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आईसीएमआर की आई-ड्रोन पहल से टीबी जांच खर्च ₹9,451 से घटकर ₹91 हुआ, जांच समय भी 15 से 5 दिन

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आईसीएमआर की आई-ड्रोन पहल से टीबी जांच खर्च ₹9,451 से घटकर ₹91 हुआ, जांच समय भी 15 से 5 दिन

सारांश

आईसीएमआर की आई-ड्रोन पहल ने तेलंगाना में टीबी जांच की तस्वीर बदल दी — मरीजों का खर्च ₹9,451 से घटकर ₹91 और जांच का समय 15 दिन से 5 दिन। 840 मरीजों पर आधारित यह अध्ययन दर्शाता है कि ड्रोन तकनीक भारत के टीबी उन्मूलन अभियान का गेम-चेंजर बन सकती है।

मुख्य बातें

आईसीएमआर की आई-ड्रोन पहल के अंतर्गत तेलंगाना के यादद्री-भुवनगिरी जिले में 840 मरीजों पर अध्ययन किया गया।
ड्रोन-आधारित व्यवस्था से टीबी जांच का औसत समय 15 दिन से घटकर 5 दिन हुआ।
मरीजों की जेब पर खर्च ₹9,451 से घटकर मात्र ₹91 रह गया — लगभग 99% की कमी।
मॉडल में 11 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र , 60 उप-स्वास्थ्य केंद्र और 4 टीबी इकाइयाँ आपस में जोड़ी गईं।
आईसीएमआर के महानिदेशक डॉ.
राजीव बहल ने कहा कि यह तकनीक भौगोलिक बाधाओं को दूर करने में सहायक है।
शोधकर्ताओं ने मौसम, ड्रोन क्षमता और प्रशिक्षण संबंधी चुनौतियों को देखते हुए सावधानीपूर्वक विस्तार की सिफारिश की।

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की 'आई-ड्रोन' पहल के अंतर्गत किए गए एक नए अध्ययन ने दर्शाया है कि ड्रोन के माध्यम से टीबी के बलगम नमूने प्रयोगशाला तक पहुंचाने से मरीजों की जेब पर पड़ने वाला बोझ ₹9,451 से घटकर मात्र ₹91 रह गया — यानी लगभग 99% की कमी। यह अध्ययन तेलंगाना के यादद्री-भुवनगिरी जिले में 16 जुलाई 2025 को सार्वजनिक किया गया और इसे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) बीबीनगर तथा राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम के जिला टीबी कार्यालय के सहयोग से संचालित किया गया।

अध्ययन की पृष्ठभूमि और कार्यप्रणाली

अध्ययन में 840 प्रतिभागियों को शामिल किया गया। पहले की व्यवस्था में मरीजों को टीबी की जांच के लिए स्वयं लंबी दूरी तय करके निर्धारित जांच केंद्र तक जाना पड़ता था, जिससे यात्रा व्यय, मजदूरी का नुकसान और अन्य आनुषंगिक खर्च मिलाकर औसतन ₹9,451 का भार मरीजों पर पड़ता था। नई ड्रोन-आधारित व्यवस्था में बलगम के नमूने मरीज के निकटतम प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या उप-स्वास्थ्य केंद्र पर एकत्र किए गए और वहाँ से ड्रोन द्वारा सीधे टीबी जांच प्रयोगशाला तक भेजे गए।

इस व्यवस्था को 'केंद्र और संपर्क केंद्र' मॉडल के आधार पर लागू किया गया, जिसमें 11 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 60 उप-स्वास्थ्य केंद्र और 4 टीबी इकाइयाँ परस्पर जोड़ी गईं। इससे दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को जांच केंद्र तक की लंबी यात्रा से मुक्ति मिली।

मुख्य निष्कर्ष: समय और खर्च में भारी कमी

अध्ययन के नतीजों के अनुसार, ड्रोन-आधारित व्यवस्था लागू होने के बाद टीबी जांच पूरी होने का औसत समय 15 दिन से घटकर केवल 5 दिन रह गया। इससे बीमारी की पुष्टि पहले हो सकी और डॉक्टर समय पर उपचार शुरू करने में सक्षम हुए। कई मरीजों को जांच के लिए यात्रा पर कोई खर्च ही नहीं करना पड़ा, क्योंकि वे अपने गाँव के निकटवर्ती स्वास्थ्य केंद्र पर ही नमूना जमा कर सके।

गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब भारत सरकार 2025 तक देश से टीबी उन्मूलन के लक्ष्य की दिशा में काम कर रही है — जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के वैश्विक लक्ष्य से पाँच वर्ष पहले है। समय पर जांच और उपचार इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य की आधारशिला है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

आईसीएमआर के महानिदेशक एवं स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के सचिव डॉ. राजीव बहल ने कहा कि समय पर और किफायती जांच की सुविधा भारत से टीबी समाप्त करने के प्रयासों का अहम हिस्सा है। उन्होंने कहा कि यह अध्ययन दिखाता है कि आधुनिक तकनीक की मदद से भौगोलिक कठिनाइयों को दूर किया जा सकता है और दूरदराज़ क्षेत्रों में रहने वाले लोगों पर समय और खर्च का बोझ कम किया जा सकता है। डॉ. बहल के अनुसार, आई-ड्रोन पहल से मिले अनुभव भविष्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत बनाने में सहायक होंगे।

