क्या अमेरिका ने 66 अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से हाथ खींचने का फैसला किया?

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क्या अमेरिका ने 66 अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से हाथ खींचने का फैसला किया?

सारांश

अमेरिका ने 66 अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से हाथ खींचने का फैसला किया है, जिससे विश्व कल्याण पर बड़ा असर पड़ सकता है। जानिए इस निर्णायक कदम के पीछे की वजहें और ट्रंप के 'अमेरिका फर्स्ट' नीति का महत्व।

मुख्य बातें

अमेरिका ने 66 अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से संबंध समाप्त किए।
राष्ट्रपति ट्रंप ने 'अमेरिका फर्स्ट' नीति का पालन किया।
भारत का आईएसए भी प्रभावित हुआ है।
संयुक्त राष्ट्र जलवायु समझौता से अमेरिका अलग होगा।
जलवायु विज्ञान पर ट्रंप की दृष्टि नकारात्मक है।

नई दिल्ली, 8 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह घोषणा की है कि वह अमेरिकी हितों को प्राथमिकता देते हुए जलवायु परिवर्तन से संबंधित संगठनों और विश्व कल्याण के लिए बनी 66 एजेंसियों से अपने संबंध समाप्त करेंगे। इसका मतलब है कि दुनिया का सबसे विकसित देश अब इनमें कोई भी योगदान नहीं देगा।

जैसा कि द गार्डियन ने बताया, इसमें 35 गैर-संयुक्त राष्ट्र (नॉन-यूएन) संगठन और 31 संयुक्त राष्ट्र की संस्थाएं शामिल हैं।

व्हाइट हाउस और विदेश विभाग के अनुसार, ये संगठन अमेरिकी हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं। इनसे धन की बर्बादी हो रही है और संचालन का तरीका भी सही नहीं है। इस कदम को ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति का हिस्सा माना जा रहा है।

ट्रंप के निर्णय के बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कहा कि ये समझौते अमेरिका की प्रगति में बाधा डालते हैं और लोगों की ज़िंदगी पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।

रूबियो ने कहा कि इन संगठनों से अलग होने का यह कदम राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा अमेरिकियों से किए गए वादे को पूरा करता है। हम उन नौकरशाहों को आर्थिक सहायता देना बंद कर देंगे जो हमारे हितों के खिलाफ काम करते हैं। ट्रंप प्रशासन हमेशा अमेरिका और अमेरिकियों को प्राथमिकता देगा।

जिन संगठनों से अमेरिका ने किनारा किया है, उनमें भारत की पहल से बना इंटरनेशनल सोलर अलायंस (आईएसए) भी शामिल है, जिसे 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन फ्रेंच राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने पेरिस जलवायु सम्मेलन में स्थापित किया था।

इसके अलावा, अमेरिका 'संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज' (यूएनएफसीसीसी) से भी बाहर होगा। द गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार, यूएनएफसीसीसी 1992 का एक समझौता है जो लगभग सभी देशों को जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए एकजुट करता है। इसे 34 साल पहले शुरू किया गया था और अमेरिकी सीनेट ने अक्टूबर 1992 में इसे मंजूरी दी थी।

यह पेरिस जलवायु समझौते के लिए भी महत्वपूर्ण है, जिसमें ट्रंप पहले ही अमेरिका को बाहर करने का संकेत दे चुके हैं। ट्रंप ने नवंबर 2025 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु वार्ता में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल भी नहीं भेजा था, जो ब्राजील में आयोजित हुआ था।

इसके अतिरिक्त, इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) जैसी महत्वपूर्ण जलवायु संस्थाओं से भी अमेरिका अलग हो रहा है। ट्रंप ने बार-बार जलवायु विज्ञान का मजाक उड़ाया है, जिसे वह 'घोटाला' और 'फर्जी' करार देते रहे हैं।

ट्रंप ने जनवरी 2025 में ही विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से बाहर निकलने की घोषणा की थी। डब्ल्यूएचओ की सदस्यता से बाहर निकलने के लिए एक साल का नोटिस आवश्यक होता है, इसलिए अमेरिका 22 जनवरी 2026 के बाद इसका सदस्य नहीं रहेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

हमें यह समझना होगा कि अमेरिका का यह कदम अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्रभावित करेगा। यह अमेरिका की वैश्विक भूमिका को पुनर्व्यवस्थित कर सकता है, लेकिन इससे अन्य देशों के साथ रिश्तों पर भी गहरा असर पड़ेगा। हमें यह देखना होगा कि भविष्य में इससे क्या परिणाम निकलते हैं।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डोनाल्ड ट्रंप ने क्यों यह निर्णय लिया?
ट्रंप ने अमेरिकी हितों को प्राथमिकता देते हुए जलवायु परिवर्तन से संबंधित 66 एजेंसियों से हाथ खींचने का निर्णय लिया।
इन एजेंसियों में कौन-कौन सी संस्थाएं शामिल हैं?
इनमें 35 गैर-संयुक्त राष्ट्र संगठन और 31 संयुक्त राष्ट्र की संस्थाएं शामिल हैं।
इस कदम का ट्रंप की नीति से क्या संबंध है?
यह कदम ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति का हिस्सा है, जो अमेरिकी हितों की रक्षा करने पर जोर देती है।
क्या अमेरिका जलवायु परिवर्तन के लिए कोई जिम्मेदारी नहीं लेगा?
जी हां, अमेरिका अब जलवायु परिवर्तन से संबंधित संगठनों में कोई योगदान नहीं देगा।
इस निर्णय का वैश्विक स्तर पर क्या असर होगा?
इससे अंतरराष्ट्रीय सहयोग में कमी आ सकती है और जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक प्रयास प्रभावित हो सकते हैं।
राष्ट्र प्रेस