बांग्लादेश में 97 दरगाहों पर हमले, दंडमुक्ति की संस्कृति पर उठे गंभीर सवाल
सारांश
Key Takeaways
- जुलाई 2024 से अप्रैल 2025 के बीच बांग्लादेश में 97 से अधिक दरगाहों और मजारों पर हमले दर्ज किए गए।
- 18 अप्रैल 2025 को कुस्टिया के दौलतपुर में आध्यात्मिक नेता शमीम रेजा की हत्या कर दी गई।
- 100 घटनाओं में केवल 12 FIR दर्ज — बड़ी गिरफ्तारियां नहीं, न्यायिक कार्रवाई नगण्य।
- एचआरएसएस के अनुसार 3 मौतें और 200 से अधिक घायल, जिनमें महिलाएं भी शामिल।
- ढाका डिवीजन में 50+ दरगाहों पर हमले — नारायणगंज में 11 और ढाका में 9 घटनाएं सर्वाधिक।
- चिटगांव डिवीजन में 27 घटनाएं — कुमिल्ला, चिटगांव, नोआखाली, ब्राह्मणबारिया और कॉक्स बाजार प्रभावित।
बांग्लादेश में जुलाई 2024 के विरोध प्रदर्शनों के बाद से देशभर में 97 दरगाहों और मजारों पर हमले, तोड़फोड़, आगजनी और लूटपाट की घटनाएं सामने आई हैं। ढाका ट्रिब्यून की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, इन घटनाओं में कम से कम 3 लोगों की जान गई है और 200 से अधिक लोग घायल हुए हैं, जबकि न्यायिक कार्रवाई लगभग नगण्य रही है।
ताज़ा मामला: कुस्टिया में आध्यात्मिक नेता की हत्या
सबसे ताज़ा और गंभीर घटना 18 अप्रैल 2025 को कुस्टिया जिले के दौलतपुर उपजिला में हुई। यहां एक धार्मिक स्थल पर हमले के दौरान आध्यात्मिक नेता शमीम रेजा की पहले पिटाई की गई और फिर धारदार हथियार से हत्या कर दी गई।
बताया जा रहा है कि यह हमला धार्मिक ईशनिंदा की अफवाहों के बाद भड़की भीड़ ने किया। यह घटना उस व्यापक पैटर्न की एक कड़ी है जिसमें अफवाहें फैलते ही भीड़ धार्मिक स्थलों पर टूट पड़ती है।
आंकड़े जो चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं
ह्यूमन राइट्स सपोर्ट सोसाइटी (एचआरएसएस), ढाका के आंकड़ों के अनुसार, अगस्त 2024 से अप्रैल 2025 के बीच 100 से अधिक हमलों में 3 मौतें और 200 से ज़्यादा घायल दर्ज किए गए। इनमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल हैं।
सूफी परंपरा पर शोध करने वाले संगठन 'मकाम' के अनुसार, केवल ढाका डिवीजन में ही 50 से अधिक दरगाहों पर हमले हुए। इनमें सबसे अधिक नारायणगंज में 11 और ढाका में 9 घटनाएं दर्ज की गईं। किशोरगंज, मानिकगंज, तंगाइल, गाजीपुर और राजबाड़ी जैसे जिले भी प्रभावित रहे।
चिटगांव डिवीजन में कुल 27 घटनाएं दर्ज हुईं — जिनमें कुमिल्ला में 17, चिटगांव में 4, नोआखाली में 3, ब्राह्मणबारिया में 2 और कॉक्स बाजार में 1 घटना शामिल है। सीताकुंड और हाथहजारी की ऐतिहासिक दरगाहों में भी तोड़फोड़ की गई।
दंडमुक्ति की संस्कृति: जांच और गिरफ्तारी में भारी सुस्ती
रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि करीब 100 घटनाओं के बावजूद केवल 12 मामलों में औपचारिक FIR दर्ज हुई। इनमें से अधिकांश में जांच रुकी हुई है, बड़ी गिरफ्तारियां नहीं हुईं और न ही कोई ठोस न्यायिक कार्रवाई की गई।
ढाका के पास धमराई उपजिला में अंतरिम सरकार के कार्यकाल के दौरान तीन दरगाहों पर हमले हुए। तीन मामले दर्ज हुए, लेकिन एक भी गिरफ्तारी नहीं। इनमें से एक दरगाह में गतिविधियां फिर शुरू हो गई हैं, जबकि दो अब भी बंद पड़ी हैं।
विश्लेषकों की राय: क्या हैं असली कारण?
विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश में ये हमले कई कारणों से हो रहे हैं — धार्मिक वैचारिक मतभेद, सामाजिक असहिष्णुता, अफवाहों पर आधारित भीड़ हिंसा, राजनीतिक प्रभाव और स्थानीय वर्चस्व की लड़ाई। इन सभी कारकों का एक साथ सक्रिय होना इन घटनाओं को और जटिल बनाता है।
गौरतलब है कि जुलाई-अगस्त 2024 में बांग्लादेश में हुए राजनीतिक उथल-पुथल के बाद सत्ता के शून्य में कानून-व्यवस्था कमज़ोर पड़ी। इसी दौरान अल्पसंख्यक समुदायों के धार्मिक स्थलों पर हमलों में तेज़ी आई — जो दर्शाता है कि राजनीतिक अस्थिरता और सांप्रदायिक हिंसा के बीच सीधा संबंध है।
आलोचकों का कहना है कि जांच, गिरफ्तारी और अभियोजन में सुस्ती ने हमलावरों को यह संदेश दिया है कि उन्हें कोई सज़ा नहीं मिलेगी — और यही दंडमुक्ति की संस्कृति इन हमलों को जारी रखने की मुख्य वजह बन रही है।
आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि बांग्लादेश की नई सरकार इन मामलों में कोई ठोस कानूनी कार्रवाई करती है या नहीं — क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की नज़र अब इस मुद्दे पर टिकी है।