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आसिम मुनीर की 'हार्ड-स्टेट' नीति: खैबर पख्तूनख्वा में बढ़ता असंतोष और खनिजों पर संघीय कब्जे का खतरा

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आसिम मुनीर की 'हार्ड-स्टेट' नीति: खैबर पख्तूनख्वा में बढ़ता असंतोष और खनिजों पर संघीय कब्जे का खतरा

सारांश

पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर की 'हार्ड-स्टेट' रणनीति खैबर पख्तूनख्वा में उल्टी पड़ सकती है। 11 अक्टूबर 2026 को लागू गवर्नर शासन, मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी और खनिजों पर संघीय कब्जे की कोशिश ने प्रांत को बलूचिस्तान जैसे संकट की राह पर धकेल दिया है।

मुख्य बातें

पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की 'हार्ड-स्टेट' नीति खैबर पख्तूनख्वा में सबसे बड़ी परीक्षा का सामना कर रही है।
11 अक्टूबर 2026 को अनुच्छेद 232 और 234 के तहत प्रांत में संवैधानिक व्यवस्था लागू; मुख्यमंत्री सोहैल अफरीदी 'निवारक हिरासत' में।
2026 की पहली छमाही में पुलिसकर्मियों की मौतें 63 से बढ़कर 122 हुईं; जुलाई-सितंबर तिमाही में हिंसा मौतें 475 से बढ़कर 556 पहुँचीं।
18वें संवैधानिक संशोधन के तहत खनिज प्रांतीय विषय हैं, किंतु कार्यशील विधानसभा के अभाव में संघीय नियंत्रण का रास्ता खुल गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, यह स्थिति बलूचिस्तान जैसे दीर्घकालिक प्रशासनिक संकट की पुनरावृत्ति कर सकती है।

पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की 'हार्ड-स्टेट' (कठोर राज्य) नीति — जो इस धारणा पर टिकी है कि विरोध और प्रतिरोध की जड़ में पर्याप्त बल का अभाव है — खैबर पख्तूनख्वा में एक गंभीर राजनीतिक और सुरक्षा संकट को जन्म दे सकती है। ग्रीक सिटी टाइम्स में प्रकाशित एक विश्लेषण रिपोर्ट के अनुसार, 4 करोड़ से अधिक की आबादी, सक्रिय सशस्त्र विद्रोह और अफगानिस्तान से लगी संवेदनशील सीमा के कारण यह प्रांत इस रणनीति की सबसे कठिन परीक्षा बन सकता है।

खैबर पख्तूनख्वा में संवैधानिक व्यवस्था का लागू होना

रिपोर्ट के अनुसार, 11 अक्टूबर 2026 को पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 232 और 234 के तहत खैबर पख्तूनख्वा में संघीय आपातकालीन शक्तियाँ और गवर्नर शासन लागू किया गया। इस कदम को सैन्य प्रतिष्ठान के समर्थन से अंजाम दिया गया। इसके साथ ही प्रांत के मुख्यमंत्री सोहैल अफरीदी को 'निवारक हिरासत' में ले लिया गया।

रिपोर्ट में कहा गया है, '11 अक्टूबर 2026 को लागू की गई संवैधानिक व्यवस्था ने उस बाधा को समाप्त कर दिया, जो कम से कम 18 महीनों से प्रांत के खनिजों पर संघीय नियंत्रण को रोक रही थी।' अब जहाँ भी संघीय और प्रांतीय कानूनों में टकराव होगा, वहाँ संघीय कानून प्रभावी रहेगा।

खनिज संसाधनों पर नियंत्रण की राजनीति

रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के 18वें संवैधानिक संशोधन के तहत खनिज प्रांतीय विषय हैं। किंतु अब प्रांत में कोई कार्यशील विधानसभा नहीं बची जो इस अधिकार का उपयोग कर सके। कई विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं कि क्या इस्लामाबाद ने प्रांत की खनिज संपदा पर नियंत्रण पाने के लिए चुनी हुई प्रांतीय सरकार को हटाया।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि खैबर पख्तूनख्वा में महत्वपूर्ण खनिजों के दोहन की प्रक्रिया उम्मीद के मुताबिक आगे बढ़ने की संभावना नहीं है। इसके पीछे तीन मुख्य कारण बताए गए हैं: खनिज भंडारों का पूरा भूवैज्ञानिक आकलन अभी तक नहीं हुआ है, प्रसंस्करण क्षमता सीमित है, और सुरक्षा हालात लगातार बिगड़ रहे हैं।

बिगड़ती सुरक्षा स्थिति के आँकड़े

रिपोर्ट में प्रस्तुत आँकड़े चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। वर्ष 2026 की पहली छमाही में पुलिसकर्मियों की मौतों की संख्या बढ़कर 122 हो गई, जबकि एक वर्ष पहले इसी अवधि में यह आँकड़ा 63 था — यानी लगभग दोगुना। वहीं जुलाई से सितंबर 2026 के बीच हिंसा से जुड़ी मौतों की संख्या 556 दर्ज की गई, जो पिछली तिमाही के 475 के मुकाबले उल्लेखनीय रूप से अधिक है।

