गुर्दों को स्वस्थ रखने वाले 8 योगाभ्यास: मोरारजी देसाई संस्थान की सलाह और सही विधि
सारांश
मुख्य बातें
मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान के विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ विशेष योगाभ्यास गुर्दों (किडनी) की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने में सहायक हो सकते हैं। ये आसन गुर्दों में रक्त संचार बढ़ाते हैं, आंतरिक अंगों की प्राकृतिक मालिश करते हैं और शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने की प्रक्रिया को सक्रिय रखते हैं। हालांकि, विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि ये आसन किसी गंभीर गुर्दा रोग का सीधा उपचार नहीं हैं, बल्कि स्वस्थ जीवनशैली के एक अनुपूरक अंग हैं।
किडनी स्वास्थ्य में योग की भूमिका
गुर्दे हमारे शरीर का प्राकृतिक फिल्टरिंग तंत्र हैं — वे रक्त से अपशिष्ट पदार्थ छानकर मूत्र के रूप में बाहर करते हैं। योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि आंतरिक अंगों की सूक्ष्म मालिश और पुनर्जीवन की एक समग्र तकनीक है। आयुष मंत्रालय के दिशानिर्देशों में भी उल्लेख है कि सही योगाभ्यास से गुर्दों तक ऑक्सीजन और पोषण की आपूर्ति बेहतर होती है।
मुख्य योगाभ्यास और उनका प्रभाव
उत्तानपदासन: इस आसन में पैरों को ऊपर उठाने से निचले हिस्से का रक्त पेट और पीठ के निचले भाग — जहाँ गुर्दे स्थित होते हैं — की ओर प्रवाहित होता है। आयुष मंत्रालय के अनुसार, इस बेहतर रक्त संचार से गुर्दे को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती है और वे रक्त को अधिक कुशलता से फिल्टर कर पाते हैं। यह आसन गुर्दे की किसी बीमारी को सीधे ठीक नहीं करता, लेकिन आंतरिक प्रणालियों को सुदृढ़ करता है।
सेतुबंधासन: यह आसन पेट के भीतरी अंगों के साथ-साथ गुर्दों को भी उत्तेजित करता है। पेल्विक क्षेत्र और किडनी के आसपास रक्त संचार सुचारू होने से अंगों को पोषण मिलता है। उल्लेखनीय है कि यह आसन उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने में भी सहायक माना जाता है — जो स्वयं किडनी रोग का एक प्रमुख कारण है।
धनुरासन: इस आसन के दौरान पेट और कमर में होने वाले खिंचाव से गुर्दे सहित आंतरिक अंगों में रक्त प्रवाह बेहतर होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह आसन अंगों को उत्तेजित कर शरीर से विषाक्त पदार्थ बाहर निकालने और मूत्र विकारों को दूर करने में मददगार माना जाता है।
भुजंगासन: नियमित अभ्यास से रीढ़ की हड्डी मजबूत और लचीली बनती है। पेट पर दबाव पड़ने से पाचन तंत्र सक्रिय होता है और किडनी जैसे आंतरिक अंगों की हल्की प्राकृतिक मालिश होती है, जिससे उनकी कार्यक्षमता में सुधार आता है।
अर्ध मत्स्येन्द्रासन: यह आसन पेट के अंगों की गहरी मालिश करता है और उस क्षेत्र में रक्त संचार को बढ़ाता है। इसके नियमित अभ्यास से किडनी और यकृत (लिवर) दोनों को लाभ मिलता है।
वक्रासन: शरीर को मोड़ने की इस क्रिया से पेट के निचले हिस्से और कमर की मांसपेशियों पर हल्का दबाव पड़ता है, जिससे किडनी क्षेत्र में रक्त संचार बेहतर होता है। यह आसन अग्न्याशय को भी उत्तेजित करता है, जिससे इंसुलिन स्राव में सुधार होता है।
कटिचक्रासन: इस आसन के घुमाव (ट्विस्टिंग) से पेट और कमर के आंतरिक अंगों — किडनी और लिवर — की हल्की मालिश होती है। रीढ़ और पेट क्षेत्र में रक्त संचार बढ़ने से गुर्दों को बेहतर ऑक्सीजन और पोषण मिलता है।
त्रिकोणासन: इस आसन में शरीर के एक ओर सिकुड़न और दूसरी ओर खिंचाव एक साथ होता है, जिससे किडनी और लिवर तक रक्त प्रवाह संतुलित रूप से बेहतर होता है।
किन बातों का रखें ध्यान
विशेषज्ञों का सुझाव है कि ये योगाभ्यास किसी प्रशिक्षित योग प्रशिक्षक के मार्गदर्शन में ही शुरू करें, विशेषकर यदि पहले से कोई गुर्दे की बीमारी हो। मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान यह भी स्पष्ट करता है कि ये आसन गंभीर किडनी रोग का विकल्प नहीं हैं — चिकित्सकीय उपचार के साथ-साथ इन्हें अनुपूरक के रूप में अपनाया जा सकता है।
आगे की राह
गुर्दों की दीर्घकालिक सेहत के लिए योग के साथ-साथ पर्याप्त जल-पान, संतुलित आहार और नियमित स्वास्थ्य जाँच भी उतनी ही आवश्यक है। विशेषज्ञों का मानना है कि निवारक स्वास्थ्य देखभाल में योग की भूमिका आने वाले वर्षों में और अधिक प्रासंगिक होती जाएगी।