भारत-लैटिन अमेरिका साझेदारी: सीआरएफ गोलमेज में 6 देशों के राजदूतों ने जताई रणनीतिक जुड़ाव की जरूरत
सारांश
मुख्य बातें
चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (सीआरएफ) द्वारा 23 जून 2025 को नई दिल्ली में आयोजित एक उच्चस्तरीय गोलमेज चर्चा में विशेषज्ञों और राजनयिकों ने एकमत से यह माना कि भारत और लैटिन अमेरिका के बीच दशकों से उपेक्षित संबंध को अब एक ठोस रणनीतिक साझेदारी में बदलने का सही समय आ गया है। यह चर्चा ऐसे वैश्विक परिदृश्य में हुई जब भू-राजनीतिक अनिश्चितता, बढ़ता संरक्षणवाद और सप्लाई चेन का पुनर्गठन दुनिया भर के देशों को नए गठबंधनों की ओर धकेल रहा है।
चर्चा में कौन-कौन शामिल हुए
'भारत-लैटिन अमेरिका: द अनएक्सप्लॉरड पार्टनरशिप' शीर्षक वाली इस चर्चा में उरुग्वे, अर्जेंटीना, कोलंबिया, ग्वाटेमाला, पनामा और कोस्टा रिका के राजदूत, रणनीतिक समुदाय के शिक्षाविद और नीति विशेषज्ञ शामिल हुए। सीआरएफ के अध्यक्ष शिशिर प्रियदर्शी ने यह स्पष्ट किया कि फाउंडेशन इस विषय पर गहरी बातचीत, शोध और संवाद के लिए एक सतत मंच उपलब्ध कराता रहेगा।
मुख्य घटनाक्रम और प्रमुख बिंदु
चर्चा में भाग लेने वालों ने इस बात पर जोर दिया कि भारत-लैटिन अमेरिका संबंधों की 'क्षमता' की बात तो लंबे समय से होती रही है, लेकिन यह क्षमता अभी तक लगातार राजनीतिक जुड़ाव, संस्थागत सहयोग या विविध व्यावसायिक साझेदारियों में नहीं बदली है। प्रतिभागियों के अनुसार, अगला चरण 'पूरकता' का होना चाहिए — यानी दोनों क्षेत्रों की आर्थिक और रणनीतिक ताकतों का आपस में मेल।
गौरतलब है कि वक्ताओं ने भारत की आगामी ब्रिक्स अध्यक्षता और उरुग्वे की सीईएलएसी (कम्युनिटी ऑफ लैटिन अमेरिकन एंड कैरिबियन स्टेट्स) की अध्यक्षता को एक महत्वपूर्ण अवसर बताया — जो दोनों प्लेटफॉर्म्स के बीच संवाद को गहरा कर एक अधिक संरचित साझेदारी की नींव रख सकता है।
चीन की मौजूदगी और भारत की रणनीति
चर्चा में लैटिन अमेरिका में चीन की व्यापक आर्थिक उपस्थिति के प्रभावों पर भी विचार-विमर्श हुआ। प्रतिभागियों के अनुसार, भारत को इस क्षेत्र को चीन के साथ प्रतिस्पर्धा के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। इसके बजाय भारत को अपनी तुलनात्मक शक्तियों — किफायती प्रौद्योगिकी, फार्मास्यूटिकल्स, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और माँग-आधारित सहयोग — के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए। यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब वैश्विक व्यापार के टूटने और आर्थिक निर्भरता के भू-राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल की चिंताएं बढ़ रही हैं।
चर्चा में विशेष रूप से यह उल्लेख किया गया कि भारतीय कंपनियों ने लैटिन अमेरिका में एक सकारात्मक स्थानीय पहचान बनाई है और पारंपरिक व्यापार व निवेश से आगे बढ़कर योगदान दिया है।
आम जनता और व्यापार जगत पर असर
विशेषज्ञों ने रेखांकित किया कि भारत-लैटिन अमेरिका के मजबूत जुड़ाव को मौजूदा साझेदारियों के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि रणनीतिक लचीलेपन, आर्थिक मजबूती और विविधीकरण को बढ़ावा देने के माध्यम के रूप में देखा जाना चाहिए। इससे दोनों क्षेत्रों के निजी क्षेत्र, प्रौद्योगिकी उद्योग और कृषि-आधारित अर्थव्यवस्थाओं को लाभ मिल सकता है।
आगे क्या होगा
चर्चा में यह स्पष्ट किया गया कि संभावनाओं को ठोस नतीजों में बदलने के लिए लगातार राजनीतिक ध्यान, संस्थागत ढाँचे की मजबूती और निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी अनिवार्य है। सुझाव दिया गया कि कुछ प्राथमिकता वाले क्षेत्रों पर केंद्रित होकर जल्द प्रगति हासिल की जा सकती है। सीआरएफ ने संकेत दिया कि वह इस दिशा में शोध और नीतिगत संवाद जारी रखेगा।