27 सितंबर 2026
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पोरबंदर हवाई अड्डे पर ड्रोन खतरे से निपटने का बहु-एजेंसी मॉक अभ्यास, भारतीय नौसेना का नेतृत्व

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पोरबंदर हवाई अड्डे पर ड्रोन खतरे से निपटने का बहु-एजेंसी मॉक अभ्यास, भारतीय नौसेना का नेतृत्व

सारांश

पोरबंदर हवाई अड्डे पर भारतीय नौसेना और CISF ने मिलकर ड्रोन खतरे से निपटने का बहु-एजेंसी मॉक अभ्यास किया। लेफ्टिनेंट कमांडर सूरज की अगुवाई में जवानों को रडार, RF पहचान और जैमिंग तकनीकों की जानकारी दी गई — संवेदनशील प्रतिष्ठानों की सुरक्षा में एक ज़रूरी कदम।

मुख्य बातें

27 सितंबर 2026 को पोरबंदर हवाई अड्डे पर भारतीय नौसेना के समन्वय से बहु-एजेंसी ड्रोन-रोधी मॉक अभ्यास आयोजित किया गया।
अभ्यास का उद्देश्य संभावित ड्रोन खतरों की स्थिति में एजेंसियों के बीच समन्वय, संचार और त्वरित प्रतिक्रिया परखना था।
लेफ्टिनेंट कमांडर सूरज के नेतृत्व में नौसेना टीम ने CISF जवानों के लिए विशेष ड्रोन जागरूकता सत्र आयोजित किया।
सत्र में रडार आधारित पहचान , RF तकनीक और जैमिंग प्रणाली — तीन प्रमुख ड्रोन-रोधी तकनीकों की जानकारी दी गई।
रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक इस पहल से भारतीय नौसेना और केंद्रीय सुरक्षा बलों के बीच समन्वय और मज़बूत हुआ।

भारतीय नौसेना के समन्वय में पोरबंदर हवाई अड्डे पर 27 सितंबर 2026 को एक बहु-एजेंसी मॉक अभ्यास आयोजित किया गया, जिसका उद्देश्य हवाई क्षेत्र में संभावित ड्रोन खतरों से निपटने की तैयारियों को परखना और केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) के जवानों की क्षमता को मज़बूत करना था। यह अभ्यास ऐसे समय में किया गया है जब देशभर के संवेदनशील प्रतिष्ठानों पर ड्रोन-जनित सुरक्षा जोखिमों को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है।

अभ्यास का मुख्य उद्देश्य

इस मॉक अभ्यास का केंद्रीय लक्ष्य किसी संभावित हवाई खतरे या संदिग्ध ड्रोन की मौजूदगी की स्थिति में विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय, प्रभावी संचार और त्वरित प्रतिक्रिया की तैयारियों को जाँचना था। अभ्यास के दौरान वास्तविक परिदृश्यों का अनुकरण करते हुए सूचना साझा करने और तत्काल कार्रवाई की प्रक्रिया पर विशेष बल दिया गया।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के संयुक्त अभ्यास हवाई अड्डों जैसे संवेदनशील ठिकानों की सुरक्षा में अंतर-एजेंसी खामियों को दूर करने की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।

ड्रोन जागरूकता सत्र

अभ्यास की समाप्ति के बाद लेफ्टिनेंट कमांडर सूरज के नेतृत्व में भारतीय नौसेना की टीम ने CISF जवानों के लिए एक विशेष ड्रोन जागरूकता सत्र का आयोजन किया। इस सत्र में अलग-अलग प्रकार के ड्रोन, उनसे उत्पन्न होने वाले संभावित खतरों और उन्हें निष्क्रिय करने की तकनीकों की विस्तृत जानकारी दी गई।

