16 जुलाई 2026
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आईसीएमआर की आई-ड्रोन पहल: टीबी जांच का खर्च ₹9,451 से घटकर मात्र ₹91, समय भी 15 दिन से 5 दिन हुआ

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आईसीएमआर की आई-ड्रोन पहल: टीबी जांच का खर्च ₹9,451 से घटकर मात्र ₹91, समय भी 15 दिन से 5 दिन हुआ

सारांश

आईसीएमआर की आई-ड्रोन पहल ने तेलंगाना के यादद्री-भुवनगिरी जिले में टीबी जांच की तस्वीर बदल दी — मरीज़ का खर्च ₹9,451 से घटकर ₹91 और जांच का समय 15 से 5 दिन। 840 मरीजों पर आधारित यह अध्ययन दूरदराज़ की स्वास्थ्य सेवाओं में ड्रोन तकनीक की परिवर्तनकारी भूमिका को रेखांकित करता है।

मुख्य बातें

आईसीएमआर की आई-ड्रोन पहल के तहत तेलंगाना के यादद्री-भुवनगिरी जिले में 840 प्रतिभागियों पर अध्ययन किया गया।
ड्रोन व्यवस्था से टीबी जांच का औसत समय 15 दिन से घटकर 5 दिन हो गया।
मरीज़ों का औसत जेब-खर्च ₹9,451 से घटकर मात्र ₹91 रह गया।
11 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र , 60 उप-स्वास्थ्य केंद्र और 4 टीबी इकाइयाँ 'केंद्र और संपर्क केंद्र' मॉडल से जोड़ी गईं।
राजीव बहल (महानिदेशक, आईसीएमआर) ने कहा कि यह पहल भौगोलिक बाधाओं को पार करने का प्रभावी उदाहरण है।
शोधकर्ताओं ने मौसम, भार-वहन क्षमता और प्रशिक्षण जैसी चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए व्यापक विस्तार की सिफारिश की।

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की आई-ड्रोन पहल के अंतर्गत किए गए एक नए अध्ययन ने यह साबित किया है कि ड्रोन के माध्यम से टीबी के बलगम नमूने जांच प्रयोगशाला तक पहुंचाने से दूरदराज़ के इलाकों में मरीजों का औसत खर्च ₹9,451 से घटकर केवल ₹91 रह गया और जांच का औसत समय 15 दिन से सिमटकर 5 दिन हो गया। 16 जुलाई को सामने आए इस अध्ययन के नतीजे भारत में टीबी उन्मूलन की दिशा में तकनीक की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करते हैं।

अध्ययन की पृष्ठभूमि और संरचना

यह अध्ययन तेलंगाना के यादद्री-भुवनगिरी जिले में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) बीबीनगर और राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम के तहत जिला टीबी कार्यालय के सहयोग से संचालित किया गया। इसमें 840 प्रतिभागियों को शामिल किया गया और पुरानी व नई व्यवस्था की तुलनात्मक समीक्षा की गई। पुरानी व्यवस्था में मरीजों को स्वयं लंबी दूरी तय कर जांच केंद्र पहुंचना पड़ता था, जबकि नई व्यवस्था में बलगम के नमूने नज़दीकी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या उप-स्वास्थ्य केंद्र पर एकत्र कर ड्रोन से निर्धारित टीबी जांच प्रयोगशाला तक भेजे गए।

मुख्य निष्कर्ष: समय और खर्च में भारी कमी

अध्ययन के आंकड़ों के अनुसार, ड्रोन-आधारित व्यवस्था लागू होने के बाद टीबी जांच पूरी होने का औसत समय 15 दिन से घटकर 5 दिन रह गया। इससे बीमारी की पुष्टि जल्दी हो सकी और डॉक्टर समय पर इलाज शुरू करने में सक्षम हुए। आर्थिक दृष्टि से देखें तो पहले यात्रा, मजदूरी की हानि और अन्य खर्चों को मिलाकर मरीजों को औसतन ₹9,451 व्यय करने पड़ते थे, जो नई व्यवस्था में घटकर औसतन ₹91 रह गए। कई मरीजों को तो जांच के लिए कोई यात्रा व्यय ही नहीं करना पड़ा, क्योंकि वे अपने गांव के समीप स्थित स्वास्थ्य केंद्र पर ही नमूना जमा कर सके।

'केंद्र और संपर्क केंद्र' मॉडल की कार्यप्रणाली

इस पहल को 'केंद्र और संपर्क केंद्र' मॉडल के आधार पर लागू किया गया, जिसके तहत 11 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 60 उप-स्वास्थ्य केंद्र और 4 टीबी इकाइयों को आपस में जोड़ा गया। इस नेटवर्क ने स्वास्थ्य सेवाओं को मरीजों के घरों के अधिक निकट पहुंचाया और दूरस्थ जांच केंद्रों तक जाने की बाध्यता समाप्त की। अध्ययन में शामिल स्वास्थ्यकर्मियों ने भी बताया कि इस व्यवस्था से कार्यक्षमता बढ़ी और स्थानीय समुदायों ने इसे सहजता से अपनाया।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

