पाकिस्तान को जीएसपी-प्लस: मानवाधिकार उल्लंघनों के बावजूद यूरोपीय संघ की व्यापार रियायतें सवालों के घेरे में
सारांश
मुख्य बातें
यूरोपीय संघ (ईयू) द्वारा पाकिस्तान को दी जा रही जनरलाइज्ड स्कीम ऑफ प्रेफरेंसेज प्लस (जीएसपी-प्लस) व्यापार सुविधा को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और विशेषज्ञों की आलोचना तेज हो गई है। आरोप है कि 2014 में यह विशेष व्यापारिक व्यवस्था लागू होने के बाद से पाकिस्तान मानवाधिकार मानकों पर अपेक्षित सुधार दिखाने में विफल रहा है, फिर भी उसे यूरोपीय बाज़ार में 66 प्रतिशत से अधिक टैरिफ श्रेणियों पर शुल्क-मुक्त या रियायती पहुँच मिलती रही है।
जीएसपी-प्लस पर उठते सवाल
ब्रुसेल्स स्थित मानवाधिकार संगठन सीमाओं के बिना मानवाधिकार (एचआरडब्ल्यूएफ) ने पाकिस्तान को दिए गए जीएसपी-प्लस दर्जे को 'ईयू और पाकिस्तान के बीच खराब सौदा' बताया है। संगठन का स्पष्ट मत है कि जब तक मानवाधिकारों के क्षेत्र में ठोस और सत्यापन-योग्य सुधार नहीं दिखते, तब तक इस सुविधा को निलंबित किया जाना चाहिए।
तुर्की मूल की पत्रकार उज़े बुलुत ने अमेरिकी मीडिया मंच पीजे मीडिया में प्रकाशित एक विस्तृत लेख में लिखा है कि समझौता लागू होने के एक दशक बाद भी पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों को लागू करने में सार्थक प्रगति नहीं कर पाया है। उनके अनुसार, इसका सबसे गहरा दुष्प्रभाव देश के ईसाई अल्पसंख्यक समुदाय पर पड़ा है।
अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के आरोप
लेख के अनुसार, पाकिस्तान की कुल आबादी में ईसाइयों की हिस्सेदारी दो प्रतिशत से भी कम है, फिर भी उन्हें सामाजिक और संस्थागत दोनों स्तरों पर उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। कथित तौर पर भीड़ हिंसा, ईशनिंदा कानूनों का दुरुपयोग, आर्थिक भेदभाव, अपहरण, यौन हिंसा और जबरन धर्मांतरण जैसी घटनाएँ लगातार सामने आती रही हैं।
लेख में लाहौर की 14 वर्षीय ईसाई किशोरी निशा बीबी के मामले का विशेष उल्लेख किया गया है। परिवार और कानूनी प्रतिनिधियों के अनुसार, उसका कथित रूप से अपहरण कर जबरन इस्लाम धर्म स्वीकार कराया गया और विवाह कराया गया। पीड़िता के पिता अब्बास मसीह ने आरोप लगाया कि उनकी बेटी एक मुस्लिम परिवार में घरेलू सहायक के रूप में काम करते समय लापता हो गई थी।
बुलुत के लेख में यह भी रेखांकित किया गया है कि पाकिस्तान में कानूनी, धार्मिक और सांस्कृतिक परिस्थितियाँ लैंगिक असमानता को बढ़ावा देती हैं, जिसके कारण ईसाई लड़कियाँ अपहरण, जबरन धर्मांतरण और जबरन विवाह जैसी घटनाओं के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं।
ईयू की नीतियों पर सवाल
आलोचकों का कहना है कि मानवाधिकार, श्रमिक अधिकारों और सुशासन में सुधार के वादों के बावजूद पाकिस्तान अपेक्षित प्रगति नहीं कर पाया है। इसके बावजूद यूरोपीय संघ ने जीएसपी-प्लस के तहत बड़ी आर्थिक रियायतें जारी रखी हैं, जिसे लेकर ईयू की व्यापार नीति की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
यह ऐसे समय में आया है जब यूरोपीय संघ अपनी व्यापार-मानवाधिकार संयोजन नीति को वैश्विक स्तर पर एक मानक के रूप में प्रस्तुत करता है। गौरतलब है कि जीएसपी-प्लस योजना का मूल उद्देश्य ही यह था कि व्यापारिक लाभ के बदले लाभार्थी देश मानवाधिकार, श्रम और पर्यावरण संबंधी 27 अंतरराष्ट्रीय संधियों का अनुपालन सुनिश्चित करें।
आगे की राह
मानवाधिकार संगठनों की माँग है कि ईयू पाकिस्तान की जीएसपी-प्लस स्थिति की स्वतंत्र और पारदर्शी समीक्षा करे। रिपोर्टों के अनुसार, इस मुद्दे पर यूरोपीय संसद के भीतर भी बहस तेज हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईयू ने ठोस कार्रवाई नहीं की, तो उसकी 'मूल्य-आधारित व्यापार नीति' की साख को गंभीर नुकसान पहुँच सकता है।