सत्र में तीन प्रमुख ड्रोन-रोधी तकनीकों पर ध्यान केंद्रित किया गया — रडार आधारित पहचान प्रणाली, रेडियो आवृत्ति (RF) के ज़रिए ड्रोन का पता लगाने वाली तकनीक, और ड्रोन संकेतों को बाधित करने वाली जैमिंग प्रणाली। जवानों को बदलती ड्रोन तकनीक और उससे जुड़े नए खतरों के प्रति भी सचेत किया गया।

अंतर-एजेंसी समन्वय पर जोर

इस अभ्यास से भारतीय नौसेना और केंद्रीय सुरक्षा बलों के बीच सूचना साझा करने और संयुक्त प्रतिक्रिया की क्षमता में उल्लेखनीय सुधार की उम्मीद जताई गई है। आपात स्थिति में तेज़ और प्रभावी कार्रवाई के लिए आवश्यक प्रोटोकॉल को भी इस अभ्यास के दौरान परखा गया।

गौरतलब है कि देश के कई हवाई अड्डों पर अतीत में अनधिकृत ड्रोन देखे जाने की घटनाएँ सामने आई हैं, जिसके मद्देनज़र इस प्रकार की तैयारियाँ और भी ज़रूरी हो जाती हैं।

आगे की राह

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक इस पहल से हवाई अड्डे पर तैनात सुरक्षा कर्मियों की ड्रोन खतरों को पहचानने और उनसे निपटने की समग्र क्षमता बेहतर होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के नियमित संयुक्त अभ्यास भविष्य में अन्य प्रमुख हवाई अड्डों पर भी आयोजित किए जाने चाहिए, ताकि देशव्यापी सुरक्षा तंत्र को और सुदृढ़ किया जा सके।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पोरबंदर हवाई अड्डे पर ड्रोन-रोधी मॉक अभ्यास क्यों आयोजित किया गया?
यह अभ्यास हवाई अड्डे पर संभावित ड्रोन खतरों से निपटने की तैयारियों को परखने के लिए किया गया। इसका उद्देश्य भारतीय नौसेना और CISF जैसी केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय, संचार और त्वरित प्रतिक्रिया की क्षमता को मज़बूत करना था।
ड्रोन जागरूकता सत्र में CISF जवानों को क्या सिखाया गया?
लेफ्टिनेंट कमांडर सूरज के नेतृत्व में आयोजित सत्र में जवानों को विभिन्न प्रकार के ड्रोन, उनसे जुड़े खतरों और ड्रोन-रोधी प्रणालियों की जानकारी दी गई। इसमें रडार आधारित पहचान, रेडियो आवृत्ति (RF) तकनीक और जैमिंग प्रणाली शामिल थी।
इस अभ्यास में कौन-सी एजेंसियाँ शामिल थीं?
इस बहु-एजेंसी मॉक अभ्यास में भारतीय नौसेना और केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) मुख्य रूप से शामिल थे। पूरा अभ्यास भारतीय नौसेना के समन्वय से पोरबंदर हवाई अड्डे पर किया गया।
ड्रोन-रोधी जैमिंग प्रणाली क्या होती है?
जैमिंग प्रणाली एक ड्रोन-रोधी तकनीक है जो ड्रोन और उसके संचालक के बीच रेडियो संकेतों को बाधित कर ड्रोन को नियंत्रण से बाहर कर देती है। इसे रडार आधारित पहचान और RF तकनीक के साथ मिलकर उपयोग किया जाता है।
हवाई अड्डों पर ड्रोन खतरा कितना गंभीर है?
देश के कई हवाई अड्डों पर अतीत में अनधिकृत ड्रोन देखे जाने की घटनाएँ सामने आ चुकी हैं, जिससे यह खतरा गंभीर माना जाता है। रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक ड्रोन तकनीक की सुलभता बढ़ने के साथ संवेदनशील प्रतिष्ठानों पर इससे उत्पन्न जोखिम भी तेज़ी से बढ़ा है।
राष्ट्र प्रेस
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