आईसीएमआर के महानिदेशक एवं स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के सचिव डॉ. राजीव बहल ने कहा कि समय पर और किफायती जांच की सुविधा भारत से टीबी समाप्त करने के प्रयासों का अहम हिस्सा है। उन्होंने यह भी कहा कि यह अध्ययन दर्शाता है कि आधुनिक तकनीक की मदद से भौगोलिक बाधाओं को पार किया जा सकता है और दूरदराज़ के लोगों पर समय व खर्च का बोझ कम किया जा सकता है। शोधकर्ताओं ने हालांकि यह भी रेखांकित किया कि मौसम की स्थिति, ड्रोन की भार-वहन क्षमता और कर्मचारियों के नियमित प्रशिक्षण जैसी चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए ही इस व्यवस्था को व्यापक स्तर पर लागू किया जाना चाहिए।

आगे की राह

शोधकर्ताओं के अनुसार यह अध्ययन केवल एक जिले के अनुभव पर आधारित है, फिर भी यह स्पष्ट करता है कि ड्रोन-आधारित व्यवस्था दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने का प्रभावी माध्यम बन सकती है। आईसीएमआर की आई-ड्रोन पहल के तहत देश के दुर्गम इलाकों में टीके, दवाइयाँ, रक्त उत्पाद, ऊतक और अन्य आवश्यक चिकित्सा सामग्री की त्वरित आपूर्ति की संभावनाओं पर भी निरंतर काम जारी है। यह पहल भारत के 2025 तक टीबी उन्मूलन के लक्ष्य की दिशा में तकनीक-आधारित स्वास्थ्य वितरण का एक महत्वपूर्ण मॉडल बन सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसके आंकड़े चौंकाने वाले हैं — ₹9,451 से ₹91 की छलांग महज लागत-कटौती नहीं, बल्कि उस व्यवस्थागत विफलता की स्वीकृति है जो दशकों से गरीब मरीज़ों को इलाज से दूर रखती आई है। असली सवाल यह है कि क्या यह मॉडल केवल पायलट प्रोजेक्ट बनकर रह जाएगा या नीति-निर्माता इसे राष्ट्रीय टीबी कार्यक्रम में संस्थागत रूप देंगे। भारत का 2025 तक टीबी उन्मूलन का लक्ष्य पहले से ही दबाव में है; ऐसे में बिना स्केलेबल फंडिंग और नियामक ढाँचे के, यह पहल एक और सफल प्रयोग की लंबी सूची में जुड़ सकती है जो ज़मीन पर नहीं उतरी।
RashtraPress
16 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आईसीएमआर की आई-ड्रोन पहल क्या है?
आईसीएमआर की आई-ड्रोन पहल एक तकनीक-आधारित स्वास्थ्य वितरण कार्यक्रम है जिसके तहत दूरदराज़ के इलाकों में ड्रोन के ज़रिए टीबी के बलगम नमूने, टीके, दवाइयाँ और अन्य चिकित्सा सामग्री जांच प्रयोगशालाओं तक पहुंचाई जाती है। इसका उद्देश्य भौगोलिक बाधाओं को पार कर ग्रामीण व दुर्गम क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाना है।
ड्रोन से टीबी जांच में मरीज़ों का खर्च कितना कम हुआ?
अध्ययन के आंकड़ों के अनुसार, पुरानी व्यवस्था में यात्रा, मजदूरी की हानि और अन्य खर्चों को मिलाकर मरीज़ों को औसतन ₹9,451 खर्च करने पड़ते थे। ड्रोन-आधारित व्यवस्था लागू होने के बाद यह खर्च घटकर औसतन मात्र ₹91 रह गया।
यह अध्ययन कहाँ और किसने किया?
यह अध्ययन तेलंगाना के यादद्री-भुवनगिरी जिले में एम्स बीबीनगर और राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम के तहत जिला टीबी कार्यालय के सहयोग से किया गया। इसमें 840 प्रतिभागियों को शामिल किया गया और पुरानी व नई व्यवस्था की तुलना की गई।
'केंद्र और संपर्क केंद्र' मॉडल कैसे काम करता है?
इस मॉडल के तहत 11 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 60 उप-स्वास्थ्य केंद्र और 4 टीबी इकाइयों को आपस में जोड़ा गया। मरीज़ अपने नज़दीकी स्वास्थ्य केंद्र पर बलगम का नमूना जमा करते हैं, जिसे ड्रोन के ज़रिए निर्धारित जांच प्रयोगशाला तक पहुंचाया जाता है — इस तरह दूर जाने की ज़रूरत समाप्त हो जाती है।
इस व्यवस्था को बड़े पैमाने पर लागू करने में क्या चुनौतियाँ हैं?
शोधकर्ताओं ने बताया कि मौसम की प्रतिकूल स्थिति, ड्रोन की सीमित भार-वहन क्षमता और स्वास्थ्यकर्मियों के नियमित प्रशिक्षण की आवश्यकता प्रमुख चुनौतियाँ हैं। अध्ययन केवल एक जिले पर आधारित है, इसलिए व्यापक विस्तार से पहले इन पहलुओं पर ध्यान देना ज़रूरी बताया गया है।
राष्ट्र प्रेस
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