बलूचिस्तान से पीओके तक: पाकिस्तान के मानवाधिकार उल्लंघनों पर बढ़ती अंतरराष्ट्रीय जांच
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में मानवाधिकार उल्लंघनों को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंताएँ तेज़ी से बढ़ रही हैं। यूरोपियन टाइम्स की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, इन क्षेत्रों में जबरन गायब करने की घटनाएँ, राजनीतिक दमन और सुरक्षा बलों की कार्रवाइयाँ वैश्विक मंचों पर गंभीर चर्चा का विषय बन चुकी हैं। मार्च 2026 में जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के समक्ष बलूचिस्तान में जातीय और धार्मिक समुदायों के दमन के गंभीर आरोप औपचारिक रूप से उठाए गए।
संघर्ष की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
रिपोर्टों के अनुसार, बलूचिस्तान संकट की जड़ें 1948 में हैं, जब कलात को पाकिस्तान में शामिल किया गया था। इसके बाद विद्रोह के कई दौर आए, जिनमें सबसे घातक संघर्ष 1973 से 1977 के बीच हुआ था। 21वीं सदी की शुरुआत में संघर्ष का एक नया दौर शुरू हुआ, जिसके पीछे राजनीतिक स्वायत्तता, उचित प्रतिनिधित्व और क्षेत्र के समृद्ध प्राकृतिक गैस व खनिज संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर दशकों से चले आ रहे विवाद हैं।
ग्वादर पोर्ट और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में बलूचिस्तान की भूमिका ने इसके रणनीतिक महत्व को और बढ़ा दिया है। विश्लेषकों का कहना है कि इस भू-राजनीतिक महत्व ने केंद्र सरकार को और अधिक केंद्रीकृत सैन्य कमान की ओर धकेला है।
जबरन गायब करना: एक चलता रहा सिलसिला
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में जबरन गायब करने की नीति ने अनगिनत परिवारों को बरसों से उत्तर की प्रतीक्षा में छोड़ दिया है। बलूच कार्यकर्ता सम्मी दीन बलोच केवल 10 वर्ष की थीं जब 2009 में उनके पिता दीन मोहम्मद बलोच लापता हो गए। वर्षों की निरंतर लड़ाई ने उन्हें लापता व्यक्तियों के परिवारों की सबसे पहचानी जाने वाली आवाज़ों में से एक बना दिया।
गायब करने की ये घटनाएँ थमी नहीं हैं। अप्रैल 2026 में कार्यकर्ता फौजिया बलोच के भाई दाद शाह कराची स्थित अपने घर से गायब हो गए। यह ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन पाकिस्तान पर पारदर्शिता का दबाव बढ़ा रहे हैं।
पीओके में बढ़ता राजनीतिक दमन
पीओके में प्रतिबंधों और दमन का इतिहास लंबा रहा है। अमेरिका स्थित मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने 2006 में ही राजनीतिक अभिव्यक्ति और गतिविधियों पर लगी पाबंदियाँ दर्ज की थीं। 2018 और 2019 में संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों ने अभिव्यक्ति और सभा की स्वतंत्रता, आतंकवाद-रोधी कानूनों के दुरुपयोग और जबरन गायब किए जाने के आरोपों पर गंभीर चिंता जताई थी।
5 जून 2026 को पाकिस्तानी अधिकारियों ने आतंकवाद-रोधी कानून के तहत जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद नियोजित विरोध प्रदर्शनों से पहले दूरसंचार सेवाओं में व्यवधान डाला गया और व्यापक गिरफ्तारियाँ की गईं। जून 2026 में पीओके में विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई घातक झड़पों ने पुलिस हिंसा और प्रदर्शनकारियों की मौत के आरोपों पर अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठती आवाज़ें
रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2026 में जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के सत्र में बलूचिस्तान में जातीय और धार्मिक समुदायों के दमन सहित गंभीर उल्लंघनों के आरोप स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किए गए। आलोचकों का कहना है कि पाकिस्तान ने इन आरोपों को अब तक पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं किया है।
यूरोपियन टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपेक्षा की जा रही है कि वह बलूचिस्तान और पीओके में रोज़मर्रा के मानवाधिकार उल्लंघनों के प्रति और अधिक सक्रिय रुख अपनाए। जवाबदेही और पारदर्शिता की माँग अब वैश्विक राजनयिक मंचों पर एक केंद्रीय मुद्दा बनती जा रही है।