयुर्वेद में स्तनपान बढ़ाने के लिए कई प्राकृतिक उपाय सुझाए गए हैं। इनमें सबसे प्रभावी हैं — शतावरी, मेथी, जीरा, लहसुन और यष्टिमधु। ये सभी जड़ी-बूटियां शरीर को आंतरिक बल देती हैं और दूध उत्पादन को प्राकृतिक रूप से प्रोत्साहित करती हैं।

आहार में दूध, घी, हल्के दूध-आधारित व्यंजन और गर्म-तरल भोजन को प्राथमिकता देनी चाहिए। आयुर्वेद के अनुसार मां का भोजन हल्का, पाचन में सरल और पोषण से भरपूर होना चाहिए।

पर्याप्त जल और तरल पदार्थों का सेवन भी उतना ही अनिवार्य है। मां को कभी भूखा या प्यासा नहीं रहना चाहिए, क्योंकि इसका सीधा असर दूध की मात्रा पर पड़ता है।

मानसिक शांति और नियमित फीडिंग का महत्व

मानसिक स्थिरता को आयुर्वेद में दूध उत्पादन का सबसे बड़ा आधार माना गया है। तनाव और चिंता को कम करने के लिए ध्यान, गहरी सांस और पर्याप्त नींद अत्यंत लाभकारी हैं।

इसके साथ ही नियमित अंतराल पर शिशु को स्तनपान कराते रहना बेहद जरूरी है। जब शरीर को बार-बार संकेत मिलता है कि दूध की आवश्यकता है, तो उत्पादन धीरे-धीरे स्वाभाविक रूप से बढ़ने लगता है।

शुरुआती हफ्तों में दूध कम लगना सामान्य है, लेकिन नियमित फीडिंग से अधिकांश मामलों में स्थिति अपने आप सुधर जाती है।

कब लें डॉक्टर की सलाह

यदि आयुर्वेदिक उपाय अपनाने के बाद भी शिशु का वजन नहीं बढ़ रहा या वह अत्यंत कमजोर दिख रहा है, तो किसी योग्य चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।

विशेषज्ञ की सलाह पर सप्लीमेंट या फॉर्मूला मिल्क का सहारा भी लिया जा सकता है। याद रहे कि शिशु का स्वास्थ्य सर्वोपरि है और समय पर सही निर्णय लेना जरूरी है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में स्तनपान जागरूकता अभी भी पर्याप्त नहीं है और ग्रामीण क्षेत्रों में तो यह समस्या और भी गंभीर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी जन्म के पहले छह महीनों तक केवल स्तनपान की सिफारिश करता है, जो शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए अत्यंत आवश्यक है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इस विषय पर सार्वजनिक चर्चा अभी भी सीमित है। विडंबना यह है कि WHO जैसी वैश्विक संस्था छह महीने तक केवल स्तनपान की सिफारिश करती है, जबकि जमीनी स्तर पर जागरूकता और सहायता तंत्र की भारी कमी है। आयुर्वेद की यह पारंपरिक समझ वैज्ञानिक दृष्टि से भी प्रासंगिक है — मानसिक स्वास्थ्य और पोषण का सीधा संबंध दूध उत्पादन से है, जो आधुनिक शोध भी मानते हैं। जरूरत है कि मातृत्व स्वास्थ्य को केवल प्रसव तक सीमित न रखकर प्रसवोत्तर देखभाल को भी नीतिगत प्राथमिकता दी जाए।
RashtraPress
29 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रसव के बाद दूध कम क्यों बनता है?
प्रसव के बाद शरीर की कमजोरी, मानसिक तनाव, नींद की कमी, अपर्याप्त पोषण और कम पानी पीना दूध उत्पादन को घटा देते हैं। आयुर्वेद के अनुसार शरीर, मन और आहार तीनों का संतुलन बिगड़ने पर यह समस्या होती है।
स्तनपान बढ़ाने के लिए कौन सी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां फायदेमंद हैं?
शतावरी, मेथी, जीरा, लहसुन और यष्टिमधु को आयुर्वेद में दूध बढ़ाने वाली प्रमुख जड़ी-बूटियां माना गया है। ये शरीर को पोषण देती हैं और स्तनपान की प्रक्रिया को प्राकृतिक रूप से सुधारती हैं।
क्या नियमित स्तनपान कराने से दूध की मात्रा बढ़ती है?
हां, जितनी बार शिशु को स्तनपान कराया जाएगा, शरीर को उतना ही अधिक दूध बनाने का संकेत मिलेगा। नियमित फीडिंग से अधिकांश मामलों में कुछ हफ्तों में दूध की मात्रा अपने आप बढ़ जाती है।
नई माँ को कैसा आहार लेना चाहिए जिससे दूध बढ़े?
आयुर्वेद के अनुसार नई माँ को हल्का, गर्म, पौष्टिक और तरल भोजन लेना चाहिए। दूध, घी, दाल का पानी और पर्याप्त तरल पदार्थ दूध उत्पादन को बेहतर बनाते हैं।
डॉक्टर से कब मिलना जरूरी है अगर दूध कम बन रहा हो?
यदि आयुर्वेदिक उपाय अपनाने के बावजूद शिशु का वजन नहीं बढ़ रहा या वह कमजोर दिख रहा है, तो तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए। डॉक्टर जरूरत के अनुसार सप्लीमेंट या फॉर्मूला मिल्क की सलाह दे सकते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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