बैंक धोखाधड़ी में पूर्व ब्रांच मैनेजर और सह-आरोपी को 5 साल की सजा, 13 लाख का जुर्माना

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बैंक धोखाधड़ी में पूर्व ब्रांच मैनेजर और सह-आरोपी को 5 साल की सजा, 13 लाख का जुर्माना

सारांश

लखनऊ की सीबीआई कोर्ट ने बैंक धोखाधड़ी मामले में दो आरोपियों को 5 साल की कठोर सजा सुनाई है। यह मामला 2003-2004 का है, जिसमें 36 फर्जी लोन स्वीकृत किए गए।

Key Takeaways

  • बैंक धोखाधड़ी में दोषियों को 5 साल की सजा मिली।
  • जुर्माना: 13 लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया।
  • मामला वर्ष 2003-2004 का है।
  • फर्जी दस्तावेजों के आधार पर 36 हाउसिंग लोन स्वीकृत किए गए।
  • सीबीआई का यह निर्णय भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ठोस कदम है।

लखनऊ, 30 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। एक लंबे समय से लंबित बैंक धोखाधड़ी के मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की विशेष अदालत ने महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। लखनऊ की सीबीआई कोर्ट ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की इलाहाबाद स्थित कर्नलगंज शाखा के पूर्व ब्रांच मैनेजर अशोक कुमार दीक्षित और एम/एस जीआर एसोसिएट्स, इलाहाबाद के प्रोप्राइटर गोविंद राम तिवारी को दोषी ठहराते हुए 5-5 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही, दोनों पर कुल 13 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है।

सीबीआई की ओर से सोमवार को जारी की गई प्रेस नोट में बताया गया है कि यह मामला वर्ष 2003-2004 के दौरान का है, जब अशोक कुमार दीक्षित इलाहाबाद के कर्नलगंज शाखा में ब्रांच मैनेजर के पद पर कार्यरत थे। उन पर आरोप है कि उन्होंने गोविंद राम तिवारी के साथ मिलकर एक आपराधिक साजिश बनाई और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर 36 हाउसिंग लोन स्वीकृत एवं वितरित किए। इन लोन की कुल राशि लगभग 1 करोड़ 69 लाख 45 हजार रुपए थी। जांच में यह पाया गया कि इन फर्जी लोन के माध्यम से बैंक को लगभग 1 करोड़ 81 लाख 85 हजार 500 रुपए का नुकसान हुआ, जबकि आरोपियों को इसका सीधा लाभ मिला।

सीबीआई ने इस मामले को 31 मई 2005 को स्रोत से मिली जानकारी के आधार पर दर्ज किया था। विस्तृत जांच के बाद, एजेंसी ने 8 अगस्त 2007 को आरोपपत्र दाखिल किया, जिसमें दोनों आरोपियों का नाम शामिल था। लंबी सुनवाई और साक्ष्यों के परीक्षण के बाद, सीबीआई की विशेष अदालत ने दोनों आरोपियों को दोषी पाया। अदालत ने माना कि आरोपियों ने सुनियोजित तरीके से बैंक को धोखा देकर फर्जी लोन स्वीकृत किए और आर्थिक अपराध को अंजाम दिया।

इस फैसले को बैंकिंग क्षेत्र में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ठोस संदेश के रूप में देखा जा रहा है। अदालत के इस निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि वित्तीय संस्थानों के साथ धोखाधड़ी करने वालों को कानून के तहत कड़ी सजा दी जाएगी। सीबीआई अधिकारियों का कहना है कि एजेंसी आर्थिक अपराधों के खिलाफ अपनी कार्रवाई जारी रखेगी और दोषियों को न्याय के कटघरे तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है।

Point of View

बल्कि यह वित्तीय संस्थानों के प्रति लोगों के विश्वास को प्रभावित करने वाला भी है। सीबीआई का यह निर्णय यह दर्शाता है कि कानून सभी के लिए समान है और आर्थिक अपराधों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे।
NationPress
30/03/2026

Frequently Asked Questions

इस मामले में सजा कितने साल की है?
दोनों आरोपियों को 5-5 साल की कठोर सजा सुनाई गई है।
क्या जुर्माना भी लगाया गया है?
हाँ, दोनों पर कुल 13 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है।
यह मामला कब का है?
यह मामला वर्ष 2003-2004 का है।
सीबीआई ने कब मामला दर्ज किया था?
सीबीआई ने 31 मई 2005 को मामला दर्ज किया था।
फर्जी लोन की कुल राशि क्या थी?
फर्जी लोन की कुल राशि लगभग 1 करोड़ 69 लाख 45 हजार रुपए थी।
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