आईसीएमआर की आई-ड्रोन पहल से टीबी जांच खर्च ₹9,451 से घटकर ₹91 हुआ, जांच समय भी 15 से 5 दिन
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की 'आई-ड्रोन' पहल के अंतर्गत किए गए एक नए अध्ययन ने दर्शाया है कि ड्रोन के माध्यम से टीबी के बलगम नमूने प्रयोगशाला तक पहुंचाने से मरीजों की जेब पर पड़ने वाला बोझ ₹9,451 से घटकर मात्र ₹91 रह गया — यानी लगभग 99% की कमी। यह अध्ययन तेलंगाना के यादद्री-भुवनगिरी जिले में 16 जुलाई 2025 को सार्वजनिक किया गया और इसे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) बीबीनगर तथा राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम के जिला टीबी कार्यालय के सहयोग से संचालित किया गया।
अध्ययन की पृष्ठभूमि और कार्यप्रणाली
अध्ययन में 840 प्रतिभागियों को शामिल किया गया। पहले की व्यवस्था में मरीजों को टीबी की जांच के लिए स्वयं लंबी दूरी तय करके निर्धारित जांच केंद्र तक जाना पड़ता था, जिससे यात्रा व्यय, मजदूरी का नुकसान और अन्य आनुषंगिक खर्च मिलाकर औसतन ₹9,451 का भार मरीजों पर पड़ता था। नई ड्रोन-आधारित व्यवस्था में बलगम के नमूने मरीज के निकटतम प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या उप-स्वास्थ्य केंद्र पर एकत्र किए गए और वहाँ से ड्रोन द्वारा सीधे टीबी जांच प्रयोगशाला तक भेजे गए।
इस व्यवस्था को 'केंद्र और संपर्क केंद्र' मॉडल के आधार पर लागू किया गया, जिसमें 11 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 60 उप-स्वास्थ्य केंद्र और 4 टीबी इकाइयाँ परस्पर जोड़ी गईं। इससे दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को जांच केंद्र तक की लंबी यात्रा से मुक्ति मिली।
मुख्य निष्कर्ष: समय और खर्च में भारी कमी
अध्ययन के नतीजों के अनुसार, ड्रोन-आधारित व्यवस्था लागू होने के बाद टीबी जांच पूरी होने का औसत समय 15 दिन से घटकर केवल 5 दिन रह गया। इससे बीमारी की पुष्टि पहले हो सकी और डॉक्टर समय पर उपचार शुरू करने में सक्षम हुए। कई मरीजों को जांच के लिए यात्रा पर कोई खर्च ही नहीं करना पड़ा, क्योंकि वे अपने गाँव के निकटवर्ती स्वास्थ्य केंद्र पर ही नमूना जमा कर सके।
गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब भारत सरकार 2025 तक देश से टीबी उन्मूलन के लक्ष्य की दिशा में काम कर रही है — जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के वैश्विक लक्ष्य से पाँच वर्ष पहले है। समय पर जांच और उपचार इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य की आधारशिला है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
आईसीएमआर के महानिदेशक एवं स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के सचिव डॉ. राजीव बहल ने कहा कि समय पर और किफायती जांच की सुविधा भारत से टीबी समाप्त करने के प्रयासों का अहम हिस्सा है। उन्होंने कहा कि यह अध्ययन दिखाता है कि आधुनिक तकनीक की मदद से भौगोलिक कठिनाइयों को दूर किया जा सकता है और दूरदराज़ क्षेत्रों में रहने वाले लोगों पर समय और खर्च का बोझ कम किया जा सकता है। डॉ. बहल के अनुसार, आई-ड्रोन पहल से मिले अनुभव भविष्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत बनाने में सहायक होंगे।
अध्ययन में शामिल स्वास्थ्यकर्मियों ने भी पुष्टि की कि ड्रोन-आधारित व्यवस्था से जांच में देरी कम हुई, कार्यक्षमता बढ़ी और समुदाय ने इसे सहजता से अपनाया। हालाँकि, शोधकर्ताओं ने यह भी रेखांकित किया कि मौसम की प्रतिकूलता, ड्रोन की भार-वहन क्षमता की सीमाएँ और कर्मचारियों के निरंतर प्रशिक्षण जैसी चुनौतियों को ध्यान में रखकर ही इस मॉडल को बड़े पैमाने पर लागू किया जाना चाहिए।
आम जनता पर असर
यह व्यवस्था विशेष रूप से उन वर्गों के लिए राहतकारी है जो दैनिक मजदूरी पर निर्भर हैं और जिनके लिए जांच केंद्र तक जाने का अर्थ एक दिन की आजीविका गँवाना था। ड्रोन-आधारित मॉडल ने स्वास्थ्य सेवाओं को सचमुच 'दरवाजे तक' पहुँचाने की दिशा में ठोस कदम बढ़ाया है।
शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह निष्कर्ष केवल एक जिले के अनुभव पर आधारित हैं, फिर भी ये दर्शाते हैं कि ड्रोन-आधारित स्वास्थ्य सेवा वितरण दूरस्थ क्षेत्रों में एक प्रभावी और स्केलेबल समाधान बन सकता है।
आगे की राह
आईसीएमआर की आई-ड्रोन पहल के अंतर्गत देश के कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में टीके, दवाइयाँ, रक्त उत्पाद, जांच के नमूने, ऊतक और अन्य आवश्यक चिकित्सा सामग्री सुरक्षित एवं त्वरित गति से पहुँचाने की संभावनाओं पर निरंतर कार्य जारी है। यदि इस मॉडल को अन्य राज्यों में भी अपनाया जाता है, तो यह भारत की टीबी-मुक्त अभियान की रफ्तार को उल्लेखनीय रूप से तेज कर सकता है।