बांग्लादेश में खसरे से 24 घंटे में 7 बच्चों की मौत, इस साल कुल 1,162 मौतें
सारांश
मुख्य बातें
बांग्लादेश में खसरे और खसरे जैसे लक्षणों से बच्चों की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। 11 अक्टूबर 2026 को सुबह 8 बजे तक के पिछले 24 घंटों में 7 और मासूमों की जान चली गई, जिससे इस साल देश में खसरे से जुड़ी कन्फर्म और संदिग्ध मौतों की कुल संख्या 1,162 तक पहुँच गई है। यह महामारी साढ़े सात महीने से अधिक समय से बांग्लादेश को अपनी चपेट में लिए हुए है।
मृत्यु और संक्रमण के ताज़ा आँकड़े
डायरेक्टरेट जनरल ऑफ हेल्थ सर्विसेज (DGHS) ने ताज़ा 7 मौतों को 'संदिग्ध खसरे' की श्रेणी में रखा है। इनमें से किसी की भी खसरे से मौत की प्रयोगशाला में पुष्टि नहीं हुई है। इसके साथ ही संदिग्ध खसरे से हुई कुल मौतों की संख्या 1,058 हो गई है, जबकि लैब में कन्फर्म मौतें 104 पर स्थिर हैं।
इस 24 घंटे की अवधि में संदिग्ध खसरे के 1,180 नए मामले सामने आए, जिससे देशभर में संदिग्ध मामलों की कुल संख्या 2,05,028 हो गई। इसके अतिरिक्त, 93 नए कन्फर्म मामले दर्ज किए गए, जिससे लैब में प्रमाणित संक्रमणों की संख्या 22,421 पर पहुँच गई।
अस्पताल में भर्ती और ठीक होने का रिकॉर्ड
DGHS के अनुसार, 15 मार्च 2026 से अब तक खसरे के संदिग्ध लक्षणों वाले 1,82,047 मरीज़ों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इनमें से 1,74,469 मरीज़ उपचार के बाद ठीक हो चुके हैं। यह आँकड़ा स्वास्थ्य तंत्र पर पड़ रहे अत्यधिक दबाव को दर्शाता है।
टीकाकरण नीति की विफलता — कैसे शुरू हुई यह तबाही
बांग्लादेश के समाचारपत्र 'द डेली स्टार' की रिपोर्ट और 'साइंस डॉट ओआरजी' के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, पूर्ववर्ती अंतरिम सरकार की ढुलमुल नीतियों के कारण नियमित टीकाकरण कार्यक्रम में गंभीर व्यवधान आया। सितंबर 2025 में सरकार ने यूनिसेफ के माध्यम से टीके की खरीद रोक दी थी, जिसे इस संकट का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, अफसरशाही के कारण खुली निविदा प्रक्रिया में देरी हुई, जिससे खसरे और रूबेला के टीके की आपूर्ति बाधित हो गई। गौरतलब है कि बांग्लादेश लंबे समय से इन टीकों की आपूर्ति के लिए यूनिसेफ पर निर्भर था, जिसे मुख्य रूप से गावी (Gavi) और सरकार के माध्यम से वित्तपोषण मिलता था।
सरकारी आँकड़ों के अनुसार, 2025 में केवल 59 प्रतिशत योग्य बच्चों को ही खसरे का टीका लगाया जा सका था। उल्लेखनीय है कि ये आँकड़े बाद में आधिकारिक वेबसाइटों से हटा दिए गए।
रोहिंग्या कैंपों से शुरू हुआ प्रकोप, 58 ज़िलों में फैला
रिपोर्टों के अनुसार, यह बीमारी जनवरी 2026 में म्यांमार सीमा के निकट स्थित रोहिंग्या शरणार्थी कैंपों में सबसे पहले सामने आई। वहाँ से यह तेज़ी से फैलते हुए देश के 64 में से 58 जिलों तक पहुँच गई। इस दौरान 21,000 से अधिक लोगों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी, डिज़ीज़ कंट्रोल एंड रिसर्च (IEDCR) के पूर्व प्रमुख वैज्ञानिक ए.एस.एम. आलमगीर के अनुसार, 2024 से विटामिन-ए वितरण अभियान के नाकाम रहने से बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर पड़ गई, जिसने खसरे के प्रसार को और घातक बना दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक टीकाकरण कवरेज में व्यापक सुधार नहीं होता, तब तक इस महामारी पर नियंत्रण पाना मुश्किल बना रहेगा।