आईएसकेपी को मिल सकता है पश्चिम एशिया तनाव का फायदा, रिपोर्ट में बड़ी चेतावनी
सारांश
Key Takeaways
- अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमलों से पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ी है, जिसका फायदा आईएसकेपी उठा सकता है।
- कूटनीति विशेषज्ञ पीटर क्नूपे ने 2003 के इराक हमले से तुलना करते हुए दाएश जैसे संगठनों के पुनरुत्थान की चेतावनी दी।
- हथियारों का प्रसार, कमजोर शासन और जनता का असंतोष — ये तीन कारक आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं।
- शिया समुदायों और संस्थानों पर लक्षित हमलों का खतरा बढ़ सकता है।
- आईएसकेपी 2021 के काबुल हवाई अड्डे हमले सहित कई बड़े आतंकी हमलों की जिम्मेदारी ले चुका है।
- भारत के लिए भी यह रिपोर्ट महत्वपूर्ण है क्योंकि आईएसकेपी भारतीय उपमहाद्वीप को अपने निशाने पर रखता है।
नई दिल्ली, 25 अप्रैल — इस्लामिक स्टेट-खुरासान प्रांत (आईएसकेपी) पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का दीर्घकालिक फायदा उठा सकता है। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हालिया हमलों के बाद उपजी अस्थिरता से आतंकी संगठनों के पनपने की आशंका जताई गई है। इंडिया नैरेटिव की एक रिपोर्ट में शनिवार को यह गंभीर चेतावनी दी गई।
रिपोर्ट की मुख्य चेतावनियां
रिपोर्ट के अनुसार, यदि ईरान में अस्थिरता गहराती है, तो इसके दुष्परिणाम केवल उस देश तक सीमित नहीं रहेंगे। इसका असर पूरे पश्चिम एशिया और वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग विशेषज्ञ पीटर क्नूपे ने इस रिपोर्ट को लिखा है। उन्होंने 2003 में इराक पर अमेरिकी हमले का उदाहरण देते हुए बताया कि किस तरह उस सैन्य कार्रवाई ने अप्रत्यक्ष रूप से दाएश (आईएसआईएस) जैसे संगठनों के उभरने का रास्ता तैयार किया था।
इतिहास की पुनरावृत्ति का खतरा
पीटर क्नूपे के अनुसार, इराक में सत्ता संतुलन बदलने के विरुद्ध सुन्नी समुदाय के विरोध ने दुनिया भर से विदेशी लड़ाकों को आकर्षित किया था। इसी असंतोष ने आतंकवाद की जड़ें मजबूत कीं।
उन्होंने कहा कि तथाकथित खिलाफत भले ही समाप्त हो चुकी हो, लेकिन उसके निशान आज भी पश्चिम एशिया, अफ्रीका और एशिया के कई हिस्सों में मौजूद हैं। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या मौजूदा हालात दाएश और जमात नुसरत अल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन जैसे संगठनों के दोबारा उभार की जमीन तैयार कर सकते हैं।
आतंकवाद के पनपने के कारक
क्नूपे ने उन कारकों की पहचान की है जो चरमपंथी संगठनों को ताकत देते हैं। इनमें हथियारों का अनियंत्रित प्रसार, कमजोर शासन व्यवस्था, जनता में व्यापक असंतोष, मानवाधिकार उल्लंघन, दमनकारी नीतियां और अवसरवादी माहौल शामिल हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे हालात में आतंकी संगठन आम लोगों के गुस्से और निराशा का फायदा उठाकर भर्ती अभियान चलाते हैं और हिंसा को बढ़ावा देते हैं।
शिया समुदाय पर बढ़ सकता है खतरा
रिपोर्ट में विशेष रूप से चेताया गया है कि ईरान में बढ़ते तनाव और पहचान आधारित 'हम बनाम वे' की मानसिकता आईएसकेपी नेतृत्व के लिए एक बड़ा अवसर बन सकती है। इससे शिया समुदायों, संस्थानों और व्यक्तियों पर लक्षित हमलों का खतरा उल्लेखनीय रूप से बढ़ सकता है।
गौरतलब है कि आईएसकेपी पहले से ही अफगानिस्तान, पाकिस्तान और मध्य एशिया में सक्रिय रहा है। 2021 में काबुल हवाई अड्डे पर हुए भीषण हमले की जिम्मेदारी भी इसी संगठन ने ली थी। ऐसे में पश्चिम एशिया की मौजूदा उथल-पुथल इस संगठन को नई ऊर्जा और भर्ती के नए अवसर दे सकती है।
वैश्विक और भारतीय सुरक्षा पर असर
भारत के लिए यह रिपोर्ट विशेष महत्व रखती है क्योंकि आईएसकेपी भारतीय उपमहाद्वीप को भी अपने निशाने पर रखता है। खुफिया एजेंसियां पहले भी इस संगठन की भारत में घुसपैठ की कोशिशों की चेतावनी दे चुकी हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम एशिया में यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो वहां से विस्थापित होने वाली आबादी और बिखरे हथियार आतंकवाद के नए केंद्रों को जन्म दे सकते हैं। आने वाले महीनों में क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति और संयुक्त राष्ट्र की प्रतिक्रिया पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।