जिनेवा में UN के पहले वैश्विक एआई शासन संवाद में चीनी प्रतिनिधि च्या क्वेईते का संबोधन
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र के कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) शासन पर पहले वैश्विक संवाद का उद्घाटन 7 जुलाई 2025 को जिनेवा, स्विट्जरलैंड में हुआ। इस ऐतिहासिक बैठक में जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र कार्यालय एवं स्विट्जरलैंड में अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों में चीन के स्थायी प्रतिनिधि च्या क्वेईते ने 'कृत्रिम बुद्धिमत्ता की खाई को पाटना' विषय पर अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया। यह संवाद वैश्विक एआई नीति-निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण बहुपक्षीय पहल मानी जा रही है।
एआई शासन पर चीन का दृष्टिकोण
च्या क्वेईते ने अपने संबोधन में कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता देशों के विकास परिदृश्य और वैश्विक शासन संरचना को गहराई से बदल रही है। उन्होंने सभी पक्षों से आग्रह किया कि वे समावेशिता और साझा लाभ को अपना प्रारंभिक बिंदु मानें, संयुक्त राष्ट्र को मुख्य माध्यम के रूप में स्थापित करें और क्षमता निर्माण को केंद्र में रखें। उनका आह्वान था कि एक समावेशी, खुला, टिकाऊ, निष्पक्ष, सुरक्षित और विश्वसनीय डिजिटल भविष्य का निर्माण किया जाए।
डिजिटल संप्रभुता का प्रश्न
च्या ने डिजिटल संप्रभुता की अवधारणा पर विशेष बल दिया। उनके अनुसार, प्रत्येक देश को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्पादों को स्वतंत्र रूप से चुनने का अधिकार है और किसी भी राष्ट्र को किसी एक पक्ष का समर्थन करने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। यह वक्तव्य ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर एआई तकनीक को लेकर अमेरिका और चीन के बीच भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज़ हो रही है।
चीन की वैश्विक एआई पहल
च्या क्वेईते ने इस बात पर ज़ोर दिया कि चीन एआई क्षमताओं के निर्माण में एक समर्थक, प्रमोटर और अग्रणी देश की भूमिका निभा रहा है। चीन ने सभी देशों को एआई के लाभ साझा करने में सहायता के लिए 'वैश्विक एआई शासन पहल' का प्रस्ताव रखा है। गौरतलब है कि यह पहल विकासशील देशों में एआई अंतर को पाटने के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है।
आगे क्या होगा
चीन 2026 विश्व कृत्रिम बुद्धिमत्ता सम्मेलन (WAIC) और एआई के वैश्विक शासन पर उच्च स्तरीय बैठक की मेजबानी करने जा रहा है। इन आयोजनों में सभी देशों की सक्रिय भागीदारी की उम्मीद जताई गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस संवाद की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि बड़ी तकनीकी शक्तियाँ अपने राष्ट्रीय हितों से परे जाकर किस हद तक सहयोग करने को तैयार होती हैं।