भोपाल सीबीआई कोर्ट का फैसला: बैंक ऑफ इंडिया धोखाधड़ी में पूर्व मैनेजर पीयूष चतुर्वेदी समेत दो को 7 साल की सजा
सारांश
मुख्य बातें
भोपाल की सीबीआई कोर्ट ने बुधवार, 8 जुलाई 2026 को बैंक ऑफ इंडिया धोखाधड़ी मामले में दो दोषियों को सात वर्ष की कठोर कारावास (आरआई) और ₹60,000 के जुर्माने की सजा सुनाई। दोषियों में बैंक ऑफ इंडिया की मिसरोद शाखा, भोपाल के तत्कालीन सीनियर ब्रांच मैनेजर पीयूष चतुर्वेदी और निजी व्यक्ति मोहन सिंह सोलंकी शामिल हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 25 जनवरी 2016 को दर्ज किया गया था, जब बैंक ऑफ इंडिया के जोनल ऑफिस, भोपाल के तत्कालीन डिप्टी जोनल मैनेजर ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को लिखित शिकायत दी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि पीयूष चतुर्वेदी ने 21 नवंबर 2013 को धोखाधड़ी और बेईमानी से सनी एंटरप्राइजेज के नाम पर ₹30 लाख का टर्म लोन और कैश क्रेडिट लिमिट स्वीकृत की।
मुख्य घटनाक्रम: कैसे हुई धोखाधड़ी
लोन स्वीकृति के उसी दिन, जाली और मनगढ़ंत आरटीजीएस फॉर्म और वाउचर के आधार पर सनी एंटरप्राइजेज के खाते से ₹22 लाख की राशि आरटीजीएस ट्रांजेक्शन के ज़रिए निकाली गई। यह रकम सीधे आरोपी मोहन सिंह सोलंकी की फर्म गोल्ड फ्लाई ऐश के खाते में स्थानांतरित कर दी गई। दोनों आरोपियों ने आपराधिक साजिश के तहत इस राशि का गबन किया, जिससे बैंक को लाखों रुपए का नुकसान उठाना पड़ा।
जांच और चार्जशीट
सीबीआई ने मामले की विस्तृत जांच पूरी करने के बाद पीयूष चतुर्वेदी और मोहन सिंह सोलंकी के विरुद्ध चार्जशीट दाखिल की। लंबे ट्रायल के बाद अदालत ने दोनों को दोषी करार दिया। गौरतलब है कि यह मामला लगभग एक दशक पुराना है और इसमें बैंकिंग प्रणाली के भीतर से ही साजिश रची गई थी।
कोर्ट का फैसला
भोपाल की सीबीआई कोर्ट ने दोनों दोषियों को सात वर्ष की कठोर कारावास और ₹60,000 का जुर्माना लगाया। यह फैसला बैंकिंग क्षेत्र में आंतरिक मिलीभगत से होने वाली धोखाधड़ी पर सख्त न्यायिक रुख का संकेत देता है।
आम जनता और बैंकिंग क्षेत्र पर असर
यह ऐसे समय में आया है जब बैंक धोखाधड़ी के मामलों में बैंककर्मियों की संलिप्तता एक गंभीर चिंता बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के फैसले बैंकिंग प्रणाली में जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं। आगे यह देखना होगा कि क्या बैंक ऑफ इंडिया नुकसान की भरपाई के लिए सिविल कार्रवाई भी करता है।