अध्ययन में शामिल स्वास्थ्यकर्मियों ने भी पुष्टि की कि ड्रोन-आधारित व्यवस्था से जांच में देरी कम हुई, कार्यक्षमता बढ़ी और समुदाय ने इसे सहजता से अपनाया। हालाँकि, शोधकर्ताओं ने यह भी रेखांकित किया कि मौसम की प्रतिकूलता, ड्रोन की भार-वहन क्षमता की सीमाएँ और कर्मचारियों के निरंतर प्रशिक्षण जैसी चुनौतियों को ध्यान में रखकर ही इस मॉडल को बड़े पैमाने पर लागू किया जाना चाहिए।

आम जनता पर असर

यह व्यवस्था विशेष रूप से उन वर्गों के लिए राहतकारी है जो दैनिक मजदूरी पर निर्भर हैं और जिनके लिए जांच केंद्र तक जाने का अर्थ एक दिन की आजीविका गँवाना था। ड्रोन-आधारित मॉडल ने स्वास्थ्य सेवाओं को सचमुच 'दरवाजे तक' पहुँचाने की दिशा में ठोस कदम बढ़ाया है।

शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह निष्कर्ष केवल एक जिले के अनुभव पर आधारित हैं, फिर भी ये दर्शाते हैं कि ड्रोन-आधारित स्वास्थ्य सेवा वितरण दूरस्थ क्षेत्रों में एक प्रभावी और स्केलेबल समाधान बन सकता है।

आगे की राह

आईसीएमआर की आई-ड्रोन पहल के अंतर्गत देश के कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में टीके, दवाइयाँ, रक्त उत्पाद, जांच के नमूने, ऊतक और अन्य आवश्यक चिकित्सा सामग्री सुरक्षित एवं त्वरित गति से पहुँचाने की संभावनाओं पर निरंतर कार्य जारी है। यदि इस मॉडल को अन्य राज्यों में भी अपनाया जाता है, तो यह भारत की टीबी-मुक्त अभियान की रफ्तार को उल्लेखनीय रूप से तेज कर सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन एक जिले के 840 मरीजों के आँकड़ों से राष्ट्रीय नीति की दिशा तय करना जल्दबाजी होगी। असली परीक्षा तब होगी जब इस मॉडल को पहाड़ी, तटीय और जनजातीय क्षेत्रों की विविध भौगोलिक परिस्थितियों में आजमाया जाएगा — जहाँ मौसम और कनेक्टिविटी की चुनौतियाँ कहीं अधिक जटिल हैं। भारत का टीबी उन्मूलन लक्ष्य 2025 का है, जबकि स्वास्थ्य अवसंरचना की खाई अभी भी गहरी है; ड्रोन तकनीक उस खाई को पाट सकती है, बशर्ते स्केलिंग के लिए नियामकीय ढाँचा, रखरखाव क्षमता और स्थानीय प्रशिक्षण को उसी प्राथमिकता से संबोधित किया जाए जिस प्राथमिकता से पायलट को मिली थी।
RashtraPress
16 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आईसीएमआर की आई-ड्रोन पहल क्या है?
आईसीएमआर की आई-ड्रोन पहल एक स्वास्थ्य वितरण कार्यक्रम है जिसके तहत दूरस्थ क्षेत्रों में ड्रोन के माध्यम से टीबी नमूने, टीके, दवाइयाँ और अन्य चिकित्सा सामग्री पहुँचाई जाती है। इसका उद्देश्य भौगोलिक बाधाओं के कारण स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रहने वाली आबादी तक पहुँचना है।
ड्रोन से टीबी जांच में खर्च कितना कम हुआ?
अध्ययन के अनुसार, पहले टीबी जांच के लिए यात्रा, मजदूरी के नुकसान और अन्य खर्चों को मिलाकर मरीजों को औसतन ₹9,451 खर्च करने पड़ते थे। ड्रोन-आधारित व्यवस्था लागू होने के बाद यह खर्च घटकर औसतन केवल ₹91 रह गया — लगभग 99% की कमी।
यह अध्ययन कहाँ और कैसे किया गया?
यह अध्ययन तेलंगाना के यादद्री-भुवनगिरी जिले में एम्स बीबीनगर और राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम के जिला टीबी कार्यालय के सहयोग से 840 प्रतिभागियों पर किया गया। इसमें 11 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 60 उप-स्वास्थ्य केंद्र और 4 टीबी इकाइयों को 'केंद्र और संपर्क केंद्र' मॉडल के तहत जोड़ा गया।
ड्रोन व्यवस्था से टीबी जांच में कितना समय बचा?
अध्ययन के अनुसार, ड्रोन-आधारित नमूना संग्रह और परिवहन व्यवस्था लागू होने के बाद टीबी जांच पूरी होने का औसत समय 15 दिन से घटकर केवल 5 दिन रह गया। इससे डॉक्टर समय पर उपचार शुरू करने में सक्षम हुए।
क्या इस मॉडल को पूरे भारत में लागू किया जा सकता है?
शोधकर्ताओं के अनुसार यह अध्ययन केवल एक जिले पर आधारित है, इसलिए व्यापक स्तर पर लागू करने से पहले मौसम, ड्रोन की भार-वहन क्षमता और कर्मचारियों के नियमित प्रशिक्षण जैसी चुनौतियों का समाधान आवश्यक है। आईसीएमआर इस दिशा में देश के अन्य कठिन क्षेत्रों में भी संभावनाएँ तलाश रहा है।
राष्ट्र प्रेस
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