22 अगस्त 2026
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ईरान के बाघेई का अमेरिकी प्रतिबंधों पर पलटवार: 'यह यूएन संप्रभुता पर हमला है'

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ईरान के बाघेई का अमेरिकी प्रतिबंधों पर पलटवार: 'यह यूएन संप्रभुता पर हमला है'

सारांश

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की 'कठोरतम आर्थिक अभियान' की घोषणा के बाद ईरान के विदेश मंत्रालय प्रवक्ता बाघेई ने एक्स पर पलटवार किया — प्रतिबंधों को यूएन चार्टर के अनुच्छेद 2(1) और निकारागुआ मामले के सिद्धांत का उल्लंघन बताते हुए चेतावनी दी कि यह दुनिया को औपनिवेशिक व्यवस्था की ओर धकेल सकता है।

मुख्य बातें

ईरान के विदेश मंत्रालय प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने 22 अगस्त को अमेरिकी प्रतिबंधों को 'अवैध आर्थिक युद्ध' और संप्रभुता पर हमला करार दिया।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को ईरान का साथ देने वाले देशों के खिलाफ 'अब तक का सबसे कठोर आर्थिक अभियान' चलाने की घोषणा की थी।
बाघेई ने कहा कि सेकेंडरी प्रतिबंध यूएन चार्टर के अनुच्छेद 2(1) और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के निकारागुआ मामले में स्थापित सिद्धांत का उल्लंघन हैं।
ईरान ने नौसैनिक नाकेबंदी को 'सैन्य आक्रमण' के समतुल्य बताते हुए चेतावनी दी कि इससे वैश्विक संप्रभुता व्यवस्था चरमरा सकती है।
बाघेई ने आगाह किया कि यह नीति दुनिया को 'पारंपरिक औपनिवेशिक व्यवस्था की ओर' वापस ले जा सकती है।

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने 22 अगस्त को अमेरिका द्वारा लगाए गए नए आर्थिक प्रतिबंधों की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि ये केवल ईरान पर नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की आधारशिला — देशों की संप्रभुता — पर सीधा प्रहार हैं। बाघेई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया साझा करते हुए चेतावनी दी कि इन कदमों का अंतिम परिणाम दुनिया को 'औपनिवेशिक व्यवस्था की ओर वापस ले जाना' हो सकता है।

पृष्ठभूमि: ट्रंप की 'कठोरतम' प्रतिबंधों की घोषणा

यह बयान उस घोषणा के ठीक बाद आया जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को कहा था कि ईरान का साथ देने वाले किसी भी देश के विरुद्ध 'अब तक का सबसे कठोर आर्थिक अभियान' चलाया जाएगा। इस घोषणा के बाद तेहरान ने तत्काल और तीखी प्रतिक्रिया दी, जो अंतरराष्ट्रीय कानूनी तर्कों पर आधारित थी।

बाघेई का कानूनी तर्क: यूएन चार्टर और निकारागुआ मामला

बाघेई ने अपने एक्स पोस्ट में लिखा, 'ईरान पर नए आर्थिक प्रतिबंध लगाने की अमेरिकी घोषणा केवल एक देश के खिलाफ जारी अवैध 'आर्थिक युद्ध' नहीं है। यह संयुक्त राष्ट्र के हर स्वतंत्र सदस्य देश पर अपनी सीमा से बाहर जाकर संप्रभु अधिकार जताने की कोशिश है।'

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी देश कानूनी रूप से दूसरे देशों के बैंकों, कंपनियों या हवाई अड्डों को उनके अपने अधिकार क्षेत्र में वैध व्यापारिक संबंध समाप्त करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। बाघेई के अनुसार, 'ऐसे सेकेंडरी प्रतिबंधों का अंतरराष्ट्रीय कानून में कोई आधार नहीं है। ये संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(1) में निहित समान संप्रभुता के सिद्धांत और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा निकारागुआ मामले में स्थापित हस्तक्षेप-निषेध सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं।'

नौसैनिक नाकेबंदी को 'सैन्य आक्रमण' की संज्ञा

बाघेई ने यह भी चेतावनी दी कि यदि इन आर्थिक दबाव के कदमों को नौसैनिक नाकेबंदी उपायों के साथ जोड़ा गया — जिसे ईरान 'सैन्य आक्रमण' के समतुल्य मानता है — तो अन्य देशों की संप्रभुता केवल उतनी ही रह जाएगी जितनी कोई ताकतवर देश अपनी इच्छा से मान्यता देना चाहे। यह स्थिति, उनके अनुसार, संयुक्त राष्ट्र-आधारित व्यवस्था को जड़ से खोखला कर देगी।

