विश्व अंग दान दिवस 13 अगस्त: एक दाता से बच सकती हैं आठ जिंदगियाँ, जानें पूरी प्रक्रिया
सारांश
मुख्य बातें
विश्व अंग दान दिवस हर वर्ष 13 अगस्त को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य अंगदान के प्रति जागरूकता फैलाना और उन भ्रांतियों को दूर करना है जो जरूरतमंद मरीजों तक जीवनदान पहुँचने की राह में बाधा बनती हैं। नई दिल्ली सहित पूरे भारत में इस दिन स्वास्थ्य संस्थाएँ और सरकारी संगठन अंगदान को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित करते हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, एक अंगदाता अपने अंगों और ऊतकों से कई लोगों की जिंदगी बचाने या उनके जीवन की गुणवत्ता बेहतर करने में सहायक हो सकता है।
अंगदान क्या है और यह कैसे काम करता है
अंगदान वह प्रक्रिया है जिसमें किसी व्यक्ति की सहमति और निर्धारित कानूनी-चिकित्सकीय प्रक्रिया के तहत उसके स्वस्थ अंग या ऊतक किसी ऐसे मरीज को प्रत्यारोपित किए जाते हैं, जिसका संबंधित अंग काम नहीं कर रहा हो। गुर्दा, हृदय, फेफड़े, लिवर और आँखें सहित कई अंग गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को नया जीवन दे सकते हैं।
परिस्थितियों के अनुसार एक जीवित व्यक्ति भी कुछ अंगों — जैसे एक किडनी या लिवर के एक हिस्से — का दान कर सकता है। मृत्यु के बाद भी उपयुक्त अंगों और ऊतकों का दान संभव है। अक्सर कहा जाता है कि एक अंगदाता आठ लोगों तक की जान बचाने में योगदान दे सकता है, हालाँकि वास्तविक संख्या दाता की चिकित्सकीय स्थिति और उपलब्ध अंगों पर निर्भर करती है।
चिकित्सा इतिहास में मील का पत्थर
अंग प्रत्यारोपण का इतिहास इंसानी संवेदना और चिकित्सा विज्ञान के अद्भुत मेल की कहानी है। रोनाल्ड ली हेरिक ने वर्ष 1954 में अपने जुड़वां भाई रिचर्ड हेरिक को एक किडनी दान की थी। इस ऐतिहासिक प्रत्यारोपण को डॉ. जोसेफ मरे और उनकी टीम ने अंजाम दिया, जो चिकित्सा इतिहास में पहला सफल जीवित-दाता किडनी प्रत्यारोपण बना।
इस अभूतपूर्व योगदान के लिए डॉ. जोसेफ मरे को 1990 में शरीर क्रिया विज्ञान या चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि अंगदान की दिशा में उठाया गया एक कदम किस तरह चिकित्सा विज्ञान की दिशा बदल सकता है।
भारत में अंगदान की स्थिति और चुनौतियाँ
भारत में प्रत्यारोपण की संख्या बढ़ रही है, लेकिन जरूरतमंद मरीजों की संख्या और उपलब्ध अंगों के बीच का अंतर अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। हाल के वर्षों में देश में प्रत्यारोपण सुविधाओं और बुनियादी ढाँचे में विस्तार हुआ है, फिर भी मृतक-दाता अंगदान की दर को और बढ़ाने की आवश्यकता बनी हुई है।
राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (NOTTO) देश में अंग और ऊतक दान तथा प्रत्यारोपण की व्यवस्था को समन्वित करने वाली प्रमुख संस्था है। सरकार और स्वास्थ्य संस्थाओं की ओर से अंगदान को बढ़ावा देने के प्रयास निरंतर जारी हैं। गौरतलब है कि सड़क दुर्घटनाओं और गंभीर मस्तिष्क चोटों के कुछ मामलों में ब्रेनडेड के बाद व्यक्ति के स्वस्थ अंगों का दान संभव हो सकता है — यही वह क्षेत्र है जहाँ जागरूकता, प्रशिक्षित चिकित्सा व्यवस्था और परिवार की सहमति निर्णायक भूमिका निभाती है।
आम गलतफहमियाँ और वास्तविकता
अंगदान को लेकर समाज में कई भ्रांतियाँ प्रचलित हैं — उम्र को लेकर भ्रम, बीमारी का डर, धार्मिक आशंकाएँ और यह सोच कि अंगदान के बाद शरीर का सम्मान नहीं किया जाएगा। वास्तविकता यह है कि अंगदान की उपयुक्तता व्यक्ति की उम्र से अधिक उसकी चिकित्सकीय स्थिति और संबंधित अंग की दशा पर निर्भर करती है।
18 वर्ष से कम उम्र के संभावित दाताओं के मामले में माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सहमति आवश्यक होती है। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि केवल किसी बीमारी, उम्र या पूर्व स्वास्थ्य समस्या के आधार पर खुद को संभावित दाता मानने से इनकार करना उचित नहीं — यह निर्णय चिकित्सकीय विशेषज्ञ संबंधित परिस्थितियों के आधार पर करते हैं।
परिवार से संवाद क्यों जरूरी है
अंगदान का संकल्प लेना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी जरूरी है कि व्यक्ति अपनी इच्छा के बारे में अपने परिवार को पहले से बताए। मृत्यु के बाद अंगदान की प्रक्रिया में परिवार की भूमिका निर्णायक हो सकती है। यदि परिवार व्यक्ति की इच्छा से पहले से परिचित हो, तो कठिन समय में निर्णय लेना अपेक्षाकृत सरल हो जाता है।
जागरूकता, वैज्ञानिक सोच और परिवार से खुले संवाद के जरिए प्रतीक्षा सूची में जिंदगी की उम्मीद लगाए बैठे अनेक मरीजों तक मदद पहुँचाई जा सकती है। अंगदान का फैसला व्यक्तिगत है, लेकिन उसका प्रभाव गहरा सामाजिक और मानवीय होता है।