ड्रोन से कार्डियक अरेस्ट में AED डिलीवरी: यूरोपियन स्टडी में 99% कवरेज का दावा
सारांश
मुख्य बातें
यूरोपियन इमरजेंसी मेडिसिन कांग्रेस में 26 सितंबर 2026 को प्रस्तुत एक नए शोध के अनुसार, ड्रोन तकनीक ऑटोमेटेड एक्सटर्नल डिफिब्रिलेटर (AED) को अस्पताल के बाहर हुए कार्डियक अरेस्ट के मामलों में एम्बुलेंस से पहले घटनास्थल तक पहुँचाने में सक्षम हो सकती है। फ्रांस के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि ड्रोन-आधारित प्रणाली 99% से अधिक मामलों में पाँच मिनट के भीतर AED उपलब्ध करा सकती है — जो मौजूदा स्थायी AED नेटवर्क की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी है।
अध्ययन का आधार और कार्यप्रणाली
फ्रांस के क्रेतेइल स्थित हेनरी-मोंडोर यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के इमरजेंसी मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर मैथ्यू हेडेट की अगुवाई में शोधकर्ताओं की टीम ने ग्रेटर पेरिस क्षेत्र में 2011 से 2024 के बीच दर्ज 28,349 आउट-ऑफ-हॉस्पिटल कार्डियक अरेस्ट मामलों का विश्लेषण किया। इन घटनाओं की भौगोलिक स्थिति की तुलना क्षेत्र में उपलब्ध 1,893 स्थायी AED की लोकेशन से की गई। उल्लेखनीय है कि अध्ययन में सेंट्रल पेरिस को शामिल नहीं किया गया।
प्रोफेसर हेडेट ने कहा, 'इमरजेंसी मेडिकल सर्विस संगठनों और डॉक्टरों के तौर पर हमारा लक्ष्य है कि कार्डियक अरेस्ट के मरीजों को जल्द से जल्द डिफिब्रिलेशन मिल सके।' अध्ययन को अभी पीयर रिव्यू नहीं किया गया है और यह कंप्यूटर मॉडल पर आधारित है।
मौजूदा AED नेटवर्क की सीमाएँ
अध्ययन के नतीजे मौजूदा व्यवस्था की गंभीर खामियाँ उजागर करते हैं। केवल 30% कार्डियक अरेस्ट के मामले ऐसे स्थानों पर हुए जहाँ निकटतम स्थायी AED 500 मीटर की नेटवर्क दूरी पर था। मौजूदा सड़क व्यवस्था के ज़रिये किसी स्थायी AED को घटनास्थल तक पाँच मिनट के भीतर पहुँचाना केवल 30 से 40% मामलों में ही संभव पाया गया।
यदि 84.5% मामलों को 500 मीटर के दायरे में लाना हो तो 910 अतिरिक्त स्थायी AED स्थापित करने होंगे, और 100% कवरेज के लिए 1,712 अतिरिक्त AED की आवश्यकता होगी — जो अत्यंत व्ययसाध्य और लॉजिस्टिक रूप से चुनौतीपूर्ण है।
ड्रोन मॉडल के प्रमुख निष्कर्ष
शोध के अनुसार, यदि 3.9 किलोमीटर के दायरे में सक्रिय ड्रोन बेस स्थापित किए जाएँ तो तस्वीर बदल सकती है। 100 ड्रोन बेस और मात्र 26 अतिरिक्त स्थायी AED के संयोजन से 97% से अधिक कार्डियक अरेस्ट मामलों को कवर किया जा सकता था। 200 ड्रोन बेस के मॉडल में केवल 4 अतिरिक्त AED के साथ 99% से अधिक कवरेज की संभावना सामने आई।
एक संयुक्त मॉडल में 200 ड्रोन बेस और 871 मौजूदा स्थायी AED के साथ लगभग 99.4% मामलों को कवर करने का अनुमान लगाया गया। इमरजेंसी मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. हिलेरी मिंका के नेतृत्व वाली टीम का कहना है कि ड्रोन विशेष रूप से शहरों के बाहरी इलाकों, ग्रामीण क्षेत्रों और दुर्गम स्थानों में अत्यंत उपयोगी हो सकते हैं।
ड्रोन तैनाती कैसे काम करेगी
प्रस्तावित प्रणाली में आपातकालीन सेवा का डिस्पैच सेंटर कार्डियक अरेस्ट की सूचना मिलते ही ड्रोन को सक्रिय करेगा। ड्रोन स्वचालित उड़ान मार्ग से घटनास्थल पर पहुँचेगा, जबकि अंतिम चरण में एक प्रशिक्षित ड्रोन पायलट उसकी निगरानी करेगा। AED के पहुँचने के बाद वहाँ मौजूद कोई भी व्यक्ति डिफिब्रिलेटर का उपयोग शुरू कर सकता है।
गौरतलब है कि स्वीडन में 2020 के एक पायलट अध्ययन में ड्रोन से AED पहुँचाना व्यवहारिक रूप से सफल पाया गया था और कुछ मामलों में ड्रोन एम्बुलेंस से पहले घटनास्थल पर पहुँचा था। यह नया फ्रांसीसी अध्ययन उस पायलट की बड़े पैमाने पर योजना बनाने की दिशा में अगला कदम है।
भारत के संदर्भ में महत्त्व और सीमाएँ
इंडियन हार्ट एसोसिएशन की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय पुरुषों में 50% से अधिक दिल के दौरे 50 वर्ष से कम आयु में और 25% दौरे 40 वर्ष से कम आयु में होते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, CPR और डिफिब्रिलेशन में हर एक मिनट की देरी से जीवित बचने की संभावना लगभग 10% घट जाती है।
हालाँकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि ड्रोन एम्बुलेंस का विकल्प नहीं हैं — इनका उद्देश्य आपातकालीन टीम के पहुँचने से पहले शुरुआती कुछ मिनटों को अधिक प्रभावी बनाना है। मौजूदा अध्ययन कंप्यूटर सिमुलेशन पर आधारित है, इसे पीयर रिव्यू नहीं किया गया है, और शोधकर्ताओं ने स्वयं कहा है कि ड्रोन की परिचालन लागत को व्यवहारिकता मूल्यांकन में शामिल करना अनिवार्य होगा। आने वाले समय में यह तकनीक भारत जैसे देशों में, जहाँ ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में AED की उपलब्धता बेहद सीमित है, एक क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है।