संप्रभुता और औपनिवेशिक व्यवस्था की चेतावनी

बाघेई ने कहा कि इन मांगों को स्वीकार करने से किसी देश को न सुरक्षा मिलेगी, न सम्मान — इसका अर्थ केवल यह होगा कि उसके बैंक, कंपनियाँ और हवाई अड्डे किसी विदेशी शक्ति की अनुमति पर निर्भर होकर काम करेंगे। उन्होंने कहा कि 'यह दुनिया को फिर से पारंपरिक औपनिवेशिक व्यवस्था की ओर ले जाने वाला एक खतरनाक रास्ता साबित हो सकता है।'

आगे क्या होगा

ईरान की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय में आई है जब अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु वार्ता और क्षेत्रीय तनाव दोनों एक साथ चरम पर हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नज़र अब इस पर है कि अन्य देश — विशेषकर वे जो ईरान के साथ व्यापारिक संबंध रखते हैं — अमेरिकी दबाव के सामने किस रुख को अपनाते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसे व्यापक संदर्भ में देखना ज़रूरी है — ईरान दशकों से अमेरिकी प्रतिबंधों के अधीन है और हर नई लहर पर इसी तरह की कानूनी दलीलें सामने आती हैं। असली सवाल यह है कि क्या अन्य देश — विशेषकर भारत, चीन और यूरोपीय साझेदार — इस बार अमेरिकी दबाव के आगे झुकेंगे या ईरान के साथ व्यापार जारी रखने का जोखिम उठाएंगे। यूएन चार्टर की दुहाई देना नैतिक रूप से सही हो सकता है, पर इतिहास बताता है कि सेकेंडरी प्रतिबंधों के सामने अधिकांश देश व्यावहारिकता को तरजीह देते हैं। यदि ट्रंप की घोषणा नौसैनिक नाकेबंदी में बदलती है, तो यह केवल ईरान का नहीं, पूरे खाड़ी क्षेत्र का संकट बन सकता है।
RashtraPress
22 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ईरान के प्रवक्ता बाघेई ने अमेरिकी प्रतिबंधों पर क्या कहा?
बाघेई ने 22 अगस्त को एक्स पर कहा कि अमेरिकी प्रतिबंध केवल ईरान पर नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र के हर स्वतंत्र सदस्य देश की संप्रभुता पर हमला हैं। उन्होंने इसे यूएन चार्टर के अनुच्छेद 2(1) और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के निकारागुआ मामले में स्थापित सिद्धांत का उल्लंघन बताया।
ट्रंप ने ईरान पर कौन-सी नई घोषणा की थी?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को घोषणा की कि ईरान का साथ देने वाले किसी भी देश के विरुद्ध 'अब तक का सबसे कठोर आर्थिक अभियान' चलाया जाएगा। इसी घोषणा के जवाब में ईरान ने अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी।
सेकेंडरी प्रतिबंध क्या होते हैं और ईरान इन्हें क्यों गैरकानूनी मानता है?
सेकेंडरी प्रतिबंध वे होते हैं जिनमें एक देश तीसरे देशों की कंपनियों या बैंकों को किसी लक्षित देश के साथ व्यापार करने से रोकता है। ईरान का कहना है कि इनका अंतरराष्ट्रीय कानून में कोई आधार नहीं है और ये यूएन चार्टर के समान संप्रभुता के सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं।
ईरान ने नौसैनिक नाकेबंदी को लेकर क्या चेतावनी दी?
बाघेई ने चेतावनी दी कि यदि आर्थिक प्रतिबंधों को नौसैनिक नाकेबंदी के साथ जोड़ा गया — जिसे ईरान 'सैन्य आक्रमण' के बराबर मानता है — तो अन्य देशों की संप्रभुता केवल नाममात्र की रह जाएगी। इससे वैश्विक व्यवस्था औपनिवेशिक ढर्रे पर लौट सकती है।
इन प्रतिबंधों का अन्य देशों पर क्या असर पड़ सकता है?
बाघेई के अनुसार, इन प्रतिबंधों को मानने वाले देशों के बैंक, कंपनियाँ और हवाई अड्डे किसी विदेशी शक्ति की अनुमति पर निर्भर हो जाएंगे। इसका अर्थ है कि ईरान के साथ वैध व्यापार करने वाले देशों को भी अमेरिकी दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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