दक्षिण चीन सागर: चीन ने फिलीपींस के क्षेत्रीय दावों को ऐतिहासिक और कानूनी रूप से निराधार बताया
सारांश
मुख्य बातें
चीन के प्राकृतिक संसाधन मंत्रालय के अंतर्गत समुद्री विकास रणनीति संस्थान ने 8 जुलाई 2026 को एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की, जिसमें दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस के क्षेत्रीय दावों को ऐतिहासिक और अंतरराष्ट्रीय कानून की दृष्टि से निराधार करार दिया गया है। रिपोर्ट का शीर्षक है — 'दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस के क्षेत्रीय दावों की ऐतिहासिक और कानूनी आलोचना'। यह रिपोर्ट ऐसे समय जारी की गई है जब दक्षिण चीन सागर में दोनों देशों के बीच समुद्री तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
रिपोर्ट में क्या कहा गया
रिपोर्ट के अनुसार, फिलीपींस ने अंतरराष्ट्रीय कानूनी वैधता वाली कई संधियों का उल्लंघन करते हुए हुआंगयेन द्वीप और नानशा द्वीप समूह के कुछ हिस्सों पर अपना प्रादेशिक दावा ठोकने का प्रयास किया है। चीनी संस्थान का दावा है कि यह विस्तार न केवल ऐतिहासिक रूप से निराधार है, बल्कि प्रादेशिक अधिग्रहण से संबंधित अंतरराष्ट्रीय कानून का भी स्पष्ट उल्लंघन है।
तीन मुख्य निष्कर्ष
रिपोर्ट में तीन प्रमुख बिंदु रेखांकित किए गए हैं। पहला, फिलीपींस की भौगोलिक सीमाएं अंतरराष्ट्रीय संधियों द्वारा पहले से निर्धारित हैं और उनसे परे किसी भी दावे का कोई आधार नहीं है। दूसरा, हुआंगयेन द्वीप और नानशा द्वीप समूह पर फिलीपींस के दावे ऐतिहासिक साक्ष्यों से रहित हैं। तीसरा, रिपोर्ट के अनुसार फिलीपींस के भौगोलिक विस्तार के प्रयासों से पहले ही 'गंभीर नुकसान' हो चुका है।
क्षेत्रीय शांति पर असर
रिपोर्ट में यह भी तर्क दिया गया है कि फिलीपींस की कथित अवैध कार्रवाइयाँ न केवल मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था को चुनौती देती हैं, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया में क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए भी खतरा उत्पन्न करती हैं। गौरतलब है कि 2016 में स्थायी मध्यस्थता न्यायालय ने दक्षिण चीन सागर पर चीन के व्यापक दावों को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अमान्य घोषित किया था — एक निर्णय जिसे चीन ने हमेशा खारिज किया है।
व्यापक संदर्भ
यह रिपोर्ट चीन की उस रणनीति का हिस्सा प्रतीत होती है जिसमें वह दक्षिण चीन सागर विवाद को कूटनीतिक और कानूनी दस्तावेज़ों के माध्यम से अपने पक्ष में परिभाषित करने का प्रयास करता रहा है। फिलीपींस ने अभी तक इस रिपोर्ट पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मनीला और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस दस्तावेज़ पर क्या रुख अपनाते हैं।