गौरतलब है कि इस्लामाबाद ने इसी बिगड़ती सुरक्षा स्थिति का हवाला देते हुए खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल लागू करने का औचित्य बताया है। हालाँकि, रिपोर्ट के अनुसार, पश्तूनों के बीच वैधता रखने वाली एकमात्र निर्वाचित सरकार को हटाना और उसके मुख्यमंत्री को गिरफ्तार करना हिंसा की इस प्रवृत्ति को नहीं रोक पाएगा।

बलूचिस्तान जैसी स्थिति की आशंका

रिपोर्ट ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि इस कदम से उग्रवादी संगठनों को अपनी बात रखने के लिए एक मजबूत राजनीतिक मुद्दा मिल जाएगा। रिपोर्ट में कहा गया, 'खैबर पख्तूनख्वा में वही स्थिति पैदा हो सकती है, जिसने बलूचिस्तान को प्रशासनिक रूप से बेहद मुश्किल बना दिया था।' पश्तून राजनीतिक समूहों के बीच फैल रहा संदेह केवल एक साजिश सिद्धांत नहीं, बल्कि घटनाक्रम की स्वाभाविक प्रतिक्रिया बताया गया है।

रिपोर्ट ने यह भी आगाह किया कि प्रांत के संसाधनों को संघीय तथा विदेशी नियंत्रण के लिए खोल देने के सुरक्षा संबंधी परिणाम राज्य को मिलने वाली संभावित आय से कहीं अधिक गंभीर हो सकते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान पहले से ही गंभीर आर्थिक संकट और कई मोर्चों पर आंतरिक अस्थिरता से जूझ रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उसे और गहरा किया। खैबर पख्तूनख्वा में निर्वाचित सरकार को हटाकर और मुख्यमंत्री को हिरासत में लेकर इस्लामाबाद ने उग्रवादी संगठनों को वह राजनीतिक आख्यान सौंप दिया है जो वे वर्षों से तलाश रहे थे। खनिज संसाधनों पर संघीय कब्जे की कोशिश इस पूरे संकट को आर्थिक उपनिवेशवाद का रंग देती है, जो पश्तून पहचान की राजनीति को और धार देगी। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या पाकिस्तानी सेना के पास इस एक साथ कई मोर्चों पर लड़ने की क्षमता है — और इसकी कीमत कौन चुकाएगा।
RashtraPress
31 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आसिम मुनीर की 'हार्ड-स्टेट' नीति क्या है?
यह पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की वह रणनीति है जो इस धारणा पर आधारित है कि विरोध और प्रतिरोध की मुख्य वजह पर्याप्त बल का इस्तेमाल न होना है। इसके तहत राज्य असहमति को दबाने के लिए सैन्य और प्रशासनिक शक्ति का कठोर प्रयोग करता है।
खैबर पख्तूनख्वा में 11 अक्टूबर 2026 को क्या हुआ?
11 अक्टूबर 2026 को पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 232 और 234 के तहत खैबर पख्तूनख्वा में संघीय आपातकालीन शक्तियाँ और गवर्नर शासन लागू किया गया। इसके साथ ही प्रांत के मुख्यमंत्री सोहैल अफरीदी को 'निवारक हिरासत' में ले लिया गया और चुनी हुई प्रांतीय सरकार को प्रभावी रूप से बर्खास्त कर दिया गया।
खैबर पख्तूनख्वा के खनिज संसाधनों पर विवाद क्यों है?
पाकिस्तान के 18वें संवैधानिक संशोधन के तहत खनिज प्रांतीय विषय हैं, यानी उन पर प्रांत का अधिकार है। किंतु गवर्नर शासन लागू होने के बाद प्रांत में कोई कार्यशील विधानसभा नहीं रही, जिससे संघीय सरकार के लिए इन खनिजों पर नियंत्रण स्थापित करने का रास्ता खुल गया है। रिपोर्ट के अनुसार, यही वह बाधा थी जो कम से कम 18 महीनों से संघीय नियंत्रण को रोक रही थी।
खैबर पख्तूनख्वा में सुरक्षा स्थिति कितनी गंभीर है?
रिपोर्ट में दिए गए आँकड़ों के अनुसार, 2026 की पहली छमाही में पुलिसकर्मियों की मौतें 63 से बढ़कर 122 हो गईं। जुलाई से सितंबर 2026 के बीच हिंसा से जुड़ी कुल मौतें 556 रहीं, जो पिछली तिमाही के 475 से अधिक हैं।
क्या खैबर पख्तूनख्वा बलूचिस्तान जैसी स्थिति में पहुँच सकता है?
रिपोर्ट ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि निर्वाचित सरकार को हटाना, मुख्यमंत्री को गिरफ्तार करना और प्रांत के संसाधनों को संघीय व विदेशी नियंत्रण के लिए खोलना उग्रवादी संगठनों को मजबूत राजनीतिक मुद्दा देगा। इससे खैबर पख्तूनख्वा में वही स्थिति पैदा हो सकती है जिसने बलूचिस्तान को दशकों से प्रशासनिक रूप से बेहद मुश्किल बनाए रखा है।
राष्ट्र प्रेस
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